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शुक्रवार, 19 जनवरी 2018

आलेख : तुष्टिकरण के तमाशे का खात्मा और विकास के मसौदे पर काम

appeasement-politics
‘दुनिया एक तमाशा है। आशा है और निराशा है।’ इस फिल्मी गीत को बहुत सोच-समझकर लिखा गया है। जिधर देखिए, उधर तमाशा ही तो हो रहा है। कहीं समर्थन का मजमा लगा है और कहीं विरोध का। एक ओर जहां मोदी और योगी सरकार पर मुस्लिम विरोधी होने के आरोप लग रहे हैं, उसके हर निर्णय को मुस्लिमों को तबाह करने की साजिश करार दिया जा रहा है, वहीं नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ ने देश की प्रश्नाकुलता को बहुत ही सहजता के साथ लिया है। उन्हें पता है कि समस्याओं के समाधान का रास्ता सवालों के बीच से ही निकलता है। इस देश की संस्कृति सवाल पूछने और उसका जवाब पाने की रही है। इस देश का एक उपनिषद प्रश्नोपनिषद है। हमारे अठारहों पुराण, छहों शास्त्र, स्मृति ग्रंथ और उपनिषद किसी न किसी जिज्ञासा का समाधान ही हैं। दुर्गा सप्तशती की रचना का आधार ही मेधा ऋषि से राजा सुरथ और समाधि वैश्य द्वारा पूछे गए सवाल हैं। सवाल न पूछे जाते तो यह ग्रंथ प्रकाश में आता ही नहीं। गीता की उत्पत्ति ही न होती, अगर अर्जुन विचलित न होता। कृष्ण से सवाल न करता। रामचरित मानस में चार घाट हंै। चारों घाटों पर चार वक्ता हैं और चार श्रोता हैं। श्रोता सवाल करते हैं और वक्ता जवाब देता है। पूरा जीवन ही सवाल-जवाब है। जो सवालों से भागता है, वह जीवन में कभी सफल नहीं हो पाता। विडंबना इस बात की है कि आज अपने देश में सवाल नहीं पूछे जाते। आरोप लगाए जाते हैं। आरोपों और सवालों के बीच का अंतर जब तक समझा नहीं जाएगा, तब तक समाधान के तहखाने तो खुलने से रहे? 

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में नौ राज्यों तथा केन्द्र शासित प्रदेशों की ‘विकास समन्वय बैठक हुई। इसमें केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने तो शिरकत की ही, मेजबान उत्तर प्रदेश समेत नौ राज्यों के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रियों ने भी अपनी सम्मानीय उपस्थिति दर्ज कराई। अल्पसंख्यकों के शिक्षोन्नयन, रोजगार और उनकी समस्याओं के समाधान पर चर्चा हुई। समुद्र मंथन से अमृत निकलता है। दही को मथने से नवनीत निकलता है। विचार मंथन से समस्याओं का हल निकलता है। तरक्की के नए रास्तों का पता चलता है। राजशाही में में भी पंचों की राय को अहमियत दी जाती थी। ‘जौ पंचहिं मत लागै नीका।’ विचार की इतनी शानदार परंपरा अपने ही देश में थी। समन्वय बैठक को देखकर, उसकी कवरेज कर ऐसा लगा कि भारत अपने गौरवमयी अतीत और उसकी संस्कृतियों को दोहरा रहा है। आजादी के बाद से लंबे समय तक सबकी राय लेने की परंपरा समाप्त हो गई थी। मोदी और योगी सरकार साधुवाद की पात्र है कि वह खुद निर्णय नहीं लेती। पहले सबकी राय लेती है। इसके बाद किसी व्यवस्था को लागू करती है। यह अलग बात है कि विपक्ष उस पर लगातार तानाशाही बरतने के आरोप लगाता रहता है। मोदी और योगी सरकार बनने के बाद से कोई दिन ऐसा नहीं बीता है जब उसकी आलोचना न हुई हो। उस पर तानाशाही और मनमानी के आरोप न लगे हों। नरेंद्र मोदी सरकार को मुस्लिम विरोधी करार देने वालों की देश में बहुत बड़ी जमात है लेकिन इन विरोध प्रतिक्रियाओं की परवाह किए बगैर केंद्र सरकार ‘सबका साथ-सबका विकास’ की रपटीली राह पर बड़ी तेजी के साथ अपने संकल्प रथ को आगे बढ़ा रही है। 

नरेन्द्र मोदी सरकार ने वर्षों पुराने ‘तुष्टीकरण के तमाशे‘ को खत्म कर दिया है और अल्पसंख्यक तबके को भी विकास का बराबर का हिस्सेदार बनाने की राह आसान की है। ‘बिना तुष्टीकरण के सशक्तिकरण‘ और ‘सम्मान के साथ सशक्तिकरण‘ ही इस सरकार का ध्येय वाक्य है। ‘तुष्टीकरण के तमाशे‘ और ‘वोट के सौदे‘ को खत्म करना और विकास के मसौदेे पर काम करना वक्ती जरूरत है और इसे केंद्र सरकार बेहतर ढंग से समझती है। इसी का प्रतिफल है कि अल्पसंख्यक भी विकास के बराबर के हिस्सेदार बन रहे हैं। इस आशय के विचार केन्द्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने नौ राज्यों तथा केन्द्र शासित प्रदेशों की ‘विकास समन्वय बैठक‘ में अभिव्यक्त किए हैं। उन्होंने कहा है कि केन्द्र सरकार की नौकरियों में अल्पसंख्यकों की भागीदारी जहां वर्ष 2014 में लगभग पांच प्रतिशत थी जो 2017 में बढ़कर दोगुनी हो गई है। इस साल सिविल सेवा में 125 अल्पसंख्यक युवा चयनित हुए हैं, जिनमें से 52 मुस्लिम हैं। अल्पसंख्यक मंत्रालय की ‘हुनर हाट‘, ‘सीखो और कमाओ‘, ‘नई मंजिल‘, ‘गरीब नवाज कौशल विकास योजना‘ और ‘नई रोशनी‘ जैसी सौ से अधिक योजनाएं अल्पसंख्यकों के कौशल विकास को आगे बढ़ा रही हैं। मोदी सरकार ने तीन साल में इन योजनाओं के जरिए साढ़े आठ लाख से अधिक  लोगों को रोजगार उपलब्ध कराया है। अल्पसंख्यक समुदायों के लिए केन्द्र संचालित योजनाओं को जमीनी स्तर पर लागू करने में ज्यादातर राज्यों के प्रयास बेहतर हैं। शेष राज्यों को भी इस दिशा में और प्रयास करने चाहिए। उन्होंने मुस्लिम बालिकाओं की शिक्षा पर जोर देते हुए कहा कि किसी भी हालत में लड़कियां शिक्षा से वंचित न रहें। उनकेे विकास से ही देश तथा प्रदेश का विकास होगा। एक शिक्षित लड़की घर-परिवार के साथ ही समाज को भी शिक्षित करती है। हमें ऐसा प्रयास करना है कि एक बार शिक्षा के मंदिर में जाने वाली लड़की बीच में शिक्षा छोड़ने को विवश न हो। नकवी की मानें तो इस बैठक का उद्देश्य राज्यों तथा केन्द्र शासित प्रदेशों में अल्पसंख्यक समुदायों के लिए चल रही विभिन्न शैक्षिक, कौशल विकास तथा छात्रवृत्ति की योजनाओं की समीक्षा करना तथा राज्यों से सुझाव प्राप्त करना है, ताकि उनका लाभ समाज के हर जरूरतमंद को मिल सके। मेरा ख्याल है कि मोदी सरकार इस तरह की बहस और समन्वय बैठक आयोजित कर अपने राजनीतिक विरोधियों को संदेश भी देना चाहती है कि अल्पसंख्यक-अल्पसंख्यक चिल्लाने भर से उनका विकास नहीं होगा। उनके विकास के लिए प्रयास करना होगा। उनकी राह से संकीर्णता के रोड़े हटाने होंगे। बड़ी सोच रखकर ही बड़े लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं। उनकी शिक्षा में आधुनिक विषयों का समावेश नहीं होगा तो वे आगे कैसे बढ़ेंगे?   

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विचार प्रक्षेप करते हुए कहा कि किसी भी राज्य में मदरसों को बंद नहीं किया जाना चाहिए। यह समस्या का समाधान नहीं है। मदरसों को आधुनिक बनाया जाना चाहिए। कम्प्यूटर शिक्षा से जोड़ना चाहिए। मदरसों ही नहीं, संस्कृत विद्यालयों को भी आधुनिक बनाना चाहिए। संस्कृत विद्यालयों को भी अपने यहां पारंपरिक शिक्षा के साथ ही अंग्रेजी, कंप्यूटर व आधुनिक विषयों की शिक्षा देनी चाहिए। उत्तर प्रदेश सरकार बिना किसी भेदभाव के हर तबके के विकास के लिए सन्नद्ध है। सभी योजनाओं को आम जनता तक पहुंचाना है। प्रदेश में जब हमारी सरकार बनी थी तब विरोधियों को लगता था कि कुछ लोगों के बजट में कटौती होगी लेकिन ‘हम सबका साथ-सबका विकास’ की भावना के साथ आगे बढ़ रहे हैं। अल्पसंख्यक कल्याण की बात करते वक्त हमारे सामने बहुत सारे सवाल खड़े होते हैं। अगर शरीर का कोई अंग काम करना बंद करता है तो दिव्यांग कहा जाता है। ऐसे ही अगर समाज में किसी व्यक्ति के साथ भेदभाव होता है तो वह अपने आपको उपेक्षित महसूस करता है। सरकार का प्रयास है कि कोई भी व्यक्ति अपने को उपेक्षित न महसूस करे। कोई भी अराजकता का शिकार न हो। वह अपने समाज के साथ मिलकर इस राष्ट्र को सशक्त बनाने और ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ के विकास मेंयोगदान दे सके। हम बिना भेदभाव के सभी वर्ग के लिए काम कर रहे हैं। अल्पसंख्यक वर्ग के विकास के लिए प्रधानमंत्री कौशल विकास कार्यक्रम चलाया जा रहा है। मुख्तार अब्बास नकवी के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री बनने के बाद यहां अल्पसंख्यक कल्याण योजनाओं के क्रियान्वयन में तेजी आई है। उनकी सरकार के नौ महीने के कार्यकाल में ही 100 से अधिक कार्ययोजनाओं की शुरुआत अल्पसंख्यकों के लिए की गई है। यह सम्मेलन इसलिए भी अहम है क्योंकि केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी सीधे तौर पर केंद्र की योजनाओं की जमीनी हकीकत से रूबरू हो रहे हैं। अल्पसंख्यक कल्याण योजनाओं में सुधार के लिए सुझाव भी मांगे जा रहे हैं। यहां आए मंत्रियों से अपने-अपने राज्यों में चल रही अल्पसंख्यक योजनाओं के क्रियान्वयन पर चर्चा हो रही है।

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ मिनी भारत के रूप में तब्दील हो गई थी। हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, दिल्ली, उत्तराखंड, बिहार, चंडीगढ़, और उत्तर प्रदेश मे अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रियों ने अल्पसंख्यकों के सामने आ रही चुनौतियों पर चर्चा की। इनमें तीन तलाक से लेकर मदरसा शिक्षा के मुद्दे शामिल रहे। बैठक में योजनाओं को लेकर आ रही दिक्कतों व इसके सुझाव पर भी बात हुई। सभी राज्यों ने अपने-अपने यहां चल रही योजनाओं एवं उनकी प्रगति के बारे में प्रस्तुति दी। एमएसडीपी, मदरसा आधुनिकीकरण, छात्रवृत्ति सहित विभिन्न योजनाओं पर खुलकर विमर्श हुआ। उत्तर प्रदेश की ओर से एमएसडीपी योजना की प्रगति रिपोर्ट पेश की गई। प्रदेश सरकार ने दावा किया कि उसके नौ माह के कार्यकाल में इस योजना के तहत बहुत काम हुआ है। सामाजिक समरसता और सामुदायिक विकास के प्रोत्साहन स्वरूप प्रदेश में 18 सद्भाव मंडप का निर्माण कराया जा रहा है।   जो राजनीतिक दल मोदी और योगी सरकार पर अल्पसंख्यक विरोधी होने का आरोप लगा रहे हैं, उन्हें विचार करना होगा कि जब वे देश और प्रदेश में सत्तासीन थे तो उन्होंने अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए कितनी बार आत्ममंथन किया। विकास योजनाएं ला देना ही काफी नहीं है, उसका क्रियान्वयन सुनिश्चित कराना भी सरकार की नैतिक और सांविधिक जिम्मेदारी है। आलोचना करना आसान है लेकिन समाधान सुझाना कठिन है। यह देश सभी का है। इसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी सबकी है। गोपालदास नीरज ने एक दीवाली गीत लिखा था- ‘जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना, अंधेरा घरा पर कहीं रह न जाए।’ एक भी व्यक्ति उपेक्षित है, निराश-हताश है तो इस देश का विकास अधूरा है। आजादी का मतलब तो यह है कि हमारी आजादी दूसरों की आजादी में बाधक न बने। आत्ममंथन का यह सिलसिला आगे बढ़ते रहने में ही इस देश की भलाई है। विरोधी दलों को भी सोचना होगा कि उनकी आरोपों की राजनीति से किसका भला हो रहा है?





--सियाराम पांडेय ‘शांत’--
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