बिहार: 2000 से विधान सभा में एंग्लो इंडियन समुदाय के प्रतिनिधि का मनोयन नहीं - Live Aaryaavart

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सोमवार, 11 फ़रवरी 2019

बिहार: 2000 से विधान सभा में एंग्लो इंडियन समुदाय के प्रतिनिधि का मनोयन नहीं

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पटना,10 फरवरी। भारतीय संविधान में अनुच्छेद 331-में प्रावधान किया गया है कि राष्ट्रपति अधिकतम दो एंग्लो इंडियन समुदाय के प्रतिनिधि को लोकसभा में मनोनीत कर सकते हैं। वहीं अनुच्छेद 333-में प्रावधान किया गया है कि राज्यपाल अधिकतम एक सदस्य एंग्लो इंडियन समुदाय के प्रतिनिधि को राज्य विधान सभा में मनोनीत कर सकते हैं। मूल रूप से यह प्रावधान केवल 1960 तक के लिए था पर 95 वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2009 के जरिये इसे 2020 तक बढ़ा दिया गया है। इस समय देश में इस समुदाय की संख्या डेढ़-दो लाख के बीच है। बिहार में  इस समुदाय की संख्या 10-15 हजार के बीच है। जो 38 जिलों में रहते हैं। बिहार बंटवारा के बाद 15 नवम्बर,2000 से बिहार विधान सभा में एंग्लो इंडियन समुदाय के प्रतिनिधि का मनोयन नहीं हो रहा है। इससे उक्त समुदाय के लोगों में आक्रोष व्याप्त है।

आखिर कौन हैं एंग्लो इंडियन
संविधान के अनुच्छेद 366 (2) के अनुसार एंग्लो इंडियन ऐसे किसी व्यक्ति को माना जाता है जो भारत में रहता हो और जिसका पिता या कोई पुरुष पूर्वज यूरोपियन वंश के हों। यूरोपीय मूल के थे पर उनका जन्म भारत में हुआ और यही पर पले बढ़े। उन लोगों को भी एंग्लो इंडियन माना गया, जिनके पिता यूरोपीय व मां भारतीय थीं। आजादी के बाद संविधान बनाया जा रहा था तो इस वर्ग के चर्चित नेता फ्रैंक एंथोनी ने संसद में एंग्लो इंडियन के लिए सीट आरक्षित किए जाने की मांग जवाहरलाल नेहरु से की । उनकी दलील थी कि इस वर्ग के ज्यादातर लोग विदेश जा चुके हैं। उनकी कुल संख्या तब करीब पांच लाख थी जो कि देश भर में बंटे हुए थे। इसलिए उनका संसद तक पहुंच पाना असंभव था। जवाहरलाल नेहरु ने उनके लिए लोकसभा में दो सीटों के मनोनयन की व्यवस्था कर दी। संसद की तरह ही राज्यों की विधानसभाओं में एंग्लो इंडियन्स के लिए प्रावधान किया गया है।

मुल्क आजाद हुआ तो एंथोनी संविधान सभा के सदस्य बने
फ्रैंक एंथोनी जबलपुर से थे। लेकिन दिल्ली आकर वकालत करने लगे। बाद में एंथोनी एंग्लो इंडियन असोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष बने। मुल्क आजाद हुआ तो एंथोनी संविधान सभा के सदस्य बने। एंथोनी की दलील थी कि एंग्लो इंडियन समुदाय इतना छोटा है कि वो अपने दम पर प्रतिनिधी चुनकर संसद नहीं भेज सकता। लेकिन संसद में कोई तो होना चाहिए जो उनकी बात करे। ये व्यक्ति उन्हीं की कौम से होना चाहिए। इन्हीं दलीलों के मद्देनजर संविधान में अनुच्छेद 331 जोड़ा गया। अनुच्छेद- 331 के तहत राष्ट्रपति लोकसभा में एंग्लो इंडियन समुदाय के दो सदस्य नियुक्त करते हैं। इसी अनुच्छेद के तहत फ्रैंक एंथोनी 7 बार बतौर सांसद मनोनीत हुए। ऑल इंडिया एंग्लो इंडियन समुदाय के अध्यक्ष फ्रैंक एंथोनी मरने तक मनोनीत होते रहे। उन्होंने आइसीएसई शिक्षा प्रणाली विकसित करने में योगदान दिया व इसके पहले अध्यक्ष बने।

बिहार बंटवारा के बाद से बिहार में सदस्य नहीं
संविधान के अनुच्छेद 333 के तहत अगर किसी सूबे के राज्यपाल को ये लगता है कि राज्य के एंग्लो इंडियन समुदाय को सदन में प्रतिनिधित्व की जरूरत है लेकिन सदन में चुने हुए प्रतिनिधियों के बीच एंग्लो-इंडियन समुदाय को समुचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला है, अनुच्छेद 170 में किसी बात के होते हुए भी, यदि किसी राज्य के राज्यपाल की यह राय है कि उस राज्य की विधान सभा में एंग्लो इंडियन समुदाय का प्रतिनिधित्व आवश्यक है और उसमें उसका प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है तो वह उस विधान सभा में उस समुदाय का एक सदस्य नामनिर्देशित कर सकेगा। आजादीके बाद में बड़ी संख्या में एंग्लो इंडियन परिवारों ने बिहार में रहने का फैसला किया था। संयुक्त बिहार के समय में रांची के मैक्लुस्कीगंज में इनकी बड़ी आबादी रहती थी। इस समुदाय को विधानसभा में प्रतिनिधित्व देने के लिए कई राज्यों की विधानसभा में इन्हें मनोनीत किया जाता है। इनमें बिहार भी एक था। राज्य बंटवारे के बाद एंग्लो इंडियन कोटा झारखंड में गया। जिस वजह से झारखंड विधानसभा के लिए हर पांच साल बाद एक व्यक्ति को विधायक मनोनीत किया जाता है। झारखंड,उत्तराखंड, छतीसगढ़, तेलेगंना, उत्तर प्रदेश,मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश में एंग्लो इंडियन समुदाय का प्रतिनिधित्व विधान सभा में दिया गया है। बिहार विधान सभा में एंग्लो इंडियन समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं हो पा रहा है। इसको लेकर बिहार के एंग्लो इंडियन समुदाय में सरकार के खिलाफ आक्रोश व्याप्त है। इसको लेकर बिहार के एंग्लो इंडियन समुदाय में सरकार के खिलाफ आक्रोश व्याप्त है। यह समुदाय खरमास को नहीं जानते हैं। इनका कहना है कि बिहार सरकार ने एंग्लो इंडियन समुदाय को संवैधानिका अधिकार से वंचित कर रखा है। बिहार विधान सभा में समुदाय के एक व्यक्ति को मनोनीत करना ही है।

क्या कहना है पूर्व विधायक आल्फ्रेड जौर्ज डी रोजारियो का?
एंग्लो इंडियन समुदाय से बिहार विधान सभा में 1995 में मनोनीत पूर्व विधायक आल्फ्रेड जौर्ज डी रोजारियो का कहना है कि उत्तर प्रदेश के बंटवारा के बाद उत्तराखंड और छतीसगढ़ प्रदेश बना। यहां के महामहिम राज्यपालों ने तुरंत एंग्लो इंडियन समुदाय के एक सीट सुरक्षित कर एक व्यक्ति को मनोनीत कर दिया है। उसी तरह बिहार बंटवारा के बाद झारखंड प्रदेश बना। इसके आलोक में समुदाय विशेष का विधायक झारखंड विधान सभा में प्रतिनिधित्व करने लगे। इस समय समुदाय से विधायक ग्लेन जोसेफ गोलस्टेन हैं। मगर बिहार प्रदेश में ऐसा नहीं हो सका। 15 नवम्बर,2000 से ही एंग्लो इंडियन समुदाय को उपेक्षित छोड़ दिया गया है। उन्होंने कहा प्रदेश के राज्यपाल सूबे के कैबिनेट की सलाह लेते हैं। इसलिए मनोनीत सदस्य कमोबेश सत्ताधारी पार्टी के करीबी ही होते हैं। एक सवाल के जवाब में पूर्व विधायक आल्फ्रेड जौर्ज डी रोजारियो ने कहा कि 1995 से 2000 तक पूर्व मुख्यमंत्री लालू-राबडी के शासनकाल में बिहार विधान सभा में मनोनीत हुए थे। यह समझा जाता है कि राजद के समर्थक हैं। अगर मुख्यमंत्री नीतीष कुमार समझते हैं कि राजद के समर्थक हैं तो मुझे मनोनीत नहीं करें। मगर एंग्लो इंडियन समुदाय से किसी व्यक्ति को बिहार विधान सभा में जरूर ही मनोनीत करें। आगे कहते हैं कि संविधान की 10वीं अनुसूचि के मुताबिक कोई एंग्लो इंडियन सदन में मनोनीत होने के छह महीने के अंदर किसी पार्टी की सदस्यता ले सकते हैं। ऐसा हो जाने पर वो पार्टी व्हिप से बंध जाते हैं। माने उन्हें पार्टी के कहे मुताबिक सदन में वोट डालना पड़ता है। मनोनीत सदस्यों के पास वो सारी ताकतें होती हैं, जो एक आम सांसद के पास होती हैं। लेकिन वो राष्ट्रपति चुनाव में हिस्सा नहीं ले सकते. डेरेक ओ ब्रायन संभवतः अकेले एंग्लो इंडियन थे, जिन्होंने 2012 में राष्ट्रपति चुनाव में वोट डाला था. लेकिन ऐसा इसलिए हुआ था कि डेरेक तृणमूल कांग्रेस से सांसद हैं।

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