बिहार उत्पाद अध्निियम, 2016 एवं इसके क्रियान्वयन के संबंध् में बुलाई गयी बैठक के लिए भाकपा-माले का प्रस्ताव - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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बुधवार, 23 नवंबर 2016

बिहार उत्पाद अध्निियम, 2016 एवं इसके क्रियान्वयन के संबंध् में बुलाई गयी बैठक के लिए भाकपा-माले का प्रस्ताव

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सर्वविदित है कि हमारी पार्टी पूर्ण शराबबंदी को लेकर लंबे समय से संघर्षरत रही है. जनता के आंदोलनों का ही नतीजा था कि सरकार को पूर्ण शराबबंदी करनी पड़ी. लेकिन इसका मूल स्वर आम जनता के ही खिलापफ है. यह कानून शराब पीने वालों के लिए जितना सख्त है, शराब मापिफयाओं व शराब उत्पादकों पर उतनी ही नरम है. कानून को राजनीतिक-प्रशासनिक संरक्षण में चल रहे शराब मापिफयाओं-उत्पादकों के तंत्रा पर हमला करना चाहिए था. इसकी बजाए यह आम लोगों पर ही कहर बरपा रहा है. इसलिए इसपर नए सिरे से विचार की जरूरत है.

इस संबंध् में  भाकपा-माले का निम्नलिखित प्रस्ताव है: 
1. पूर्ण शराबबंदी पर दृढ़ता से कायम रहते हुए हमारी मांग है कि उत्पाद अध्निियम, 2016 को आम जनता व शराब पीने वालों पर केंद्रित करने की बजाए राजनेता-प्रशासनिक संरक्षण में पल रहे शराब मापिफयाओं के तंत्रा पर हमला करना चाहिए. शराबबंदी कानून लागू होने के बावजूद आज भी शराब की स्मगलिंग जारी है और यह कारोबार समाप्त नहीं हुआ है. दूसरी ओर आम जनता के लिए यह कानून काला कानून साबित हो रहा है. न केवल शराब पीने वाले व्यक्ति, बल्कि पूरे परिवार और गांव को दंडित करने के कठोर कानून ने गोपालगंज कांड में बेहद नकारात्मक परिणाम दिए हैं. कड़े कानून के भय से लोग अस्पतालों तक नहीं गये, अथवा डाॅक्टरों ने उनकी भर्ती नहीं की. जिसकी वजह से कई लोगों की दर्दनाक मौत का उदाहरण हम सबके सामने है. प्रशासन को शक के आरोप में किसी को भी बिना वारंट के गिरफ्रतार करने का अध्किार है. राज्य के कई इलाकों से यह खबर आ रही है कि इसका इस्तेमाल गरीब व कमजोर वर्ग के लोगों के उत्पीड़न में किया जा रहा है.  इसलिए हमारी मांग है कि बिहार उत्पाद अध्निियम, 2016 पर नए सिरे से विचार करते हुए इसे शराब मापिफयाओं के तंत्रा पर केंद्रित किया जाए.

2.  शराब मापिफयाओं और खुद सरकार द्वारा पूरे राज्य में शराब बिक््रफी में प्रोत्साहन के कारण राज्य की बड़ी आबादी शराब की बुरी आदत का शिकार हो चुकी है. इसने परिवार व समाज को तबाह करके रख दिया, अपराध् वृ(ि में भी इसने बड़ी भूमिका निभाई. बावजूद, ये अपराध्ी नहीं है. इनके प्रति सरकार का रवैया सहानुभूतिपूर्ण होना चाहिए. इसलिए, हमारी मांग है कि प्रत्येक ब्लाॅक में नशा मुक्ति केंद्र की शुरूआत की जाए. जिन्हें शराब की लत है, उनके लिए मेडिकल, मनौवैज्ञानिक व हर प्रकार की सुविधा उपलब्ध् कराई जाए. सरकार को इस मद में आने वाले खर्च का मूल्यांकन करते हुए इसके लिए अलग से पफंड रिलीज करना चाहिए. सरकार को चाहिए कि शराब की बुरी लत से छुटकारा दिलाने के लिए पीड़ितों के सुधार के उपायों को बढ़ावा देे एवं नशाखोरी के खिलापफ सामाजिक चेतना पैदा करने का प्रयास करे.

3. बिहार जैसे गरीब राज्य में जहां दो जून की रोटी भी गरीबों के लिए बड़ी समस्या है, खाद्य पदार्थों का अखाद्य पदार्थ बनाने में उपयोग हो रहा है. गन्ना जैसे खाद्य पदार्थों का चीनी उत्पादन की बजाए एथनाॅल जैसे अखाद्य पदार्थों को बनाने में इस्तेमाल हो रहा है. राज्य सरकार ने लीची, गेहूं व मक्का से भी शराब बनाने का पफैसला अतीत में लिया था. इस पर अविलंब रोक लगनी चाहिए.

4. ताड़ी राज्य में कई जातियों का परंपरगात पेशा है. लेकिन शराबबंदी के कारण उनकी आमदनी खत्म होने से उनका परिवार गंभीर आर्थिक संकट का शिकार हो गया है. ताड़ी पर से रोक हटाने के बजाए सरकार को चाहिए कि उनके लिए वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था करे और जबतक रोजगार नहीं मिलता उनको गुजारा भत्ता दे.

5. यह बेहद शर्मनाक है कि भगोड़े विजय माल्या की शराब पफैक्ट्री किंगपिफशर पटना जिले के विक््रफम में अभी तक चल रही है. इसी तरह, पटना जिले के हाथीदह में मैकडोवेल कारखाना सहित कई शराब कारखाने चल रहे हैं. बिहार में शराब की पफैक्ट्रियों को तत्काल बंद किया जाए और शराब पफैक्ट्री के लिए किसानों की जिस जमीन का अध्ग्रिहण किया गया है, उसे किसानों को वापस किया जाए. शराब की पफैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूरों के लिए वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था की जाए.

6.  होम्योपैथिक प(ति पर काम करने वाले चिकित्सकों के लिए स्पिरिट रखने की मात्रा को घटा देने की वजह से होम्योपैथ से इलाज महंगा हो गया है. शराबबंदी कानून के पहले चिकित्सक एक पाउंड स्पिरिट खरीदते थे, लेकिन अब केवल 30 मिलीलीटर ही रख सकते हंै. इसकी वजह से इलाज महंगा हो गया है. यह सभी लोग जानते हैं कि इस प(ति द्वारा ज्यादातर गरीब-गुरबे ही अपना इलाज करवाते हैं, इसलिए हमारी मांग है कि होम्योपैथ के चिकित्सकों को स्पिरिट रखने की मात्रा पहले की तरह 1 पाउंड ही किया जाए. सरकार को शक है कि शराब के रूप में भी इसका इस्तेमाल हो सकता है. सरकार की चिंता वाजिब है, लेकिन इस नाम पर गरीबों का इलाज महंगा करना वाजिब नहीं है. इलाज के नाम पर लिए गए स्पिरिट के दुरुपयोग पर अंकुश के लिए सरकार अलग व्यवस्था कर सकती है.

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