सुना है फण्ड जुटाने के लिए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल अगस्त में विदेश दौरे पर जा रहे हैं। खबर है कि वे ऑस्ट्रेलिया और कनाडा में बसे पंजाबी एनआरआई को लुभाकर पार्टी के लिए फण्ड जुटाएंगे। अच्छी बात है! सबका अपना-अपना तरीका होता है। आपको याद होगा मायावती अपने जन्मदिन पर अपने चाहने वालों से नकद की फरमाइश करती रही हैं और चंदा जमा करने के लिए ढेरों अन्य हथकंडे भी अपनाती रही हैं! मायावती से याद आया तथाकथित समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव सैफई महोत्सव के नाम पर करोड़ों रुपये एक रात में ही स्वाहा कर देते रहे हैं और उत्तर प्रदेश के छोटे-बड़े व्यवसायियों से चंदे के नाम पर उगाही भी करते रहे हैं। ज़ाहिर है, पार्टी के लिए धन जुटाने के लिए सभी आलाकमान हलकान मचाये रहते हैं! खैर, बात केजरीनन्दन की हो रही थी। हम जानते हैं कि दिल्ली में भारी बहुमत से सत्ता हासिल करने के बाद अपनी खांसी का इलाज कराने के लिए केजरी लम्बी छुट्टी पर गए थे। टीवी मीडिया की जो बन्दर नाच करने की जो आदत है तो हमें ये भी मालुम हो गया कि केजरीवाल चुनाव प्रचार के समय छोले कुलचे, पिज़्ज़ा और कोल्ड ड्रिंक का ही सेवन किया करते थे। नहीं उनके खाने पीने का ज़िक्र करने का मतलब कतई निजी होना नहीं है मेरा बस ये सवाल है कि क्या वे पिज़्ज़ा चंदे के पैसे से खाते थे? वही चंदा जो लाने के लिए इस बार वो कनाडा और ऑस्ट्रेलिया की यात्रा पर जा रहे हैं।
मैंने पिज़्ज़ा की बात क्यों की? दरअसल चुनाव प्रचार के समय मैंने काफी करीब से आम आदमी पार्टी को देखा। कहीं उसके वोटर की हैसियत से भी खड़ा रहा हूँ तो कहीं उसके कार्यकर्ता के हैसियत से भी और कहीं स्वेच्छा से भी। क्योंकि ये पार्टी मुझे व्यक्तिगत रूप से शुरू से लुभाती रही है। आज भी कहीं न कहीं एक सॉफ्ट कॉर्नर है इस दल को लेकर!
चुनाव प्रचार के समय आम आदमी पार्टी के एक नेता के रोड शो से पहले मैंने देखा पिज़्ज़ा, बर्गर और पेस्ट्री बांटे जा रहे हैं। एक चमचमाती कार आई। उस से कुछ लड़के-लड़कियां निकले और जो भी वहां बीस-तीस लोग थे सबको खाने को कुछ न कुछ दे रही थे। तो हमने पूछा कि ये किसकी तरफ से है? तो किसी ने कहा पार्टी की तरफ से। एक पेस्ट्री मैंने भी खायी थी! दरअसल मैं कहना ये चाह रहा हूँ कि एक पार्टी के स्तर पर कई तरह के खर्चे किसी भी दल को करने होते हैं। इसमें कुछ गलत भी नहीं!
अन्ना से अलग होने के बाद केजरीवाल जब आंदोलन कर रहे थे तो हमने कई बार देखा है कि कुछ गिने-चुने कार्यकर्ताओं के लिए मिनरल वाटर की बोतलें आती थीं तो कुछ बुजुर्ग और अपरिचित प्रशंसक इधर-उधर प्यासे भटका करते! माने ये कि चंदा तब भी आता था और पार्टी उसे अपनी सुविधा से खर्च भी करती थी।
दरअसल आम आदमी पार्टी में लोगों ने एक उम्मीद देखी और कई लोग आर्थिक रूप से मदद करने के लिए आगे आये। देश-विदेश से चंदा आने लगा और पार्टी खड़ी हुई! योगेन्द्र यादव को जब बेआबरू कर पार्टी से निकाला गया तो एनडीटीवी पर यादव अपनी तमाम बातों के बीच ये कहना भी नहीं भूले कि पंजाब में कैसे एक पांच साल की बच्ची ने अपना गुल्लक उन्हें दे दिया था और वे उन तमाम लोगों के लिए दुखी हैं जो इस पार्टी के साथ भावनात्मक स्तर पर जुड़े हुए हैं!
लेकिन, जिस तरह से सरकार बनाने के बाद आम आदमी पार्टी की भद्द पिटी है और कुछ हुआ या न हुआ हो जो लोग पार्टी को दिल खोल कर चंदा दे रहे थे उन्होंने अपने हाथ रोक लिए। दो वजह से, एक आम आदमी पार्टी की साख में आती कमी और दूसरी, लोगों की ये सोच कि अब तो पार्टी सरकार में है, उसे चंदे की क्या ज़रूरत? यहीं, से मुश्किल शुरू होती है।
वैसे केजरी को पैसे कि कितनी कदर है इस बात का अंदाजा आप विज्ञापनों पर उसके द्वारा किये जा रहे खर्चे का आंकलन कर जान सकते हैं! सरकार का पैसा बेफिजूल के विज्ञापनों पर जाया करती केजरी सरकार हास्यास्पद सी लगती है। अब देखिये न, अभी एक विज्ञापन टीवी पर चल रहा है जिसमें केजरी पीएम से अपील कर रहे हैं कि दिल्ली पुलिस उनके हवाले सौंप दीजिये। ठीक है अपील से कोई परेशानी नहीं है। लेकिन, इस अपील के पीछे का गणित देखिए। टीवी पर प्रति दस सेकंड के लिए सरकार ढाई हज़ार रुपये खर्च कर रही है। ये ढाई हज़ार रुपये तो सरकारी रेट है जो डीएवीपी के छूट के बाद है, यही किसी निजी कंपनी के लिए दस सेकंड की कीमत 30 से 40 हज़ार रुपये है। दिल्ली सरकार द्वारा बनाये गए दो-दो मिनट लम्बे एड अगर एक बार चले तो लगभग पच्चास हज़ार रुपये पानी में! दिन में बीस बार और दस चैनल पर भी ये विज्ञापन आ गया तो करोड़ों रुपये हवा में उड़ गए समझिये। मेरा मानना है कि ये खर्च बेफिजूल है। इस से अच्छा तो आप इन पैसों का पिज़्ज़ा खा लीजिये या पेस्ट्री बंटवा दीजिये! सरकार में रहते हुए मनमाना खर्च करने वाली आम आदमी पार्टी, पार्टी के स्तर पर अभी कंगाल है। ज़ाहिर है चंदा अब पहले की तरह नहीं आ रहा और केजरी का सारा ड्रामा शोर और प्रचार पर ही टिका है तो दूर की सोच रखने वाले केजरी को कल को ज़्यादा से ज़्यादा पैसे चाहिए होंगे जब पार्टी का विस्तार होगा या अगली बार चुनाव होगा! ऐसे में चंदे के जुगाड़ में कनाडा या ऑस्ट्रेलिया के बाद वो लन्दन और अरब भी जाएँ तो भला किसे आश्चर्य होगा?
हीरेंद्र झा,
युवा पत्रकार,
दिल्ली

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