समीक्षा : प्रेम, भक्ति और कला-संस्कृति की परम्पराओं से जोड़ता है : 'राग कसूमल' - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शनिवार, 30 मई 2026

समीक्षा : प्रेम, भक्ति और कला-संस्कृति की परम्पराओं से जोड़ता है : 'राग कसूमल'

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'राग कसूमल,' डॉ रमेश चन्द मीणा का वेरा प्रकाशन,जयपुर द्वारा सद्यः प्रकाशित उपन्यास है।' राग कसूमल' एक प्रतीकात्मक नाम है, जो राजस्थानी कला, संगीत एवं संस्कृति की उस भावमयता को द्योतित करता है,  जिसमें प्रेम,  जीवन -संगीत और भक्ति की वह उच्चावस्था जो लौकिक से अलौकिक की ओर, प्रकृति से पराप्रकृति की ओर ले जाती है, तभी  तो मीरां भी प्रियतम से मिलने के लिए 'कहो तो कसूमल साड़ी रंगावाँ' का खुला उद्घोष करती हैं। कसूमल राजस्थानी संस्कृति का वह गहरा और उष्ण लाल रंग है, जो पारम्परिक पगड़ियों, शादी-विवाह के परिधानों, त्योहारों और हिन्दी लोकगीतों में प्रेम, ओज और माधुर्य का प्रतीक माना जाता है। वैसे तो लेखक ने इसके लिए  'उपन्यास ' शब्द का प्रयोग किया है। पर इसे आद्योपांत पढ़ने के बाद , मुझे लगा 'राग कसूमल' को उपन्यास के स्थान पर' काव्यात्मक उपन्यास' कहना अधिक ठीक रहेगा। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर लिखा गया यह उपन्यास केवल इतिहास का पुनराख्यान भर नहीं है, अपितु इसमें इतिहास, संस्कृति, कला, संगीत,श्रृगांर और प्रेमाभक्ति का अद्भुत और मनोहारी संगम है। इतिहास को कला और संस्कृति के संदर्भ में समझने की दृष्टि है। कला के माध्यम से जीवन तलाशने, सँवारने और जीन की ललक का राग है।  कुँवर सुन्दरि, बनी ठनी का दैहिक नख-शिख सौन्दर्य वर्णन पढ़ते समय कई बार मन सहसा रीतिकालीन दरबारी श्रृंगार वर्णन में पँहुच गया---" उसके उरोज दो पूर्ण चन्द्र कला जैसे थे। वस्त्रों की पतली परत के भीतर उनकी रेखाएँ झलक उठती थीं--। कटि-प्रदेश अत्यंत लचीला और क्षीण था, वहाँ की लोच और लय देखकर  लगता जैसे पवन भी ठहरकर प्रणाम करता हो--।" पर यह प्रशंसनीय है कि आंगिक सौन्दर्य वर्णन में लेखक कहीं भी सधे कलाकार की तरह फिसला नहीं ,अपितु सूक्ष्म कला दृष्टि द्वारा उसे राधा कृष्ण के आध्यात्मिक प्रेम से बड़ी कुशलता से ऐसा जोड़ दिया  कि पाठक नख-शिख वर्णन में भक्ति संवलित औदात्य सौन्दर्य की भाव धारा में आकंठ डूब कर आत्मतोष महसूस करने लगता है।


समस्त उपन्यास- मारवाड़ की सुबह, दिल्ली की दोपहर, बीनकर, कृष्ण गढ़ की नींव,रूपसिंह-रूपंगढ़, बल्ख-बुखारा मुहिम, श्रीनाथ विग्रह, राजसिंह-बांकावती व सुन्दर कुँवरी, पंचनिधियाँ,सांवतेस,पौरुष गाथा, राग रंग,विरोधी बयार, चित्रशाला, नागरी दास आदि बाईस शीर्षकों में विभाजित है। कथा सुगठित और सुव्यवस्थित है। कहीं पर भी तारतम्यता , कथान्विति की धारावाहिकता विश्रृंखलित दृष्टिगोचर नहीं होती। प्रत्येक कथा शीर्षक आगे आने वाले शीर्षक से स्वाभाविक रूप से विकसित होता दिखाई देता है। कथानक की कड़ी से कड़ी सहजता से  जुड़ती है। पात्रों की अधिक भरमार नहीं हैं। प्रमुख पात्र तीन हैं- राजा सांवत स़िह(नागरी दास) सुन्दर कुँवरि( नागर रमणी,बनी-ठनी, रसिक बिहारी) निहाल चन्द्र। समस्त कथानक इनके ईर्द-गिर्द घूमता दिखाई देता है। गौण पात्रों में-कृष्ण सिंह,राजा समोखन सिंह,महाराज रूप सिंह,मान सिंह, राज सिंह, बहादुर सिंह आदि उल्लेखनीय हैं। उपन्यास में मारवाड़ से लेकर किशनगढ़, अरावली पहाड़ियां, दिल्ली, गोकुल  वृन्दावन तक का भौगोलिक सांस्कृतिक परिवेश ,वातावरण अपनी समस्त रंगोंहवा से महकता दिखाई देता है।यमुना तट कदम्ब की छाया में , गोकुल के मंदिरों में और वृन्दावन  की गली-गली में गूँजती कान्हा की मधुर वंशी और राधा की प्रेम भरी  पुकार किसका मन आकर्षित नहीं करती? लेखक मन यहाँ खूब रमता दिखाई देता है--'एक चाँदनी रात वे यमुना के तट पर बैठे थे। सांवत सिंह ने कहा' नागर रमणी, यह वृन्दावन हमारा असली घर है। यहाँ की धूल ने मेरे हृदय की सारी पीड़ा धो दी। बणी- ठणी ने उनके चिबुक को थामते हुए उत्तर दिया-" चितबन तुम मेरे बिहारी हो,और मैं तुम्हारी राधा। हमारा प्रेम यहाँ की कुंजों में अमर है।" उपन्यास में प्रेम, भक्ति ,संगीत, कलाऔर सांस्कृतिक  राजसी वातावरण, रहन-सहन,वेश-भूषा, धर्म ,अध्यात्म का परिदृश्य पाठकों को न केवल आकर्षित करता है , अपितु तत्युगीन भाव-भूमि का अहसास भी करवाता है। देशकाल, वातावरण के संयोजन में लेखक ने बड़ी कुशलता का परिचय दिया है। प्रसंगवश  मराठों से लेकर बल्ख- बुखारा मुहिम और अहमदशाह दुर्रानी के आक्रमण और दहशत का भी सजीव चित्रण है। श्रृंगार, शांत, और वीर रस का सुन्दर परिपाक हुआ है। कहीं-कहीं प्रसंग वश भयानक एवं करुण रस की छटा भी आकर्षित करती है। श्रृंगार, प्रेम, भक्ति, भजन, समर्पण, प्रकृति, पहाड़, झील, झरने,मंदिरों में आरती के समय का प्रफुल्लित और शांत वातावरण, युद्ध,सेना का पड़ाव, राजनीतिक षड्यंत्र,सत्ता की लड़ाई, पारिवारिक कलह, दैहिक प्रेम से ईश्वरीय प्रेममय उल्लास आदि विविध भावों, मनोभावों का ऐसा प्रभावी सम्मिश्रण है कि पाठक कथा सूत्र से बराबर बँधा रहता है। यही नहीं उपन्यास में प्रसंगानुकूल  स्थान-स्थान पर कवित्त, पद, भजन, दोहा आदि के लगभग 95  छोटे-बड़े पद्य खण्ड हैं। कहीं -कहीं तो इतने अधिक बड़े -बड़े पद्य खण्ड हैं कि पाठक का मन बोझिल हो जाता है और  कहीं न कहीं  उसकी रसानुभूति खण्डित होने लगती है। 


 भाषा परिष्कृत, सुबोध , सहज और संप्रेषणीयता से समन्वित है। अभिव्यक्ति सटीक और सपाट है। भाषा-शैली आकर्षक, प्रभावक और चुस्त-दुरुस्त है , कहीं पर भी शिथिलता और ऊबाउपन नहीं है। शब्द चयन संदर्भ एवं प्रसंगानुकूल है। जीवंत, अभिरचित, मूर्ति भंजक,सप्तपर्णी, पारिजात, प्रभात, रमणी, अर्घ्य, आश्विन, पूर्णिमा, तदुपरांत जैसे तत्सम शब्द हैं तो कपड़े, रातें, धरती, आँखें, भौंहें, हाथ,सावन आदि तद्भव शब्दों का भी प्रयोग है। यथा स्थान, देशज, अरबी -फारसी, अंग्रेजी, संकर, मारवाड़ी, राजस्थानी शब्दों के प्रयोग से भाषागत चारुता श्लाघनीय है।  चूँकि कथानक राजस्थान का है । अत: कहीं-कहीं पात्रानुसार पूरा का पूरा वाक्य मारवाड़ी में है-"यह धरती म्हारी नायं पराई हवा माई अपणा पण री सुगंध नी होवे।" शैली  काव्यात्मक- भावात्मक है।  वर्णनात्मक ,विवरणात्मक,विवेचनात्मक और व्याख्यात्मक शैली का भी यथास्थान सुष्ठु प्रयोग है, ।राजस्थानी भूभाग के गौरवमय  समृद्ध इतिहास, कला और संस्कृति के संदर्भों को आधार बनाकर लिखे गये उपन्यासों में यह उपन्यास निश्चित रूप से अपनी मजबूत जगह बनाने में सफल होगा-ऐसा मेरा विश्वास है। इतनी सुन्दर कृति के लिए लेखक को हृदय से साधुवाद।




समीक्षक : प्रो आदित्य कुमार गुप्ता।

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