बिहार : संवैधानिक आरक्षण को तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है : श्याम रजक - Live Aaryaavart

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शुक्रवार, 8 मई 2020

बिहार : संवैधानिक आरक्षण को तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है : श्याम रजक

try-to-remove-reservation-shyam-rajakपटना,08 मई। बिहार के उघोग मंत्री हैं श्याम रजक। किलर कोरोना काल में भी मंत्री जी आरक्षण के मुद्दे को छोड़े नहीं हैं। उन्होंने पीएम नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखकर आग्रह किया है कि एससी/एसटी आरक्षण के विषय एवं क्रीमीलेयर का प्रश्न उठा कर समाज में कटुता उत्पन्न किया जा रहा है। एससी/एसटी समाज के दलित वर्ग को कुंठित एवं समाज तोड़ने की साजिश की जा रही है। इसके साथ ही पीएम नरेन्द्र मोदी से आरक्षण के प्रावधान को संविधान के 9वीं अनुसूची में शामिल करनें की मांग की है।

पीएम को लिखे पत्र में कहा 
आज जब पूरा विश्व कोरोना संकट से गुजर रहा है तथा पूरा भारत आपके निर्देशों का पालन कर रहा है। ऐसे में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के आरक्षण के विषय पर उत्पन्न कटुता से समाज के महादलित वर्ग के लोग अपने को कुंठित महसूस कर रहे हैं। भारत के संविधान का मूल स्वरूप समतामूलक समाज की स्थापना करना है। इसी संदर्भ में संविधान के अनुच्छेद 15  खंड 3 में यह प्रावधान किया गया है की अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए संविधान में विशेष अवसर दिया जाएगा। भारत में जाति व्यवस्था के अंतर्गत छुआछूत की प्रताड़ना इन जातियों को सहन करना पड़ता था। संविधान निर्माताओं ने इसी व्यवस्था के फलस्वरूप छुआछूत के रहते संविधान में यह भी प्रावधान किया गया अनुच्छेद 17 में कोई भी व्यक्ति किसी के साथ किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करेगा। किस अनुच्छेद में यह भी जिक्र किया गया है की यदि कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति के साथ उनके जाति एवं उनके द्वारा गंदा काम करने के फलस्वरूप भेदभाव करता है या छूत-अछूत करता है तो उसे अपराधिक मामला माना जाएगा और कानून के अंतर्गत उन्हें सजा दी जाएगी। संविधान के लागू होने के 70 वर्ष के बाद भी आज हिंदू समाज में जातिगत व्यवस्था है इसी जातिगत व्यवस्था के कारण छूत और अछूत की व्यवहार व्याप्त है। शहरी क्षेत्र में या पढ़ाई-लिखाई में प्रगति हो जाने के कारण इस व्यवस्था में कमी आई है परंतु देहाती क्षेत्रों में अभी भी यह व्यवस्था व्याप्त है। इसी क्रम में भारत के संविधान के प्रावधान के अनुसार अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों को विशेष अवसर के अंतर्गत आरक्षण का प्रावधान किया गया है। आरक्षण का आधार नौकरी पाना या आर्थिक उन्नति करना नहीं है और यह कोई रोजगार पाने का साधन भी नहीं है। अभी भी चाहे कोई व्यक्ति जो अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का है वह किसी भी पद पर या कितना भी धनवान हो जाए उनसे अछूतपन नहीं जाता है। प्रोन्नति में आरक्षण का उद्वेश्य है कि नीति निर्धारण एवं महत्वपूर्ण विभागीय फैसले लेने वाले पदों पर अनुसूचित जातिध्जनजाति के लोग भी पहुॅच सकें। ऐसे में जबकि आरक्षित पदों पर बैकलाॅग की स्थिति बनी रहती है, पद खाली रहते हैं, ऐसी स्थिति में प्रोन्नति वर्तमान स्वरूप में उलट-फेेर से अनुसूचित जातिध्जनजाति के लोग उच्च पदों पर नहीं पहुॅच पायेंगे। यह बड़ी विडम्बना है कि नौकरियों में बैकलाॅग की स्थिति रहते हुए भी लोगों में भ्रांतिया फैली हुई है कि आरक्षण से गरीबों को लाभ नहीं मिलता।

आजादी के चैहत्तर वर्ष (74 वर्ष) बीत जाने के बाद भी सदियों से प्रताड़ित समाज का एक बड़ा वर्ग सामाजिक प्रतिष्ठा से वंचित है। जब संविधान में इतने प्रावधान होने के बावजूद अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति को समाज में सामान्य वर्ग की हैसियत प्राप्त नहीं हो सकी हैं। बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने यह कहा था की जब तक हिंदू धर्म की व्यवस्था रहेगी तब तक समाज में जाति व्यवस्था रहेगी। जाति व्यवस्था के कारण ही संपन्न जाति अपने को आज भी अनुसूचित जनजाति एवं अनुसूचित जाति से अपने को ऊपर मानते हैं। अभी भी बहुत सारे लोगों के मस्तिष्क से यह विचार विलोपित नहीं हुआ है। इसी का फल है की आज भी कोई अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का लड़का ब्याह करने के लिए यदि घोड़े पर सवार होकर जाता है और वह उन इलाकों से या गांव से गुजरता है तो उसे घोड़े से उतारकर मारा पीटा जाता है। यह घटना बहुत ही दुखदाई और पीड़ादायक होता है। यदि समाज से आरक्षण मिटाना हो तो सबसे पहले हिंदू धर्म से जाति व्यवस्था को हटाना पड़ेगा। अगर सरकार लोकसभा में यह विधेयक पास करें कि सभी के लिए एक समान शिक्षा की व्यवस्था होगी जैसे चीन, जापान, अमेरिका, फ्रांस, इंग्लैंड इत्यादि देशों में कोई जाति व्यवस्था नहीं है और समान शिक्षा प्रणाली लागू है। अभी आए दिनों भारत में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के लिए दिए गए संवैधानिक आरक्षण को तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। यह एक बड़ी त्रासदी है कि आज जब विकास के फार्मूले को मूलमंत्र बना कर सरकारें चल रही हैं ऐसे में लोग अनुसूचित जातिध्जनजाति के विकास के ही दुश्मन क्यों बन गये है! अगर ऐसा होता है तो भारत में जातीय हिंसा उत्पन्न हो सकती है। भारत के अंतर्गत सद्भाव क्षमता एवं भारतीयता का महत्व बना रहे इसके लिए आरक्षण जैसे मुद्दे पर किसी भी प्रकार का किसी के द्वारा कोई विपरीत सुझाव, विचार या निर्देश आता है तो यह देश के बहुत बड़े समुदाय के लिए चिंता का विषय हो सकता है। प्रोन्नति में आरक्षण हेतु और परिणामी वरीयता देने से पहले पर्याप्त प्रतिनिधित्व जांचना या क्रिमीलेयर की व्यवस्था बनना उचित नहीं है। यह एक षडयंत्र की तरह है ताकि इस वर्ग की समाज में स्थिति सेवा करने वालों का वर्ग जैसा बना रहें। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी जी से आग्रह किया गया है कि भारत के संविधान में अनुसूचित जाति के एवं अनुसूचित जनजाति के लिए दिए गए आरक्षण के प्रावधान को भारत के संविधान के 9वीं अनुसूची में शामिल कर दिया जाए इससे सारी समस्याओं का निराकरण हो जायेगा और तत्संबंधी संविधान में आवश्यक संशोधन किया जाय। यदि यह प्रावधान हो जाता है तो भविष्य में आरक्षण के मुद्दे को कोई छेड़छाड़ नहीं करेगा और भारत में शांति और सद्भाव बना रहेगा। संसद सत्र के पूर्व वर्तमान समय में आप स्वंय वक्तव्य देना चाहेंगे ताकि कई तरह की उत्पन्न हो रही शंकाओं से अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों में उत्पन्न हो रही कूंठा को रोका जा सके। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के अलावा बीजेपी अध्यक्ष श्री जेपी नड्डा, कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गाँधी, जदयू० के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री नीतीश कुमार, बसपा अध्यक्षा सुश्री मायावती, लोजपा अध्यक्ष श्री चिराग पासवान, तृणमूल कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती ममता बैनर्जी,सपा अध्यक्ष श्री अखिलेश यादव, सीपीआई(एम) अध्यक्ष श्री सीताराम येचुरी, एनसीपी के अध्यक्ष श्री शरद पवार, बहुजन क्रांति मोर्चा के अध्यक्ष वामन मेश्राम,आम आदमी पार्टी अध्यक्ष श्री अरविंद केजरीवाल, जेएमएम अध्यक्ष श्री हेमंत सोरेन को भी इस संबंध में पत्र लिखा है।

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