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मंगलवार, 15 मई 2018

आलेख : लोकतंत्र के साथ बेइंसाफी से आहत ‘आत्माओं’ की व्यथा

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कोलकाता।  दुनियां के सबसे मजबूत लोकतांत्रिक देश के रुप में इस देश की अपनी एक पहंचान है। लोकतंत्र में वोट को  ही जनता की ताकत माना गया है। सब कहते हैं कि एक-एक वोट बहुत कीमती है इसलिए आपको मतदान ज़रूर करे। अरे अरे बता दें कि हमलोग वह नहीं है जो आपलोग समझ रहें है। हमे अब आपलोग देख भी नहीं सकते है। क्यों कि हमलोग तो तथाकथित परिवर्तन की बलि चढ़ कर अकाल मौत के शिकार हों गये हैं। जनाबे अली हमलोग तो मर चुके है। लोकतंत्र के महायज्ञ में हमारी बलि जो चढ़ गई है। हमारी हत्याएं किन लोगों ने की । किन लोगों के इशारों पर की गई। क्यों की गई, और तो और हम जैसो की बलि लोकतंत्र के उत्सव यानी मतदान के दौरान आगे भी चढ़ेगी या नही। हमलोग तो मर गये हैं। हमारी आत्माएं आपसे सवाल कर रही है।  प्रश्न यह नहीं है हम मर गये। बरन सवाल तो यह है क्या मतदान के नाम पर बंग भूमि में जो हुआ क्या यहां लोकतंत्र जिन्दा है। चलो मान लेते हैं कि इस देश में लोकतंत्र काफी बलिष्ठ है। हम जैसे तो उपर जाते रहेगें लेकिन सज्जनों यह यह तो बताएं कि क्या बलिष्ठ लोकतंत्र का शरीर और कितने घाव बर्दास्त करेगा। लोकतंत्र के नाम पर गनतंत्र और जबरातंत्र किस तरह के परिवर्तन को अंजाम देता रहेगा। हमरी आत्माएं साफ देख रही है कि लोकतंत्र की स्थिति आजादी के बाद से भीष्म पितामह की तरह दिख रहे है जो बाणो की शय्या पर अपनी मौत का इंतजार करने कर रहे हैं। सवाल यह जरुर है कि अगर लोकतंत्र की आड़ में इस तरह से गनतंत्र और जबरातंत्र हावी रहा तो तो क्या लोकतंत्र बच पाएगा? देश की बात को थोड़ी देर के लिये छोड़ दें तो पश्चिम बंगाल में आजकल ऐसे ही हालात हैं। राज्य में लोकतंत्र के उत्सव के दौरान जिस तरह से हत्या, लूट, गुंडागर्दी और मारपीट का नजारा रहा क्या इसी लोकतांत्रिक व्यवस्था की परिकल्पना बापूजी व बाबा साहब ने की थी। 

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने ‘मेरे सपनों का भारत’ में पंचायत राज के बारे में जो विचार व्‍यक्‍त किये थें वह आज भी सियासत की मार के आगे उनकी अवधारणा की कसौटी खरा उतरता नहीं दिख रहा है। गांधी जी ने कहा था- “अगर हिंदुस्‍तान के हर एक गांव में कभी पंचायती राज कायम हुआ, तो मैं अपनी इस तस्‍वीर की सच्‍चाई साबित कर सकूंगा, जिसमें सबसे पहला और सबसे आखिरी दोनों बराबर होंगे या यों कहिए कि न तो कोई पहला होगा, न आखिरी।” साफ कहे तो बापू के विचार पंचायत राज के बारे में बहुत स्‍पष्‍ट थे। उनका मानना था कि, जब पंचायत राज स्‍थापित हो जायेगा त‍ब लोकमत ऐसे भी अनेक काम कर दिखायेगा, जो हिंसा कभी भी नहीं कर सकती “। ऐसे में साफ नजर आ रहा है की बापू का सपना लहूलुहान हो रहा है। पंचायत राज की परिकल्पना बापू की ही थी। अदालतों के बोझ को कम करने के लिये उन्होंने ही पंचायती राज की अवधारणा को मूर्तरुप दिया था। लेकिन इस राज्य में पंचायत चुनाव के तहत मतदान के दिन जिस तरह से खून की होली खेली गई और जो हालात है वह किसी से छिपा नही है। दरअसल प्रत्यक्ष तौर पर बापू के सपनों का ही खून किया गया है। यह दिगर बात है कि कत्ल का दोषी किसी एक को नहीं ठहराया जा सकता है। मतदान के दिन हम जैसे तमाम लोग मार दिये गये, कितने लोग अभी भी अस्पताल में दर्द झेल रहे हैं। मतदान के दिन ऐसे दृश्य रहे कि जैसे बंगाल को देस के दुश्मन आतंकियों  ने नहीं लोकतंत्र के नाम पर देश व समाज के कथित बाहुबलि ठेकेदारों ने हाईजैक कर लिया था।


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--जगदीश यादव--
कोलकाता 
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