विशेष : साहित्यकार स्व. सतीश चन्द्र झा की 89 वीं जयंती के अवसर पर एक अनुभव - Live Aaryaavart

Breaking

रविवार, 28 जनवरी 2018

विशेष : साहित्यकार स्व. सतीश चन्द्र झा की 89 वीं जयंती के अवसर पर एक अनुभव

satish-chandra-jha
(जन्मः 29 जनवरी 1929 व पुण्य तिथिः 16 जून 2008)
दुमका (अमरेन्द्र सुमन) ज्ंागल-पहाड़, नदी-घाटी, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी व जनजातीय संस्कृति से ओत-प्रोत प्राचीन अंग जनपद का हिस्सा व वर्तमान संताल परगना की उर्वर भूमि जहाँ एक ओर भूगर्व वैज्ञानिकों, जीव वैज्ञानिकों, वनस्पति वैज्ञानिकों, इतिहासकारों पुरातत्ववेत्ताओं व पर्यावरणविद्ों के लिये सदियों से महान खोज का विषय रहा है, वहीं दूसरी ओर इस क्षेत्र की आदिम आवोहवा, भाषा-संस्कृति, पर्व-त्योहार, खान-पान, नृत्य-संगीत, आमोद-प्रमोद पर केन्द्रित अनुसंधान का कार्य भी वर्षों से जारी रहा, जो अब तक अक्षुण्ण बना हुआ है। इस क्षेत्र की साहित्यिक समृद्धि इस बात का गवाह रही है कि यहाँ से जुड़े साहित्यकारों/ रचनाकारों ने संताल परगना को ही अपनी रचनाधर्मिता का आदर्श बनाया तथा उसे आत्मसात करते हुए राष्ट्रीय फलक पर प्रत्यक्ष/ परोक्ष रुप से अपनी एक मुकम्मल पहचान बनाई। सृजन की लिपि चाहे जो भी रही हो, सृजन का विषय संताल परगना क्षेत्र की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, वैचारिक व सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर आधारित कथा, कहानी, कविता, लेख, दोहे, बीजक, एकांकी, नाट्य, प्रहसन, स्तंभ, उपन्यास, यात्रा वृतांत, झूमर, लोकगीत जैसी चीजें ही मुख्य रही हंै। हिन्दी, अंगिका, संताली, बंग्ला, भोजपुरी, संस्कृत, अवधी व ब्रज भाषाओं के कई एक स्वनामधन्य कवि/ लेखकों/ इतिहासकारों/ साहित्यकारो/ विद्धानों ने इस धरती पर जन्म लिया जिन्होनें अपने कृतित्व से इस क्षेत्र को गौरवान्वित, उद्भाषित व परिभाषित करने का प्रयास किया। 

ज्ञेय-अज्ञेय उद्भट विद्वानों, कवियो/ लेखकों, साहित्यकारों की इसी श्रृँखला में पूरी श्रद्धा के साथ संताल परगना के एक ऐसे कवि का भी नाम लिया जाता है, जिन्होनें मृत्युपर्यन्त हिन्दी साहित्य की सेवा में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं एक ऐसे सरल, सौम्य, मृदुभाषी व प्रखर व्यक्तित्व के धनी कवि/ साहित्यकार स्व0 सतीश चन्द्र झा की, जिन्होनें जीवन में न तो कभी रोटी-दाल, घर-परिवार की चिन्ता की और न ही व्यवस्था के उच्चतम मानकों में जीवन जीने की लालसा ही मन में पाल रखी थी। किन्तु यह भी सत्य है कि समय-असमय उनकी कुटिया में पहुँचने वाले अतिथियों के सत्कार में उन्होनें कोई कसर नहीं छोड़ रखा था। यह दिगर बात है कि सतीश बाबू की जीवितावस्था में उनकी इच्छाओं/ निर्णयों को पराकाष्ठा तक पहुँचाने वाली उनकी धर्मपत्नी श्रीमती चंपा देवी आज भी उसी श्रद्धाभाव से सतीश कुटिया में पहुँचने वाले कवियों/ साहित्यकारों का इस्तकबाल करती हैं, उनके जीवितावस्था में जैसा वे किया करती थीं। स्व0 सतीश बाबू की मृत्यु के बाद उनकी अनुपस्थिति के सूनेपन में टिमटिमाती रौशनी की तरह बूढ़ी हड्डियों में उनकी धर्मपत्नी श्रीमती चंपा देवी की मौजूदगी साहित्यकारों के लिये संजीवनी बूटी से कम नहीं रही हैं। स्व0 सतीश चन्द्र झा व उनकी धर्मपत्नी की इन्हीं संयुक्त सत्यकर्म प्रवृत्तियों का ही प्रतिफल है कि पूरी संजीदगी के साथ उनकी कुटिया में साहित्यिक गतिविधियाँ निरंतर विद्यमान है। सतीश स्मृति मंच उन्हीें प्रयासों का जीवित दस्तावेज बनकर उभरा है जिसकी छांव में स्थानीय साहित्यकार पल्लवित व पुष्पित हो रहे हैं। 

पिछले कई वर्षों से कई एक महत्वपूर्ण अवसरों पर स्व0 सतीश बाबू की कुटिया में आयोजित साहित्यिक संगोष्ठियों/ कवि गोष्ठियों में उनसे रुबरु होने व साहित्य की विभिन्न विद्याओं में दुर्लभ ज्ञान प्राप्त करने का अलौलिक अवसर मुझे प्राप्त होता रहा है। शास्त्री कद-काठी  के व लाल बहादुर शास्त्री जी की तरह ही कर्मठ किन्तु सरल, सौम्य व गंगाजल की तरह निर्मल स्व0 सतीश बाबू जब कभी भी कविताओं का पाठ किया करते तो प्रतीत होता मानो उनके मुख से निकलने वाला हर एक शब्द कृत्रिम जमीं पर प्राकृतिक छटा बिखेर रहा हो। कविता की एक-एक पंक्तियाँ उनकी आत्मा से जुड़ी होती थीं। उनकी कविता जितनी सधी हुआ करती, उसका अर्थ उतना ही सरल व व्यापक हुआ करता। पूरी मर्यादा के साथ रिश्तों/ संबंधों को जीने की काबिलियत रखने वाले स्व0 सतीश बाबू  आज भले ही हमारे बीच मौजूद न हों, किन्तु उनके स्मरण मात्र से ही उनकी पूर्ण उपस्थिति का आभाष प्राप्त हो जाता है। युवा कवियों के लिये तो वे एक बड़ी प्रेरणा से कम नहीं थे। उनके मार्गदर्शन में कई ऐसे नवोदित रचनाकारों ने पूरी आस्था व सम्मान के साथ लेखनी पकड़ी जिन्होनें बाद के वर्षों में साहित्यिक धरा पर एक मुकाम हासिल किया।
                                          
उनकी कविता की इन पंक्तियों से यह स्वतः स्पष्ट हो जाता है कि अतिथियों का सत्कार वे किस हद तक करते होगें- आगत का स्वागत/ अभ्यागत में सेवारत/ यही संस्कृति यही धारणा/ नहीं विकृति का आभाष/ प्रेमभाव से करता आदर/ मै खुद हूँ एक विचार/ बना मैं, पर्णकुटी का पहरेदार।  स्व0 सतीश बाबू का मानना था ’एक व्यक्ति को ईश्वर ने जो आयु प्रदान किया है, पूरे उत्साह, पूरी पारदर्शिता व निष्पक्षता के साथ उसका उपयोग उसे परिवार, समाज व देश के निर्माण में करना चाहिए। कविता की इन पंक्तियों से यह बखूबी समझा जा सकता है- जश्म मनाओ इस तरह, बढ़े प्रेम परिवेश/ अन्तर्मन खिल-खिल उठे, रहे न कोई क्लेश। क्वार्टर पाड़ा, दुमका स्थित स्व0.सतीश बाबू की कुटिया थी तो काफी छोटी, किन्तु उस कुटिया में पहुँचने वाले लोग वैसे ही ज्ञानी हुआ करते थे, जिन्होनें राष्ट्रीय फलक पर अपनी पहचान कायम की। सतीश चैरा में पहुँचने वालों को उनकी निम्न पंक्तियाँ हमेशा स्मरण कराती रहेगीं-इस कुटिया का हर एक पल हर क्षण/ तेरे चरणों पर है अर्पण/ तेरा रज कण मेरा चन्दन/ वन्दन बारंबार तुम्हारा/ आओ करता स्वागत तेरा।  भाषा-संगम, जिला हिन्दी सम्मेलन, अंगिका विकास समिति व अन्य कई अलग-अलग संस्थाओं की बैठकों सहित उनके कार्यक्रमों के संचालन व आगत अतिथियों के स्वागत की पूरी रुपरेखा ही सतीश कुटिया में तय हुआ करती। कहते हैं कवि/ साहित्यकार बड़े ही संवेदनशील प्राणी होते हैं। जो भी बातें आत्मा में चूभ गई या फिर आत्मा से जुड़ गई, उसके परिणाम / निराकरण की चिन्ता किये बिना सहज भाव से प्रकट कर दिया करते हैं। सतीश बाबू की यह बड़ी विशेषता थी।  सतीश बाबू के संदर्भ में कहा जाता है कि अर्थाभाव के बावजूद सेवा व समर्पण की भावना से वे ओतप्रोत थे। एक अल्पवेतन भोगी कर्मचारी जिसका अपना ही घर-संसार काफी बड़ा हो, अभावों के बाद भी उनके चेहरे की मुस्कुराहट से कोई यह अनुमान नहीं लगा सकता था कि किस परिस्थिति में उनके जीवन की बैलगाड़ी चल रही होगी। उनका कहना था घबड़ाने से समस्या का समाधान नहीं निकलता है। दृढ़ता के साथ उसका सामना करना ही पुरुषार्थ कहलाता है। उनकी कविता की एक बानगी देखिये-इन्सानों की दुनिया सुन लो/ देवों के आकाश/ मेरा रहा यही विश्वास।  मंजिल भी तो दूर बहुत है/ बैठ गया हूँ थककर/ थकन मिटाकर दूर बढ़ूँगा/ अपने जीवन-पथ पर/ रुका हुआ हूँ पर मत समझो/ हुआ बहुत निराश/ बची हुई है अब भी हममें बढ़ने की अभिलाष/ मेरा रहा यही विश्वास। 

वर्तमान संताल परगना प्रमण्डल के जिला गोड्डा के एक छोटे से गाँव सनौर में 29 जनवरी 1929 को जन्में स्व0 सतीश चन्द्र झा को भले ही साहित्य विरासत में प्राप्त हुआ हो, किन्तु बचपन से ही संघर्षशील अपनी मेहनत, लगन व स्वाध्याय के बल पर उन्होनें जो मुकाम हासिल किया, संताल परगना के साहित्यिक इतिहास में ’मील का पत्थर’, से कम नहीं है। उनके ज्येष्ठ पुत्र व सतीश स्मृति मंच के सचिव कुन्दन कुमार झा के अनुसार प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी व साहित्यकार पितामह के ज्येष्ठ भाई प0 बुद्धिनाथ झा कैरव व पितामह प0 अवध नारायण झा के सानिध्य/ संरक्षण व सहयोग का ही प्रतिफल था कि साहित्य व साहित्यकारों के प्रति बाबूजी की अगाध अभिरुचि व श्रद्धा थी। वे कहा करते थे-कोई छोटा-बड़ा नहीं होता। ईश्वर ने पूरी मानव जाति को एक सांचे में ढाल रखा है, किन्तु मानव अपने संस्कारों अपनी अभिरुचियों, अपने उद्देश्यों, अपनी कल्पनाओं, अपने परिश्रम व अपनी सोंच की बदौलत ही एक-दूसरे से भिन्न होकर श्रेणीबद्ध हो जाता है। जो दूसरों के अच्छे-बुरे कार्यों का लेखा-जोखा करते हैं उन्हें यह ज्ञात ही नहीं रहता कि जीवन के महत्वपूर्ण क्षणों में वे क्या खो रहे हैं और पाने के लिये उनके पास बचा क्या हैं ? मध्य विद्यालय, बाराहाट में प्रारंभिक शिक्षा स्व0 सतीश चन्द्र झा ने अपने पिता स्व0 अवध नारायण झा के संरक्षण व मार्गदर्शन में प्राप्त किया था। रानी महकम कुमारी बहुउद्देशीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, बाँका व टीएनजे महाविद्यालय, भागलपुर से स्व0 झा ने मैट्रिक व इन्टर की परीक्षाएँ पास की थी। वर्ष 1954 में हिन्दी अनुदेशक के महत्वपूर्ण व जिम्मेदारी भरे पद पर नौकरी करने के बावजूद सेवाकाल में ही सतीश बाबू ने एसपी महाविद्यालय, दुमका से बी ए की डिग्री हासिल की थी। 

स्व0 सतीश बाबू की धर्मपत्नी श्रीमती चंपा देवी के अनुसार क्वार्टर पाड़ा, दुमका स्थित सतीश कुटिया में साठोत्तर काल में कई ऐसे नामी-गिरामी कवि/ साहित्यकारों का समय-असमय आगमन होता रहा, जिनकी उपस्थिति मात्र से ही संताल परगना की धरती पुष्पित-पल्लवित हो जाती। श्रीराम गोपाल शर्मा रुद्र, राजा राधिका रमण प्रसाद सिंह, डा0 लक्ष्मी नारायण सुधांशु, आनन्द शंकर माधवन, राम दयाल पाण्डेय, भागवत झा आजाद जैसे विद्धान/ मनीषियों का आर्शीवाद व प्रोत्साहन सतीश बाबू को प्राप्त होता रहा। इसी कुटिया की चारपाई पर बैठकर रचित उनकी रचनाएँ वनफूल, माटी कहे कुम्हार से, रजत शिखर, बाँस-बाँस बाँसुरी, वीर जवानों तुम्हें प्रणाम जैसी साहित्यिक पत्रिकाओं, पुस्तकों व काव्य संकलनों में प्रकाशित हुई। स्व0 सतीश बाबू की सैकड़ों रचनाएँ अभी भी अप्रकाशित हैं जिनके प्रकाशन की जिम्मेवारी सतीश स्मृति मंच के लिये छोड़ दिया गया है। 16 जून 2008 को 79 वर्ष की आयु में सतीश बाबू ने इस संसार से अलविदा कह दिया। उनकी मृत्यु के बाद उनके अन्तरंग डा0 आनन्द मोहन सोरेन ने अपना उद्गार प्रकट करते हुए कहा था-सतीश बाबू पिछले कुद वर्षों से बीमार चल रहे थे। मैं उन भाग्यवानों में से एक हूँ, जिन्हें उनकी सेवा करने का अवसर प्राप्त हुआ। उनके नाम से एक ट्रस्ट बनाया जाय ताकि साहित्य के धरोहर को सुदृढ़ रुप से आगे बढ़ाया जा सके। इतना ही नहीं उनके सद्विचारों को जन-जन तक पहुँचाये जाने की आवश्यकता है। डा0 श्यामसुन्दर घोष ने कहा था-उनका आवास साहित्य तीर्थ था। अंगिका साहित्य के महाकवि स्व0 सुमन सुरो ने अपना उद्गार प्रकट करते हुए कहा था-यह कुटिया जो सूनी पड़ी है, दशकों तक साहित्यकारों के लिये सिद्धपीठ रही है। अपनी भावना से अवगत कराते हुए साहित्यकार डा0 रामवरण चैधरी ने कहा था-सतीश चैरा साहित्यकारों का रैन बसेरा है। प्रत्येक वर्ष स्व0 सतीश बाबू की जयन्ती पर साहित्य पर्व मनाने तथा हिन्दी व अंगिका के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले साहित्यकारों को सम्मानित करने की जरुरत है। यह अकाट्य सत्य है कि शरीर नश्वर है। व्यक्ति मरता जरुर है, किन्तु उसकी कृतियाँ उसे अमर बना देती हैं। सतीश बाबू हमारे बीच नहीं हैं किन्तु दानस्वरुप उन्होनें जो कुछ भी दिया है, उसे संभाल कर रखना ही उनके प्रति हम सबों की एक सच्ची श्रद्धाँजलि होगी।  
                                            
संताल परगना के प्रमण्डलीय मुख्यालय जिला दुमका में स्व0 सतीश बाबू के महाप्रयाण के बाद विरासत में प्राप्त संस्कारों व साहित्यिक आवोहवा में रच बस गई रिक्तता को पाटने, पुरानी अभिरुचियों को पुनर्जीवित करने व उदास कुटिया की हरियाली को बनाए रखने के उद्देश्य से वर्ष 2008 में उनकी धर्मपत्नी श्रीमती चंपा देवी व उनके कर्मयोंगी समर्थ पुत्र-पुत्रियों कुन्दन कुमार झा, विद्यापति झा, नूतन झा, आशीष कुमार झा, पवन कुमार झा व अन्य के संयुक्त पहल व प्रयास से गठित सतीश स्मृति मंच के तत्वावधान में पिछले 9 वर्षों से उनके जन्मदिन 29 जनवरी को प्रतिवर्ष श्रद्धांजलि सभा, विचार गोष्ठी व सम्मान समारोह का आयोजन किया जाता रहा है। इस कार्यक्रम में अंग क्षेत्र, संताल परगना व शेष झारखण्ड के अलग-अलग हिस्सों से स्वनामधन्य कवियों, साहित्यकारों, लेखकों का जुटान होता है जिनकी उपस्थिति में एक ऐसे साहित्यकार को स्मृति चिन्ह, प्रशस्ति पत्र, अंगवस्त्र व नकद राशि से सम्मानित किया जाता है, आमंत्रित कृतियों में जिनकी कृति भिन्न विशेषताओं से युक्त होती है। सतीश स्मृति विशेष सम्मान से भी कई-कई साहित्यकारों को इस अवसर पर नवाजा गया है। साहित्यकारों की कृतियों पर पूरी पारदर्शिता के साथ निर्णायक मंडल की स्वीकृति/ सहमति अनिवार्य होती है। अभिभावक तुल्य प्रो0 मनमोहन मिश्र जी के अनन्यतम योगदान व उनके आर्शीवाद से यह संस्था लगातार अपनी छटा बिखेरता रहा है। उनका मार्गदर्शन आज भी निर्विवाद जारी है।  

लब्ध-प्रतिष्ठ साहित्यकार व अंगिका भाषा के महाकवि स्व0 सुमन सुरो, प्रो0 ताराचंद खवाड़े, श्री शंभू नाथ मिस्त्री, डा0 रामवरण चैधरी, डा0 शंकर मोहन झा, डा0 प्रमोदनी हांसदा, जैसे विद्वतजनों सहित युवा कवियों यथा-अशोक सिंह, राजीव नयन तिवारी, उमाशंकर उरेन्दु व अमरेन्द्र सुमन का अथक सहयोग व समर्थन भी इस संस्था को निःस्वार्थ भाव से प्राप्त होता रहा है। फिलवक्त कई ऐसे युवा व उर्जावान कवि/ साहित्यकार हैं, जिनमें सतीश स्मृति मंच से जुड़कर साहित्य की धारा को अविरल बनाए रखने की प्रतिबद्धता देखी जा रही है। विदित हो, इस मंच के तत्वावधान में वर्ष 2009 में अंगिका खण्डकाव्य ’कागा की संदेश उचारे के लिये डा0 अनिरुद्ध प्र0  विमल व ’सांवरी’ सहित अन्य कृतियों के लिये धनंजय मिश्र को सतीश स्मृति सम्मान से नवाजा गया था। वर्ष 2010 में हिन्दी व अंगिका साहित्य में उत्कृष्ट योगदान व अनवरत सेवा के लिये डा0 अमरेन्द्र को सम्मानित किया गया था। वर्ष 2011 में उपन्यास ’कुँवर नटुआ दयाल’ के लिये श्री रंजन को व वर्ष 2012 में गजल संग्रह ’दर्द के गाँव’ के लिये अरविंद अंशुमन को सतीश स्मृति सम्मान से सम्मानित किया गया था। इसी वर्ष गोपाल कृष्ण प्रज्ञ को अंगिका साहित्य में अमूल्य योगदान के लिये सतीश स्मृति विशेष सम्मान से सम्मानित किया गया था। वर्ष 2013 में डा0 प्रतिभा राजहंस को उनके उपन्यास प्रतिशोध के लिये जहाँ एक ओर सम्मानित किया गया था, वहीं दूसरी ओर हिन्दी साहित्य की अमूल्य सेवा के लिये स्व0 डा0 श्याम सुन्दर घोष को सतीश स्मृति विशेष सम्मान से सम्मानित किया गया था। सतीश स्मृति सम्मान समारोह की इसी कड़ी में वर्ष 2014 में आयोजित कार्यक्रम में हेना चक्रवर्ती को उनकी कविता संग्रह ’आना पीयूष बन के’ के लिये सम्मानित किया गया था। हिन्दी साहित्य की निरंतर सेवा व महत्वपूर्ण प्रकाशनों के लिये उत्तम पीयूष को इसी अवसर पर सतीश स्मृति विशेष सम्मान से नवाजा गया था। वर्ष 2015 में सतीश स्मृति मंच की ओर से प्रहलाद चंद दास को कहानी संग्रह ’पराये लोग’ के लिये सतीश स्मृति सम्मान व हिन्दी साहित्य की निरंतर सेवा व उनकी कविता संग्रह ’तुम्हारे शब्दों से अलग’ के लिये सतीश स्मृति विशेष सम्मान से सम्मानित किया गया था। सतीश स्मृति मंच के तत्वावधान में वर्ष 2016 में प्रतिभा प्रसाद को सतीश स्मृति सम्मान से नवाजा गया था।  

मालूम हो, वर्ष 2011 में क्वार्टर पाड़ा स्थित सतीश चैरा में सतीश स्मृति मंच के तत्वावधान में स्व0 सतीश चन्द्र झा के जन्मदिन (29 जनवरी) के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में ’’साहित्य और समाज’’ विषयक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया था, जबकि वर्ष 2012 में ’’कविता का पारंपरिक काव्य-शिल्प और समकालीन कविता’’ पर आयोजित था यह कार्यक्रम। वर्ष 2013 में ’’समकालीन कविता एवं काव्य संस्कार’’ पर केन्द्रित कार्यक्रम का आयोजन किया गया था, जबकि वर्ष 2014 में ’’समकालीन कविताः दशा एवं दिशा’’ गोष्ठी समारोह का मुख्य विषय रखा गया था। वर्ष 2015 में मंच ने ’’हिन्दी कविता के पचास वर्ष एवं अंग जनपद के कवियों का योगदान’’, विषय पर केन्द्रित कार्यक्रम का आयोजन किया था, जबकि वर्ष 2016 में ’’समकालीन साहित्य में पीढ़ियों का अंतराल’’ विषय पर। 
एक टिप्पणी भेजें
Loading...