विशेष : मिले अगर राज तो कैसा दाग, कैसी फांस - Live Aaryaavart

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बुधवार, 13 नवंबर 2019

विशेष : मिले अगर राज तो कैसा दाग, कैसी फांस

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महाराष्ट्र में खूब राजनीतिक नाटक हो रहे हैं। कौन किसके साथ है,किसके साथ नहीं, यह समझना काफी कठिन है। सत्ता की मलाई खाने को सभी बेताब है लेकिन सत्ता के दावेदारों के बीच तालमेल के अभाव ने राज्य में राष्ट्रपति शासन के हालात पैदा कर दिए। अगर कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी  और शिवसेना में वैचारिक सामंजस्य होता तो सरकार बनाने के लिए बीस दिन कम नहीं होते। राज्य में राष्ट्रपति शासन लग गया है और इसी के साथ राज्य में सत्ता हथियाने के प्रयासों को जोर का झटका लगा है। राष्ट्रपति शासन को लेकर राजनीति तेज हो गई है। राज्यपाल के फैसले को न्यायपालिका में चुनौती दी जा रही है लेकिन इन तीनों दलों में कोई भी ऐसा नहीं है जो यह बता पाने में समर्थ हो  कि उनके द्वारा सरकार गठन का आधार क्या है? मुख्यमंत्री किस दल का होगा? राष्ट्रपति शासन स्थायी व्यवस्था नहीं है। इस व्यवस्था की आलोचना करने की बजाए सरकार बनाने की ईमानदारी कोशिश होना चाहिए और महाराष्ट्र के व्यापक हित का कॉमन एजेंडा तय किया जाना चाहिए।  

राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने सबसे बड़े दल भाजपा को सरकार बनाने का आमंत्रण दिया था लेकिन उसने स्पष्ट कर दिया है कि बदले हालात में सरकार बना पाना उसके लिए मुमकिन नहीं है। फिर राज्यपाल ने शिवसेना को मौका दिया। शिवसेना ने हाथ —पैर तो खूब मारे लेकिन राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस का समर्थन पत्र हासिल नहीं कर सकी। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को भी मौका मिला लेकिन वह भी सरकार बनाने का दावा तब तक नहीं कर पाई जब तक कि राज्यपाल ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की संस्तुति नहीं कर दी और उनकी संस्तुति पर केंद्रीय मंत्रिमंडल ने महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगाने पर मुहर लगा दी। राज्यपाल के निर्णय के खिलाफ शिवसेना सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच गई है। वह आरोप लगा रही है कि अगर राज्यपाल भाजपा को बहुमत हासिल करने के लिए तीन दिन का समय दे सकते हैं, तो उसे एक दिन कौन? उसके इस तर्क में दम हो सकता है लेकिन शिवसेना चुनाव परिणाम आने के दिन से ही राज्य में अपना मुख्यमंत्री बनाने की वायद कर रही है।  

सत्ता सुख मिले तो कैसा दाग और कैसी फांस? सत्ता मिलती दिखे तो सारे विरोध हवा हो जाते हैं। गरल सुधा हो जाती है। शत्रु भी मित्र हो जाते हैं। राजनीति में भी कुछ ऐसा ही है। वहां शत्रुता और मित्रता दिखावे की होती है। सत्ता मिलती है तो अछूत को भी गले लगाया जा सकता है और पवित्रता और सादगी को,ईमानदारी औरशुचिता को किनारे लगाया जा सकता है। सत्ता के लिए बाहर से समर्थन दिया जाता है, भीतर से समर्थन दिया जाता है। समर्थन तो समर्थन होता है। बाहर से दें या भीतर से दें। इससे फर्क क्या पड़ता है? साथ का पाप तो लगता ही है। कीचड़ में जाने पर पांव तो गंदे होते ही हैं। आश्वर्य तो तब होता है जब कीचड़ में आकंठ सने लोग भी कीचड़ से बचे साफ— सुथरे लोगों पर तंज कसते हैं। चुनाव में कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस भाजपा और शिवसेना का विरोध करती रहीं। शिवसेना और भाजपा ने इन दोनों दलों की मुक्त कंठ से आलोचना की। शिवसेना ने तो चुनाव परिणाम के दिन से ही राज्य में अपना मुख्यमंत्री बैठाने की कवायद शुरू कर दी है।उसके नेता संज राउत कहां—कहां नहीं बैठते, लेकिन अंत में उन्हें अस्पताल में ही जगह मिली।
  
एनसीपी ने पत्र लिखकर राज्यपाल से सरकार बनाने के लिए 48 घंटे और समय मांगा था जिसे राज्यपाल ने स्वीकार नहीं किया और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की संस्तुति कर दी। यह तीसरा मौका है जब महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगा है। महाराष्‍ट्र के 59 वर्षों के राजनीतिक इतिहास में साल 1980 में फरवरी से जून और इसके बाद साल 2014 में सितंबर से अक्टूबर तक तक राष्ट्रपति शासन लगा था। सरकार बनाने में विफलता के लिए कांग्रेस को दोषी ठहराया जा रहा है जबकि कांग्रेस इन आरोपों को खारिज कर रही है। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने कहा कि अगर शिवसेना को समर्थन न देना होता तो कांग्रेस ने दिल्ली में इतनी लंबी चर्चाएं नहीं की होतीं। कांग्रेस भी शिवसेना और कांग्रेस को कम समय देने पर सवाल उठा रही है लेकिन उसे सरकार बनाने का मौका नहीं दिया गया। मतलब साफ है कि कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और शिवसेना सभी चाहते हैं कि मुख्यमंत्री उन्हीं के दल का हो। पहले कांग्रेस और एनसीपी ने यह मांग की थी कि जब तक शिवसेना केंद्र में भी एनडीए से अलग नहीं होती तब तक उस पर समर्थन का विचार नहीं किया जा सकता।
  
कांग्रेस ने जो सक्रियता राष्ट्रपति शासन की संस्तुति के बाद दिखाई है, ऐसा अगर वह पहले करती तो यह दिन नहीं देखने पड़ते। कांग्रेस के अधिकांश विधायक नहीं चाहते कि शिवसेना को समर्थन दिया जाए। संजय निरुपम तो पहले से ही इसका विरोध कर रहे हैं और कांग्रेस—शिवसेना के गठबंधन में कांग्रेस को भारी नुकसान होता देख रहे हैं। शिवसेना मुंबई और मुंबईकरों की हिमायती है। वह उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों का विरोध करती है। उन पर हमले करती है। बाल ठाकरे अपने आंदोलन के शुरुआती दिनों में गुजरातियों का, दक्षिण भारतीयों का विरोध करते थे। ' लुंगी हटाओ, पु्री बजाओ का नारा देते थे लेकिन कांग्रेस सभी राज्यों की पार्टी है। शिवसेना केवल मराठों की चिंता करती है। मराठा मानुष की बात करती है। उसका उग्र हिंदुत्व भी कांग्रेस और एनसीपी के लिए खतरे की घंटी साबित हो सकती है।  शिवसेना के साथ जाने पर दोनों ही दलों के मुस्लिम और उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात और दक्षिण भारत के अन्य राज्यों के मतदाता कांग्रेस और एनसीपी से नाराज हो सकते हैं और इसका बड़ा खामियाजा उन्हें इन राज्यों में भी भुगतना पड़ सकता है।

 महाराष्ट्र देश की आर्थिक राजधानी है जहां सभी राज्यों के लोग रहते हैं। अन्य राज्यों के लोग कांग्रेस का समर्थन करते रहे हैं। अगर कांग्रेस शिवसेना के साथ जाती है तो यह उन लोगों के साथ विश्वासघात होगा। धर्मनिरपेक्षता के  शिविर  की अगुवा रही कांग्रेस के लिए उग्र हिंदुत्व की पैरोकार शिवसेना से हाथ मिलाना ऐसा फैसला नहीं है, जिसे वह सहजता से ले सके। उसके दोनों हाथों में दो लड्डू हैं एक सरकार में सहयोग बनने का और दूसरा सांप्रदायिक पार्टी से हाथ मिलाने से लगने वाले दाग का लड्डू। जो सोनिया गांधी आज शिवसेना के साथ जाने के लिए दिल्ली से महाराष्ट्र तक अपनी राजनीति के घोड़े दौड़ाती फिर रही हैं, उन्हें पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने 2017 में आई अपनी पुस्तक 'द कोएलिशन इयर्स: 1996 to 2012’ जरूर पढ़नी चाहिए। इसमें उन्होंने लिखा है कि 2012 में राष्ट्रपति के चुनाव के वक्त उन्होंने जब शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे से मुलाकात की थी तो सोनिया गांधी इससे बहुत खफा थीं। शिवसेना के समर्थन से मुखर्जी राष्ट्रपति बने थे, लेकिन कांग्रेस को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि सोनिया गांधी के विदेशी मूल पर सवाल उठाने में शिवसेना सबसे आगे रही। शिवसेना ने कांग्रेस और एनसीपी का जितना विरोध किया है, वह किसी से छिपा नहीं है। कांग्रेस की चिंता इस बात को लेकर भी हो सकती है कि शिवसेना का साथ देने पर अगर उत्तर भारतीयों और अल्पसंख्यकों ने कांग्रेस का साथ छोड़ दिया तो उसकी हालत क्या होगी? क्या महाराष्ट्र में उसकी हालत उत्तर प्रदेश से भी बदतर नहीं हो जाएगी।  महाराष्ट्र के दो पूर्व मुख्यमंत्री भी पहले ही कांग्रेस आलाकमान सोनिया गांधी को आगाह कर चुके हैं कि अगर  शिवसेना-एनसीपी को सरकार बनाने  में कांग्रेस ने साथ दिया तो नुकसान कांग्रेस को ही होगा।  कांग्रेस की 'केरल लॉबी' भी शिवसेना का समर्थन करने का विरोध कर रही है। उसे डर है कि शिवसेना का समर्थन करने पर अल्‍पसंख्‍यक वोट बैंक उससे छिटक सकता है। शिवसेना ‘50:50’ के फार्मूले  का पालन न करने का भाजपा पर आरोप लगा रही है लेकिन वह किसे मुख्यमंत्री बनाना चाहती है, यह उसे नहीं पता। उसके विधायक दल के नेता एकनाथ शिंदे हैं। मुख्यमंत्री तो विधायक दल का नेता होता है फिर आदित्य ठाकरे और उद्धव ठाकरे की दावेदारी यह साबित करती है कि शिवसेना खुद भ्रमित है और पूरे देश को भ्रमित कर रही है।
  
शिवसेना का आरोप है कि भाजपा जनादेश का अपमान कर रही है लेकिन जनादेश का अपमान कौन कर रहा है, इस पर भी विचार किया जाना चाहिए। शरद पवार ने कहा था कि एनसीपी और कांग्रेस को जनता ने विपक्ष में बैठने का जनादेश दिया है, वह विपक्ष में बैठना पसंद करेंगे। सरकार बनाने का जनादेश भाजपा—शिवसेना को मिला है, वह सरकार बनाएं लेकिन शिवसेना की अपना मुख्यमंत्री बनाने  की जल्दबाजी के चलते सारा खेल बिगड़ गया। शिवसेना का तो इससे पहले भी फड़नवीस के प्रति रवैया सहयोगात्मक हीं रहा। वह तो आस्तीन के सांप की तरह भाजपा को पूरे पांच साल डंसती ही रही। अगर ऐसे में भाजपा उससे पल्ला छुड़ा रही है और उसके साथ सरकार बनाने से गुरेज कर रही है। विपक्ष में बैठने का इरादा जाहिर कर रही है तो इसमें गलत क्या है?  समालोचक तो ठीक है लेकिन बकवादियों को झेलना कितना ठिन होता है, इसे तो फड़नवीस ही बेहतर बता सकते हैं। जिन्हें विपक्ष में बैठने का जनादेश है, अगर वे मुख्यमंत्री बनने को बेसब्र हो रहे हैं तो इससे अधिक जनादेश का अपमान भला और क्या हो सकता है?  



-सियाराम पांडेय 'शांत'-

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