विशेष : सिद्धिदात्री राजा दक्षपुत्री और देवाधिदेव महादेव की अर्द्धांगिनी माँ कामाख्या - Live Aaryaavart

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बुधवार, 26 जून 2019

विशेष : सिद्धिदात्री राजा दक्षपुत्री और देवाधिदेव महादेव की अर्द्धांगिनी माँ कामाख्या

kamakhya-temple
अरुण कुमार (आर्यावर्त) अम्बूवाची मेला जो कि प्रत्येक वर्ष उस वक्त शुरू ही जाता है जब सूर्य आद्रा नक्षत्र में प्रवेश करते हैं।जब सूर्य आद्रा में प्रवेश करते हैं तो माता का द्वार बन्द ही जाता है,क्योंकि इस वक्त माता रजस्वला (पीरियड)में रहती हैं।प्राचीन काल से ही सूर्य प्रति वर्ष 22 जून को ही आद्रा में प्रवेश करते हैं यह एक आश्चर्य है।यह द्वार 22 जून से 25 जून तक बन्द रहता है।इसके बाद 26 जून को प्रातः काल से ही दर्शनार्थी दर्शन के सुखों से आविर्भूत होते हैं।और निटी वर्षों की भाँति आज दिनांक 26 जून 2019 माँ कामाख्या का पट खुला और लाखों दर्शनार्थी माता का दर्शन करेंगे।माँ कामाख्या 51 शक्ति पीठों में से एक है,और यह सबों की कामना पूर्ण करनेवाली भगवती शिवा ही हैं।शास्त्र वर्णित कथा है कि राजा दक्ष के द्वारा किये गए यज्ञ में शिव का भाग यानी स्थान नहीं रखने से माँ सती आवेश में आकर स्वयं को राजा दक्ष द्वारा किये जानेवाले यज्ञ के हवन कुण्ड में आहूत कर दीं।वैसे सती के कुण्ड में प्रविष्ट होने पर शिव के गण वीरभद्र आदि ने यज्ञ को विध्वंस कर दिया और इस बात की खबर जब स्वयं आशुतोष प्रभु शिव को मिले तो शिव यज्ञ स्थल पहुँचकर सती की अधजले शरीर को अपने कंधे पर उठाकर आवेश में सम्पूर्ण सृष्टि का ही विनाश करने को उद्धत हो निकल पड़े।इस बात की खबर जब विष्णु को मिली तो विष्णु युक्ति पूर्वक शिव के क्रोध को शान्त करने के लिये सर्व प्रथम उनके कांधे का भार धीरे धीरे हल्का करने की सोचे और माता सती के अंग-प्रत्यंग को अपने सुदर्शन से काटकर अलग करने लगे उसी क्रम में माता का अंग-प्रत्यंग 51 स्थानों पर गिरे और वो 51 शक्तिपीठों में सिद्धिदात्री माता का पूजनीय स्थान बन गया जिसमें एक यह कामाख्या भी शामिल है।कामाख्या आसाम गुवाहाटी स्टेशन से लगभग 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित नीलगिरी पर्वत पर है।यहाँ माता का योनि प्रदेश गिरा था जिससे इसका नाम कामाख्या पड़ा।यहाँ दर्शन करनेवालों की कामना पूर्ति हिती है ऐसी मान्यता ही नहीं वल्कि सत्यता भी है।यहाँ माँ कामाख्या के मंदिर में भैरव के रूप में यानी (द्वारपाल के रूप में) गणेश विराजमान हैं।माता के दर्शन से पूर्व,दर्शन के लिये भैरव से अनुमति ली जाती है फिर माता का दर्शन किया जाता है।वैसे यह साधकों के लिये लागू है क्योंकि साधक को सभी नियमों को पालन करना होता है जो कि उसे पता भी होता है,साधकों को उनके गुरुओं के द्वारा इन सारी बातों की जानकारी दी जाती है।जिसका अनुपालन साधक वर्ग किया करते हैं।यह शक्तिपीठ आसाम (गुवाहाटी)के कामरूप जिला में स्थित है अतः इसे कामरुओ कामाख्या भी कहा जाता है।प्राचीन कथा है कि आज से सैकड़ों साल पूर्व या और भी इसके पूर्व कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं कि लोंगों का यहाँ आना बड़ा ही दुष्कर था।कारण यह था कि यहाँ आनेवाले तंत्र-मंत्र की सिद्धि के लिये आते थे वो भी वही लोग आते थे जिन्हें घर-समाज से विरक्ति हो गया होता था या घर समाज से तंग आकर किसी भी कारण वश स्वयं को माता के चरणों मे समर्पित कर देते थे।कहा जाता है कि यहां आनेवाले को भेड़-बकरी आदि बना दिया जाता था।शायद ऐसा हिता भी हो किन्तु मुझे तो ऐसा कभी भी प्रतीत नहीं हुआ,क्योंकि मैं भी तकरीबन 25 वर्षों से माता के दरबार में हाजिरी लगा रहा हूँ और उनके चौखट को चूमता आ रहा हूँ।हाँ एक बात दाबे के साथ कह सकता हूँ कि यह वाकई शक्तिपीठ है,यहाँ आनेवाले साधकों को ऊर्जा अवश्य ही प्राप्त होता है।साधक अगर अपने को साध ले तो साधक स्वयं शक्ति स्वरूप ही जाता है।यहाँ कुमारी पूजन विशिष्ट महत्व रखता है,साधक हों या गृहस्थ सभी यहाँ कुमारी पूजन अवश्य ही करते हैं।माता कामाख्या के साथ माँ वगला,भुवनेश्वरी,धूमावती,संकटा आदि के साथ दस महाविद्या भी यहाँ विराजती हैं।जिनके साथ साधकों के लिये भूतनाथ,उमानन्दा महादेव जो कि त्रिकुटा पर्वत पर विराजमान हैं,जहाँ स्टीमर से ब्रह्मपुत्र नदी को पार करके जाना होता है।इसके अलावा वशिष्ठ आश्रम आदि भी दर्शनीय एवं पूजनीय स्थल हैं।यह कामाख्या वही पीठ है जहाँ कभी नरबलि भी हुआ करता था,अब इसपर पूरी तरह निषेध कर दिया गया है।यह नरबलि उच्चकोटि के साधकों द्वारा दिया जाता था।अब तो न वैसा साधक रहा न ही वैसी पूजा।किन्तु माँ की महिमा आज भी वैसी ही है।माँ तो माँ हैं जिनका बखान करना किसके बुते की बात हो सकती है।बस जय माँ कामाख्या।

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