- भाजपा विरोधी वोट से जीत कर आए नीतीश कुमार मोदी से मिला रहे सुर में सुर.
- दलित-गरीबों व अल्पसंख्यकों पर बढ़ते अत्याचार की संरक्षक भाजपा को बोलने का हक नहीं.
पटना 23 नवम्बर 2016, भाकपा-माले राज्य सचिव कुणाल ने नीतीश सरकार द्वारा जारी रिपोर्ट कार्ड पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि बिहार के विकास के असली प्रश्नों से रिपोर्ट कार्ड का कोई वास्ता नहीं है. शुरूआती दिनों में भूमि सुधार, बटाईदारी कानून, शिक्षा सुधार जैसे सवालों पर जो बातें भी की जाती थीं, उसकी अब चर्चा तक नहीं की जा रही है. इसके बिना बिहार के विकास की हर बात बेमानी है. पहले की तरह दलित-गरीबों, महिलाओं, छात्र-युवाओं और कमजारे वर्ग के लोगों से नीतीश कुमार का विश्ववासघात बदस्तूर जारी है. गरीबों के न्याय की आकांक्षा का लगातार गला घोंटा जा रहा है, आंदोलनकारी नेताओं की हत्या हो रही है, सत्ताधारी पार्टी के विधायक बलात्कार जैसी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं, महिलाओं पर चैतरफा हमला हो रहा है, टाॅपर्स घोटाले हो रहे हैं और बेरोजगारी भत्ता के नाम पर युवाओं को झुनझुना थमा दिया गया है. सरकार का एक साल का कार्यकाल दराअसल बिहार की जनता से विश्वासघात का एक साल है. नीतीश कुमार की नाकामयाबी पर भाजपा बहुत बढ़-चढ़कर बोल रही है, लेकिन भाजपा को इन प्रश्नों पर बोलने का कोई हक नहीं है. दलित-गरीबों, महिलाओं व अल्पसंख्यक समदुाय पर हमले के मामले में भाजपा नंबर एक पर है. इसी के संरक्षण में आज बिहार में सामंती-सांप्रदायिक ताकतों का मनोबल एक बार फिर से बढ़ा है और वे पूरे राज्य में सांप्रदायिक फसाद खड़ा करने में लगे हुए हैं.
मोदी के सुर में सुर मिला रहे नीतीश, जनादेश 2015 से विश्वासघात : 2015 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की सांप्रदायिक उन्माद व उत्पात की राजनीति के खिलाफ नीतीश कुमार को बिहार की सत्ता मिली थी, लेकिन वे आज मोदी के सुर में सुर मिलाकर जनादेश 2015 का लगातार अपमान कर रहे हैं. केंद्र सरकार द्वारा की गयी नोटबंदी, जो अब हत्यारी नोटबंदी के रूप में कुख्यात हो चुकी है, उसे नीतीश कुमार समर्थन कर रहे हैं और नरेन्द्र मोदी के बारे में कह रहे हैं कि वे बाघ की सवारी कर रहे हैं. इस नोटबंदी की वजह से बिहार में अब तक 7 लोगों की जान जा चुकी है. बिहार सरकार किसी भी प्रकार का दायित्व नहीं निभा रही है. उसका यह रूख बेहद निंदनीय है. जीएसटी मामले में भी सरकार ने बढ़चढ़कर उसे विधानसभा से पारित करवाया. दरअसल, नीतीश कुमार उन्हीं कारपोरेटपरस्त रोजगार विहीन विकास के माॅडल की नीतियों को आगे बढ़ा रहे हैं, जिसे मोदी सरकार पूरे देश पर थोप रही है. मोदी सरकार के पाकिस्तान विरोधी युद्धोन्माद को भी नीतीश कुमार ने जायज ठहराया है. जबकि संघी ताकतें पाकिस्तान विरोध को मुसलमान विरोध का रूप दे रही है. इसी वजह से राज्य में कई जगह सांप्रदायिक घटनायें घटीं.
दंगाई ताकतों को रोकने में विफल: भाजपा द्वारा बिहार में सांप्रदायिक उन्माद फैलाने की साजिशें लगातार रची जा रही हैं, और बिहार सरकार उसे रोक पाने में पूरी तरह असफल रही है. कुछेक जगह पर तो राजद का सामाजिक आधार भी इन दंगों में शामिल रहा है. यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है. इसके पूर्व, धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देने वाली नीतीश सरकार द्वारा गठित आयोग ने फारबिसगंज पुलिस गोलीकांड में जनता को ही दोषी ठहराया और हत्यारे पुलिसवालों को बाइज्जत बरी कर था. भजनपुरा के गरीबों की जान भी गई, जमीन भी गई और उन्हें अब जेल की सजा भी काटनी होगी. दरअसल, नीतीश सरकार राज्य में एक नियंत्रित सांप्रदायिक माहौल बनाए रखना चाहती है ताकि इसका राजनीतिक इस्तेमाल किया जा सके. इसी वजह से संाप्रदायिक ताकतों पर कड़ी कार्रवाई नहीं की जा रही है.
बढ़ता अपराध/महिला सशक्तीकरण का दिखावा: बिहार में अपराध में कोई कमी नहीं आई है. हत्या, अपहरण आदि की घटनायें लगातार बढ़ रही है. सत्ताधारी दल के विधायक बलात्कार जैसे जघन्य अपराध में संलिप्त पाए गए हैं. राजद विधायक राजवल्लभ यादव की विधानसभा सदस्यता खारिज करने के प्रस्ताव को खारिज करके नीतीश सरकार ने अपना असली रूख जाहिर कर दिया है. भाजपा, राजद, कांग्रेस अथवा जदयू इन सभी पार्टियों के वरिष्ठ नेता बलात्कार जैसी घटनाओं में शामिल रहे हैं. राज्य में महिलाओं के ऊपर लगातार हमले हो रहे हैं.
न्याय का संहार - दलितांे-गरीबों पर बढ़ते हमले: तथाकथित न्याय के साथ विकास की नीतीश-लालू सरकार में भाजपा समर्थित सामंती-सांप्रदायिक ताकतों का मनोबल लगातार बढ़ता ही जा रहा है. बेगूसराय, नालंदा, भोजपुर, सिवान, दरभंगा आदि जिलों में अनेक दलित नेता-कार्यकर्ताओं की हत्यायें भाजपा समर्थित अपराधियों द्वारा की गयी. जिस तरह गुजरात के ऊना में तथाकथित गौरक्षकों ने दलितों के उपर बर्बर हमले किए, बिहार के मुजफ्फरपुर में भी भाजपा समर्थित सामंती ताकतों ने दलित युवकों के मुंह में पेशाब करने जैसी घृणास्पद घटना को बेखौफ अंजाम दिया. नीतीश कुमार ने इन ताकतों के सामने लगभग आत्मसमर्पण कर दिया है.
बिहार के विकास के बुनियादी सवालों से सरकार का पलायन: नीतीश कुमार बिहार के विकास के बुनियादी प्रश्नों से पूरी तरह पलायन कर गये हैं. भूमि सुधार, बटाईदारी कानून, समान स्कूल प्रणाली, कृषि आधारित उद्योगों के विकास, बंद व रूग्न उद्योगों को चालू करने की पहल के साथ समग्रता में गरीबी उन्मूलन तथा शिक्षा-स्वास्थ्य के क्षेत्र में गुणात्मक बदलाव पर जोर देने के बदले नीतीश सरकार सात निश्चय की जुमलेबाजी कर रही है. वास-आवास, शिक्षा-स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण सवाल सिरे से गायब हंै. पिछले कार्यकाल में भूमिहीनों को 5 डिसमिल वासभूमि देने और पर्चाधारियों के लिए आॅपरेशन दखल-देहानी की बातें भी आज एजेंडा से बाहर कर दी गई हैं. ढांचागत कृषि संकट और खासकर लघु-मध्यम किसानों और बटाईदारों की बढ़ती तबाही के चलते राज्य में गरीबों की तादाद में भारी इजाफा हुआ है. बिहार की खेती बटाईदरों के सहारे चल रही है, लेकिन बटाईदारों की सुरक्षा, सशक्तीकरण और सरकारी मदद सरकार की कार्ययोजना में शामिल नहीं है. सीमांचल के इलाके में सिकमी बटाईदारों को उनके अधिकार से वंचित किया जा रहा है. चंपारण के इलाके में हजारो एकड़ बेनामी जमीन है, लेकिन गरीबों को कहीं भी कब्जा नहीं दिलाया जा रहा है. उलटे जिस जमीन पर वे बरसो से बसे हैं, वहां से उन्हें उजाड़ा जा रहा है. सरकार के दावे के विपरीत पलायन में और तेजी आई है. सभी राज्यों में न्यूनतम मजदूरी में बढ़ोतरी की गयी है, लेकिन बिहार में इस मामले में कोई पहल नहीं है. राशन-किरासन में भयानक लूट है. त्रुटिपूर्ण सूची के आधार पर खाद्य सुरक्षा लाभार्थियों और प्रधानमंत्री आवास की सूचियां तैयार की गयी है. इन योजनाओं पर भ्रष्ट नौकरशाही-बिचैलिया तंत्र का कब्जा है. बिहार में दुग्ध, मछली, साग-सब्जी और बागवानी को लेकर इन्द्रधनुषी क्रांति के जो सपने दिखलाए गए वो जमीन पर उतरा ही नहीं है. इसलिए बिहार के विकास का प्रश्न और विकास की जनोन्मुखी दिशा का सवाल राज्य के राजनीतिक विमर्श का अहम मुद्दा बना हुआ है. इनके विकास के नारे ने दम तोड़ दिया है.
बाढ़-सुखाड़ के निदान की बजाए महज बयानबाजी: राज्य बाढ़-सुखाड़ दोनों समस्याआंे से लगातार पीड़ित है, बावजूद इसके नीतीश सरकार जिम्मेवारी से बचने के लिए हमेशा दिल्ली-पटना का सवाल उठाती रहती है. हाल की बाढ़ के लिए फरक्का बांध को दोषी ठहराकर उन्होंने अपनी जिम्मेवारियों से मुंह मोड़ लिया. दरअसल सरकार के पास पानी प्रबंधन की कोई योजना है ही नहीं और अगर कुछ है भी तो उसे लागू नहीं कर रही है. विशेषज्ञों के अनुसार गंगा में इस बार बाढ़ पुनपुन व सोन के पानी के कारण आई. पुनपुन पर औरंगाबाद में बराज बन चुका है लेकिन नहर निकालने का लंबित है. सोन पर कदवन डैम बनाने की योजना महज कागज पर है. इसके जरिए न सिर्फ सोन नहर में पानी की समस्या हल की जा सकती है बल्कि बाढ़ नियंत्राण में भी इसकी भूमिका हो सकती है. सोन नहर का आधुनिकीकरण और जलाशय निर्माण की योजनाएं सरकारी फाइलों की शोभा बढ़ा रही हंै. अन्य नहर परियोजनाएं भी सफेद हाथी बनी हुई हैं. सिंचाई का रकबा विस्तार की बजाए दिन-प्रतिदिन सिकुड़ता जा रहा है और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का क्षेत्रफल बढ़ रहा है. करोड़ों की लागत से खड़ी की गयी नलकूप प्रणाली पूरी तरह से ध्वस्त है.
शिक्षा-रोजगार से खिलवाड: ़ टाॅपर घोटाले ने तो बिहार की शिक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी है. इसने राजनेताओं व शिक्षा माफियाओं के नापाक गठजोड़ को उजागर करने के साथ ही बिहार में शिक्षा नीति की असफलता को भी साबित कर दिया है. वित्तरहित शिक्षा नीति की वजह से आज हमारी शिक्षा चैपट हो गयी है. नीतीश कुमार समान स्कूल प्रणाली लागू करने से लगातार भागते रहे हैं. नीतीश सरकार ने दलित व ओबीसी छात्रों की छात्रवृत्ति में कटौती कर दी औश्र सरकारी नौकरी में दलितों की प्रोन्नति पर रोक लगा रखी है. इसका विरोध करने पर दलित छात्रों पर बर्बर तरीके से दमन ढाया गया. बेरोजगारी भत्ता के नाम पर दो साल के लिए इंटर पास युवाओं को तुच्छ राशि थमा दी गयी है. सरकार बेरोजगारों को न तो रोजगार दे रही है और न ही बेरोजगारी भत्ता.
शराबबंदी पर कर रहे राजनीति: शराबबंदी बिहार की जनता की लोकप्रिय मांग थी, अंततः नीतीश कुमार को शराबबंदी करनी पड़ी है. लेकिन अब वे इस पर अपनी राजनीति चमका रहे हैं. शराबबंदी से संबंधित लाए गए कानून के कई प्रावधान काले कानून के समान हैं, जिनका विरोध अतिआवश्यक है. हम मांग करते हैं कि शराबबंदी पर दृढ़ता से कायम रहते हुए, उसके काले प्रावधानों को वापस लिया जाए, उस समुदाय के लिए वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था की जाए जिनका यह पेशा रहा है, ब्लाॅक स्तर पर नशा मुक्ति केंद्र की स्थापना की जाए जिसमें आधुनिक सुविधायें मौजूद हों और बिहार में शराब की फैक्ट्रियों पर प्रतिबंध लगाया जाए.

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