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शनिवार, 11 अगस्त 2018

दलाई लामा ने नेहरू पर टिप्पणी के लिए खेद जताया

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बेंगलुरू, 10 अगस्त, तिब्बती आध्यामिक नेता दलाई लामा ने सन् 1947 में भारत व पाकिस्तान के विभाजन के लिए प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को जिम्मेदार ठहराने के लिए शुक्रवार को खेद जताया और अपनी मातृभूमि छोड़कर आए हजारों निर्वासित तिब्बतियों को आश्रय देने के लिए उनका आभार जताया। 83 साल के नोबेल पुरस्कार विजेता ने यहां एक कार्यक्रम से इतर संवाददाताओं से कहा, "मेरे बयान (नेहरू) ने विवाद पैदा किया है। अगर मैंने कुछ गलत कहा है तो मैं माफी मांगता हूं।" उत्तरी गोवा के संकुएलिएम में 8 अगस्त को गोवा इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट के छात्रों को संबोधन में दलाई लामा ने कहा था, "महात्मा गांधी प्रधानमंत्री का पद मोहम्मद अली जिन्ना को देना चाहते थे। लेकिन नेहरू ने इनकार कर दिया। वह आत्मकेंद्रित थे। उन्होंने कहा कि मैं प्रधानमंत्री बनना चाहता हूं। भारत व पाकिस्तान एक रहते, अगर जिन्ना को उस समय प्रधानमंत्री बनाया गया होता।" हालांकि, दलाई लामा ने अपनी टिप्पणी के लिए शुक्रवार को माफी मांगी और चीन द्वारा सन् 1950 में पहाड़ी देश पर कब्जा कर लिए जाने के बाद अपनी मातृभूमि छोड़कर आए भिक्षुओं सहित हजारों तिब्बतियों का समर्थन करने के लिए नेहरू का आभार जताया। 14वें दलाई लामा ने कहा, "नेहरू के साथ मेरे घनिष्ठ संबंध थे। उन्होंने तिब्बती विचारों को संरक्षित रखने के लिए अलग स्कूलों का सुझाव दिया था।" लामा यहां 'धन्यवाद कर्नाटक' कार्यक्रम में अपने विचार प्रकट कर रहे थे। इसका आयोजन केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (सीटीए) ने किया। यह कार्यक्रम 'धन्यवाद भारत-2018' का एक हिस्सा है, जिसका आयोजन भारत में रह रहे तिब्बती समुदाय ने देश में अपने 60 वर्षो के निर्वासन को चिन्हित करने के लिए किया है। पूर्वोत्तर तिब्बत के तक्तसेर गांव में पैदा हुए दलाई लामा को दो साल की उम्र में ही धर्मगुरु की मान्यता दी गई। माना गया कि उनका 13वें दलाई लामा थुबतेन ग्यातो के रूप में पुनर्जन्म हुआ है। वह वर्ष 1959 में चीनी शासन के खिलाफ असफल विद्रोह के बाद भारत चले आए। भारत तब से 100,000 से ज्यादा तिब्बतियों का घर बना हुआ है, जो कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश व अन्य राज्यों में बसे हैं।
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