भक्ति : आंसुओं में बह निकली भातृ विरह की वेदना - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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मंगलवार, 29 नवंबर 2016

भक्ति : आंसुओं में बह निकली भातृ विरह की वेदना

तीनों लोकों में न्यारी भगवान शिव की नगरी काशी के नाटी इमली भरत मिलाप में स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम अवतरित होते है। बन्धुत्व की अनूठी पवित्रतम निर्मल भाव निहित इस पांच मिनट की अलौकिक व मनोरम दृश्य को निहारने के लिए भारत ही नहीं सात समुंदर पार से भी लाखों श्रद्धालु पहुचते है। गोधूली बेला में राम-भरत, लक्ष्मण-शत्रुघ्न यानी चारों भाईयों के मिलन की इस अनोखी छटा को देखने को लिए श्रद्धालु लीला स्थल पर घंटो पहले से जमा हो जाते है  




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कहते है इस दिन जब सूरज डूबता है तब भगवान का अंश यहां के राम लक्ष्मण में आ जाता है। खासियत यह है कि यहां बनने वाले राम, लक्ष्मण, भरत व शत्रुघ्न सप्ताहभर पहले से अन्न सहित अन्य भोग विलासता वाली वस्तुओं का त्याग कर देते है। गंगा स्नान, पूजा-पाठ व फल आदि का ही सेवन करते है। कुछ ऐसे ही परंपरा के बीच बुधवार को धर्म एवं आस्था की नगरी काशी में विश्व प्रसिद्ध नाटी इमली के भरत मिलाप का मंचन बड़े ही धूमधाम से किया गया। आंखों में काजल, माथे पर चंदन, माथे पर लाल पगड़ी में सज-धज युवाओं के बीच गोधूली बेला में जब भगवान राम, लक्ष्ण, भरत व शत्रुघ्न आपस में गले मिले तो इस मनोरम दृश्य देख लोगों की आंखे भर आई। राजा रामचंद्र समेत चारों भाईयों के जयकारे से पूरा परिसर गूंजायमान हो गया। चारों भाईयों के इस पांच मिनट की अलौकिक व मनोरम दृश्य को निहारने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं का रेला उमड़ा था। क्या गलियां, क्या दीवारें, क्या घर, क्या छत। जिधर नजर जा रही थी, उधर आस्थावानों का रेला ही रेला। हर तरफ ठसाठस। घंटों इंतजार, मगर क्या मजाल कि कोई किसी को उसके स्थान से इंच भर भी डिगा दे। 

इस मौके पर हाथी पर सवार काशी नरेश के वंशज कुंवर अनन्त नारायण सिंह के हाथों लीला का शुभारंभ किया गया। प्रभु श्रीराम का रथ खीचने वाले बंधुओं द्वारा जयश्रीराम जयश्रीराम का उद्घोष पूरे वातावरण को भक्तिरस से सराबोर हो गया। आसपास के घरों की छतों से फूलों की वर्षा होती रही। मैदान में भरत मिलाप एवं राम के राजतिलक प्रसंग की प्रस्तुति दी गई। और जब आया भगवान श्रीराम व भाई भरत के मिलाप का नयनाभिराम दृश्य, भीग उठीं हर किसी की पलकें। श्रीरामचंद्र का जयकारा और आस्था इस कदर परवान चढ़ी पूरा वातावरण भक्तिरस में सराबोर हो गया। पांच मिनट के इस दृश्य को नजरों में साल भर बसा लेने को हर कोई आतुर दिखा। बच्चे, जवान, बूढ़े, महिलाएं सब के सब इस अद्भूत मिलन को एकटक निहारते रहे। इस नयनाभिराम दृश्य को जनसमूह ने तो सजल नेत्रों से देखा ही, परंपरागत ढंग से राज घराने के सदस्यों के साथ चार गजों (हाथी) पर सवार होकर पहुंचे काशी नरेश महाराज कुंवर अनंत नारायण सिंह ने भी इस अविस्मरणीय दृश्य को अपनी पलकों में कैद किया। यह लीला लगभग 475 वर्ष पुरानी है। लीला के शुभारंभ के दौरान श्रीराम को महाराज अनंत नारायण सिंह ने सोने की गिन्नी सौंपी। यह दृश्य तब देखने को मिला जब महाराज ने गज पर सवार होकर लॉग पुष्पक विमान की फेरी लगाई। श्रीराम को गिन्नी सौंपी। भगवान को गिन्नी देने की परम्परा बरसों से चली आ रही है। 

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इस दौरान भव्य चारों भाईयों की शोभायात्रा निकाली गई। रथ पर सवार राम, लक्ष्मण, सीता, हनुमान, भरत, शत्रुघ्न समेत अन्य देवी-देवताओं का जगह-जगह स्वागत किया गया। लोगों ने शोभायात्रा में शामिल चारों भाईयों को भगवान की प्रतिमूर्ति मानकर उन्हें नमन किया। मान्यता है कि प्रभु श्रीराम के चैदह वर्ष वनवास काटने व लंका पर अपनी विजय पताका लहराने के बाद जब अयोध्या की ओर आगमन होते हैं तो इसकी सूचना मिलने पर उनके अनुज भरत उनके दर्शन को पाने के लिए एक संकल्प लेते है कि अगर गोधुली बेला तक प्रभु के दर्शन ना हुए तो वह अपने प्राण त्याग देंगे, लेकिन लीलाधारी प्रभु श्रीराम गोधुली बेला तक भरत के सामने उपस्थित हो जाते हैं। उन्हें देख भरत उनके पैरों में गिर जाते हैं जिस पर श्रीराम उन्हें गले से लगा लेते हैं। इस दृश्य को मंच पर कलाकारों ने बेहद संजीदगी के साथ निभाया। इसे देख दर्शक भाव-विभोर हो गए। इसके बाद धूमधाम से राम का राजतिलक किया गया। यह मंचन मर्यादा पुरुषोत्तम राम का चरित्र मनुष्य को आदर्शों पर चलने की सीख देता है। तुलसी के रामचरित में वर्णित हर पात्र समाज के आदर्श चरित्र का चित्र प्रस्तुत करता है। राम आदर्श पुत्र हैं तो भरत आदर्श भाई। राम के वनवास के बाद राजपाठ मिलने पर भी भरत ने राम की चरण पादुका सिंहासन पर रखकर सेवक की तरह राज संभाला। हर भाई यदि भरत के गुणों को आत्मसात करे तो घर घर में होने वाली महाभारत बंद हो जाएगी। 

‘लीन्ह मनुज अवतार’ यानी ईश्वर ने स्वयं मनुष्य का रूपाकार ग्रहण कर राम के रूप में पृथ्वी पर अवतरित हुए। इसकी जीती-जागती मिसाल काशी में विजया दशमी के दूसरे दिन नाटी इमली इलाके में भरत मिलाप मंचन में देखने को मिलता है। चारों भाईयों के मिलन की मात्र पांच मिनट के इस अलौकिक व मनोहारी छटा को देखने के लिए देश-विदेश से लाखों की संख्या में श्रद्धालु जुटते है। कहते है प्रभु श्रीराम के चैदह वर्ष वनवास काटने व लंका पर अपनी विजय पताका लहराने के बाद जब अयोध्या की ओर आगमन होते हैं तो इसकी सूचना मिलने पर उनके अनुज भरत उनके दर्शन को पाने के लिए एक संकल्प लेते है कि अगर गोधुली बेला तक प्रभु के दर्शन ना हुए तो वह अपने प्राण त्याग देंगे लेकिन लीलाधारी प्रभु श्रीराम गोधुली बेला तक भरत के सामने उपस्थित हो जाते हैं। उन्हें देख भरत उनके पैरों में गिर जाते हैं जिस पर श्रीराम उन्हें गले से लगा लेते हैं। भाई प्रेम के इस अनूठे प्रसंग को नाटी इमली में इस प्रकार से प्रस्तुत किया जाता है कि इसे देखने वाले लोग भाव विभोर हो उठते है। 

त्याग, अपनत्व, बन्धुत्व की अनूठी पवित्रतम निर्मल भाव निहित इस भरत-मिलाप में उस भरत का राम से मिलन दर्शाया जाता है जो राम का वनवास सुनकर पिता की मृत्यु क्षण भर के लिए ही सही भूल से गए, “भरतहि बिसरेहु पितु मरन, सुनत राम वन गौनु”। मान्यता है कि संत सिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास ने इस परंपरा की शुरूवात की थी। गोस्वामी तुलसीदास के शरीर त्यागने के बाद उनके समकालीन संत मेधा भगत काफी विचलित हो उठे थे। एक बार तुलसीदास ने उन्हें सपने में दर्शन दिए। उनकी प्रेरणा से संत मेधा भगत ने नाटी इमली में रामलीला के मंचन की शुरुआत की। तभी से यह परंपरा लगातार चली आ रही है। यहां जैसे ही राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न एक-दूसरे को गले लगाते है मौजूद लोगों की आंखे छलछला जाती है। भगवान को अपने बीच पाकर भक्तों का रोम रोम पुलकित हो उठता है। चारों भाइयों के अलौकिक रूप की झलक पाकर पूरा माहौल जयकारे से गूंजायमान हो उठता हैै।

खास बात यह है कि भरत मिलाप के निर्वासन के 14 साल और उसके भाई, भारत के साथ अपने पुनर्मिलन के बाद भगवान राम के अयोध्या लौटने की स्मृति में मनाये जाने वाले नाटी इमली में भरत मिलाप लीला के मंचन के सम्मान में काशी के सभी जगहों की रामलीलाएं बंद कर दी जाती है। कहते है नाटी इमली में करीब 470 साल से भरत मिलाप का मंचन किया जाता है। मान्यता है कि 470 साल पुरानी इस लीला में भगवान राम स्वयं धरती पर अवतार लेते हैं। तुलसीदास ने काशी के घाटों पर बैठकर रामचरितमानस की रचना की थी। साथ ही सबसे पहले उन्होंने ही कलाकारों को इकट्ठा कर रामलीला का मंचन शुरू कराया था। बाद में उन्हीं के प्रेरणा से संत मेधा भगत ने इसका विस्तार किया। माना जाता है जिस चबूतरे पर भरत मिलाप का मंचन होता है, वहां कभी भगवान राम ने संत मेधा भगत को साक्षात दर्शन दिए थे। इस लीला में भूतपूर्व काशी नरेश भी सम्मिलित होते हैं। भरत-मिलाप एक संक्षिप्त लीला या झाँकी मात्र है। इसमें राम-जानकी एवं लक्ष्मण बनवासी वेश में एक मंच पर खड़े रहते हैं, उनके आगमन को सुनकर भरत जो राम के समान ही तपस्वी वेश में हैं तथा शत्रुघ्न आते हैं और राम के चरणों पर गिर जाते हैं। राम एवं लक्ष्मण उन्हें उठाते हैं तथा चारों परस्पर मिलते हैं। तत्पश्चात पांचों स्वरुपों को विमान या रथ पर बिठाकर ढोया जाता है। विमान को काशी के व्यापारी वर्ग इस विश्वास से ढोते हैं कि उनका व्यापार अच्छा चलेगा। ऐसा विश्वास किया जाता है कि भरत-मिलाप के समय मेधाभगत को स्वरुपों में साक्षात भगवान के दर्शन हुए थे। आज भी क्षण भर के लिए स्वरुपों में ईश्वरत्व आ जाता है, ऐसा विश्वास है। इस लीला की महिमा ही है कि स्वयं काशी नरेश अपने रामनगर स्थित राजमहल से निकल कर प्रभु के दर्शन और परिक्रमा के लिए हाथी पर सवार होकर लीला में श्रद्धा व्यक्त करते हैं। चित्रकूट रामलीला की प्राचीनता ही इसकी धरोहर है। 




(सुरेश गांधी)

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