विशेष : अक्षय नवमी: मिलेगा विष्णु जी और मां लक्ष्मी का वरदान - Live Aaryaavart

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गुरुवार, 11 नवंबर 2021

विशेष : अक्षय नवमी: मिलेगा विष्णु जी और मां लक्ष्मी का वरदान

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को अक्षय नवमी और आंवला नवमी कहा जाता है। कहते है इस दिन जो भी पुण्य और उत्तम कर्म किये जाते हैं, उससे प्राप्त पुण्य कभी नष्ट नहीं होते हैं। इस दिन व्रत रखकर विधि विधान से पूजा-पाठ करने से न सिर्फ भगवान विष्णु जी एवं मां लक्ष्मी, बल्कि बुद्धि और विद्या का भी वरदान मिलता है। आंवले या उसके पेड़ पर जल अर्पित करने, हरे रंग के कपड़े पहनें, सिर में आंवले का तेल लगाने, गले में हरा धागा पहननें, एवं ऊं धार्त्यै नमः मंत्र का जप करने से खत्म हो जाते है कई जन्मों के पाप। मान्यता है कि आंवला पेड़ की पूजा कर 108 बार परिक्रमा करने से समस्त मनोकामनाएं पूरी होतीं हैं  

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कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की नवमी के दिन आंवला नवमी मनाई जाती है। इसे अक्षय नवमी भी कहा जाता है क्योंकि इस दिन किया गया कोई भी शुभ कार्य अक्षय फल देने वाला होता है। अर्थात् उसके शुभ फल में कभी कमी नहीं आती। हमारे आयुर्वेद में आंवला को आयु और आरोग्य वर्धक कहा गया है। इस दिन आंवला के वृक्ष की पूजा करके उसके नीचे बैठकर भोजन करने का बड़ा महत्व है। माना गया है कि इससे वर्ष आयु-आरोग्य बना रहता है। इस दिन आंवला के फल का सेवन किया जाता है। इस साल आंवला नवमी 12 नवंबर, शुक्रवार को है। इस दिन सुबह 06 बजकर 50 मिनट से दोपहर 12 बजकर 10 मिनट तक पूजन का शुभ मुहूर्त है। आंवला नवमी तिथि का प्रारंभ 12 नवंबर, शुक्रवार सुबह 05 बजकर 51 मिनट से प्रारंभ होगी और 13 नवंबर, शनिवार को सुबह 05 बजकर 30 मिनट तक रहेगी। पौराणिक मान्यता के अनुसार त्रेतायुग का आरंभ आज के दिन से हुआ था। कहते है इसी दिन श्रीकृष्ण ने कंस के विरुद्ध वृंदावन में घूमकर जनमत तैयार किया था। इसलिए इस दिन वृंदावन की परिक्रमा करने का विधान है। मान्यता है कि इस दिन दान आदि करने से पुण्य का फल इस जन्म में तो मिलता ही है, अगले जन्म में भी मिलता है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा करने से व्यक्ति को पापों से मुक्ति मिलती है। कहते हैं कि इस दिन आंवले के पेड़ की पूजा करते समय परिवार की खुशहाली और सुख-समृद्धि की कामना करनी चाहिए। 


आंवला की उत्पत्ति ब्रह्माजी के आंसूओं से 

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पौराणिक मान्यता के अनुसार आंवला के वृक्ष की उत्पत्ति ब्रह्माजी के आंसूओं से हुई थी। एक समय ब्रह्माजी क्षीरसागर में कमल के फूल पर विराजमान होकर परब्रह्म की तपस्या कर रहे थे। ब्रह्मदेव कठोरतम तप में लीन थे। प्रभुभक्ति में लीन ब्रह्माजी की आंखों से ईश अनुराग होने पर आंसूओं की बूंदें टपकने लगी। ब्रह्माजी के आंसूओं के धरती की गोद में टपकते ही आंसूओं ने बीज रूप धारण कर लिया और फिर इन्ही बीजों से आंवले का पेड़ उत्पन्न हुआ। इस तरह से आंवले के पेड़ और फल का जन्म हुआ। इस दिन को आंवला नवमी, इच्छा नवमी, अक्षय नवमी, आरोग्य नवमी व कूष्मांड नवमी के नाम से भी जाना जाता है। कहते है अक्षय नवमी के दिन ही त्रेता युग का आरंभ हुआ था। इसी दिन कुष्मांडा देवी प्रकट हुई थीं, इसलिए इस तिथि को कुष्मांड नवमी भी कहते हैं। इस दिन कुष्मांड यानी कुम्हड़े का दान महत्वपूर्ण माना गया है। 


श्रीविष्णु ने किया कुष्मांडक नामक राक्षस का वध

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एक अन्य मान्यता अनुसार, भगवान विष्णु ने इसी दिन कुष्मांडक नामक राक्षस का वध किया था, जिसके शरीर से कुष्मांड की बेले निकली हुई थी। इस दिन आंवला वृक्ष में भगवान विष्णु और शिव निवास करते हैं। इसलिए इस दिन स्नान, पूजन, तर्पण और अन्नदान से कई गुना फल मिलता है। इस दिन आंवला पूजन के बाद पेड़ की छांव पर ब्राह्मण भोज भी कराते है। इस दिन महिलाएं किसी ऐसे बागीचे में जहां आंवले का वृक्ष हो, वहां जाकर वे पूजन करने बाद वहीं भोजन करती हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से घर में सुख-समृद्धि आती है और शरीर निरोग बनता है। माना जाता है कि अक्षय नवमी पर मां लक्ष्मी ने पृथ्वी लोक में भगवान विष्णु एवं शिव जी की पूजा आंवले के रूप में की थी। इसी पेड़ के नीचे बैठकर भोजन ग्रहण किया था। कहते है आंवले के पेड़ के नीचे श्री हरि विष्णु के दामोदर स्वरूप की पूजा की जाती है। इसी दिन भगवान कृष्ण ने कंस वध से पहले तीन वनों की परिक्रमा की थी। इस वजह से अक्षय नवमी पर लाखों भक्त मथुरा-वृदांवन की परिक्रमा भी करते हैं। कहा गया है कि इस दिन गाय, पृथ्वी, स्वर्ण और वस्त्राभूषणादि का दान देने से महापाप भी नष्ट हो जाते हैं। इस दिन नित्यकर्म से निवृत होकर आंवले के वृक्ष के नीचे पूर्व की ओर मुंह करके पूजन करना चाहिए। इसके साथ ही जड़ में दूध की धारा गिराकर, पेड़ के चारों और सूत लपेटकर कपूर से आरती कर आंवले के वृक्ष की 108 परिक्रमा करनी चाहिए। पूजा की सामग्री में जल, रोली, अक्षत (चावल), मिष्ठान, बतासा, आंवला आदि होना चाहिए। इसके बाद निर्धन और ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए।


पौराणिक मान्यताएं 

कथानुसार, एक साहूकार था। वह आंवला नवमी के आने पर आंवले के पेड़ के नीचे ब्रह्मणों को भोजन कराता था। सोने का दान करता था। उसके बेटों को यह सब देखकर अच्छा नहीं लगता था। बेटों से तंग आकर वह साहूकार दूसरे गांव में रहने लगा। उसने वहां दुकान कर ली। दुकान के आगे आंवले का पौधा लगाया। वह उसमें रोज खाद और पानी देता। साहूकार की दुकान चल निकली। बेटों का सारा रोजगार ठप्प हो गया। साहूकार के बेटे एक दिन उसके पास पहुंचे और बोले, पिताजी हमें अपनी करनी का पश्चाताप है। उनको कई तरह की परेशानियां आ रही थीं। जिसे उन्होंने अपने पिता को सुनाया। पिता के कहने पर बेटों ने आंवले के वृक्ष की पूजा की। इस तरह उनका घर पहले की तरह धन-धान्य से खुशहाल हो गया। देवी पुराण के अनुसार, श्रीकृष्ण के परामर्श से माता कुंती ने भी अक्षय प्राप्ति के लिए कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को व्रत किया था, तभी से इस व्रत का प्रचलन शुरू हो गया। इस दिन श्रद्धापूर्वक आंवले के नीचे भगवान विष्णु का पूजन करने से संतान की भी प्राप्ति होती है। इस दिन प्रातःकाल स्नान करके भगवान विष्णु और शिव जी के दर्शन करने से अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है। इस तिथि को पूजा, दान, यज्ञ, तर्पण करने से उत्तम फल की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में ब्रह्महत्या को घोर पाप बताया गया है। यह पाप करने वाला अपने दुष्कर्म का फल अवश्य भोगता है, लेकिन अगर वह अक्षय नवमी के दिन स्वर्ण, भूमि, वस्त्र एवं अन्नदान करे और आंवले के वृक्ष के नीचे लोगों को भोजन कराये, तो वह ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हो सकता है। यही कारण है कि इसे धातृ नवमी भी कहा जाता है। संस्कृत में आंवले को धातृ कहा जाता है। एक अन्य कथानुसार, एक बार देवी लक्ष्मी तीर्थाटन पर निकलीं, तो रास्ते में उनकी इच्छा हुई कि भगवान विष्णु और शिव की पूजा की जाये. देवी लक्ष्मी उस समय सोचने लगीं कि एक मात्र चीज क्या हो सकती है, जिसे भगवान विष्णु और शिव दोनों पसंद करते हों, उसे ही प्रतीक मान कर पूजा की जाये। इस पर काफी विचार करने पर देवी लक्ष्मी को ध्यान पर आया कि धातृ ही ऐसा है, जिसमें तुलसी और बिल्व दोनों के गुण मौजूद हैं। इसलिए इसी की पूजा करनी चाहिए। देवी लक्ष्मी तब धातृ के वृक्ष की पूजा की और उसी वृक्ष के नीचे प्रसाद ग्रहण किया। इस दिन से ही धातृ के वृक्ष की पूजा का प्रचलन शुरू हुआ। 


अक्षय नवमी पूजा विधि 

आंवले के वृक्ष के सामने पूर्व दिशा की ओर मुंह करके बैठें। धातृ के वृक्ष की पंचोपचार सहित पूजा करें। उसके बाद वृक्ष की जड़ को दूध से सींचे। कच्चे सूत को लेकर धातृ के तने में लपेटें। अंत में घी और कर्पूर से आरती करने के बाद वृक्ष की परिक्रमा करें। 


आंवला वृक्ष का पूजन

आंवला नवमी के दिन सुबह स्नान कर दाहिने हाथ में जल, चावल, फूल आदि लेकर निम्न प्रकार से व्रत का संकल्प करें- अद्येत्यादि अमुकगोत्रोमुकम (अपना नाम एवं गोत्र बोलें) ममाखिल-पापक्षयपूर्वक-धर्मार्थकाममोक्ष-सिद्धिद्वारा श्रीविष्णुप्रीत्यर्थं धात्रीमूले विष्णुपूजनं धात्रीपूजनं च करिष्ये। ऐसा संकल्प कर आंवले के वृक्ष के नीचे पूर्व दिशा की ओर मुख करके ओउम् धार्त्यै नमः मंत्र से आवाहनादि पंचोपचार, षोडशोपचार पूजन करके निम्नलिखित मंत्रों से आंवले के वृक्ष की जड़ में दूध की धारा गिराते हुए पितरों का तर्पण करें- पिता पितामहाश्चान्ये अपुत्रा ये च गोत्रिणः। ते पिबन्तु मया दत्तं धात्रीमूलेक्षयं पयः।। आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं देवर्षिपितृमानवाः। ते पिवन्तु मया दत्तं धात्रीमूलेक्षयं पयः।। इसके बाद, आंवले के वृक्ष के तने में कच्चे सूत को निम्न मंत्र से परिक्रमा करते हुए तने पर लपेटें- दामोदरनिवासायै धार्त्यै देव्यै नमो नमः। सूत्रेणानेन बध्नामि धात्रि देवि नमोस्तु ते।। इसके बाद, कर्पूर या शुद्ध घी के दीये से आंवले के वृक्ष की आरती करें तथा निम्न मंत्र से उसकी प्रदक्षिणा करें -यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च। तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणपदे पदे।। फिर, आंवले के वृक्ष के नीचे ही ब्राह्मणों को भोजन भी श्रेयस्कर होता है। अंत में स्वयं भी आंवले के वृक्ष के नीचे बैठ कर भोजन करना चाहिए। एक पका हुआ कुम्हड़ा (कद्दू) लेकर उसके अंदर रत्न, सोना, चांदी या रुपये आदि रख कर निम्न संकल्प करें- ममाखिलपापक्षयपूर्वक सुख सौभाग्यादीनामुक्तरोत्तराभिवृद्धये कूष्माण्डदानमहं करिष्ये। इसके बाद, योग्य ब्राह्मण को तिलक करके दक्षिणा सहित कुम्हड़ा दे दें और प्रार्थना करें- कूष्णाण्डं बहुबीजाढयं ब्रह्णा निर्मितं पुरा। दास्यामि विष्णवे तुभ्यं पितृणां तारणाय च।। पितरों के शीत निवारण के लिए यथाशक्ति कंबल आदि ऊनी कपड़े भी योग्य ब्राह्मण को देना चाहिए। 

वैज्ञानिक लाभ 

आयुर्वेद और विज्ञान की दृष्टि से देखें, तो शीत ऋतु का आगमन हो चुका है। आंवला नवमी एक शिक्षा भी है। ऋतु के अनुसार पथ्य-अपथ्य का.। इस समय से आंवला खाना शुरू करें। आंवला एकादशी तक यानी मार्च-अप्रैल तक तो साल भर स्वस्थ सुंदर निरोगी रहेंगे। आंवला गुणों की खान है। आंवले में कई स्वास्थ्य लाभदायक पोषक तत्वों एवं खनिज पदार्थ मिश्रित हैं। आंवला विटामिन-सी का प्रचुर स्रोत है.। इसके अतिरिक्त आंवले में कैल्शियम, लोहा, फास्फोरस, पोटेशियम, जिंक, कैरोटीन, प्रोटिन, विटामिन-ए-ई और बी, फोलेट, सोडियम, संतृप्त वसा, फाइबर आहार के साथ-साथ बहुत सारे पोषक तत्व होते हैं.। आंवले के बारे में प्राचीन स्वास्थ्य संबंधी ग्रंथों और आधुनिक औषधीय अनुसंधानों में उल्लेख किया गया है। एक आंवला आपकी हजार बीमारियां दूर कर देता है। च्यवन ऋषि भी आंवले यानी च्यवनप्राश, जिसका मुख्य घटक आंवला है, खाकर ही पुनः यौवन को प्राप्त किये थे। सर्दी के मौसम में पित्त बढ़ता है.। लोगों को विभिन्न व्याधियां, खुजली इत्यादि हो जाती हैं.। ऐसे में आंवले का सेवन उस बढ़े हुए पित्त को नियंत्रित कर शरीर की इम्युनिटी यानी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ा कर आपको स्वस्थ रखता है। मृत्यु के समय मुख, नाक, कान या सिर के बालों में आंवला रखने से मृतआत्मा को विष्णुलोक की प्राप्ति होती है। सर के बाल नित्य आंवले मिश्रित जल से धोने पर कलयुग के दोषों का नाश होता है। रविवार, सप्तमी, सूर्य ग्रहण, चंद्र ग्रहण, संक्रांति, शुक्रवार, षष्टी, प्रतिपदा, नवमी तिथि और अमावस्या को आंवले का त्याग करना चाहिए।





--सुरेश गांधी--

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