उदीयमान भगवान भास्कर को अर्घ्य के साथ ही महापर्व छठ संपन्न - Live Aaryaavart

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गुरुवार, 11 नवंबर 2021

उदीयमान भगवान भास्कर को अर्घ्य के साथ ही महापर्व छठ संपन्न

 

  • घाट-घाट दिखी छठ की छटा , भगवान भास्‍कर की उपासना में हर कोई लीन दिखा , अर्घ्य देने के बाद घाटों पर व घरों में पारण कर श्रद्धालुओं ने व्रत पूर्ण किया 
  • श्रद्धा और आस्था लोगों में इस कदर सवार था की ठंड के बावजूद भोर में ही लाखों-लाख कदम घाटों एवं कुंडो-तालाबों की ओर बढ़ चले 
  • घाटों पर प्रशासन द्वारा पुख्ता व्यवस्था की गई थी। प्रमुख स्थलों पर पुलिस बल की तैनाती की गई थी  


वाराणसी (सुरेश गांधी) आरोग्य, दीर्घायुष्य, श्रीसमृद्धि, संतति कामना और लोक अस्था का महापर्व छठ के मौके पर चौथे दिन व्रतियों ने उदीयमान भगवान भास्कर को अर्घ्य दिया। भगवान भास्‍कर की उपासना में हर कोई लीन दिखे. अर्घ्य देने के बाद घाटों पर व घरों में पारण कर श्रद्धालुओं ने व्रत पूर्ण किया. इसके साथ चार दिवसीय छठ महापर्व का समापन हो गया। श्रद्धा और आस्था लोगों में इस कदर सवार था की ठंड के बावजूद भोर में ही लाखों-लाख कदम घाटों एवं कुंडो-तालाबों की ओर बढ़ चले। जलते दीपों को हाथों की ओट दिए महिलाओं की टोली छठ मइया के महिमा के गीत गाते घाटों की ओर बढ़ीं और ज्योति गंगा की कई धाराएं गंगा-वरुणा से संगम को मचल उठने का आभास कराया। कांचहि बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाय... जैसे मधुर गीतों से गुलजार हो उठीं सड़कें और गलियां। गंगा समेत नदियों के घाटों और तालाबों के किनारे एक साथ दीपों की कतार झिलमिल हो उठीं। भगवान सूर्यदेव ने रात्रि के बाद उदय की ओर प्रस्थान किया और जय हो सुरुज बाबा की..., दोहाई दीना नाथ..., आपन अघर््‍य स्वीकार करीं अउर मनसा पूराईं हमार... आदि आराधना-प्रार्थना के कातर स्वरों के साथ लाखों अंजुरियां एक साथ जुड़ गईं। इसके साथ ही नीर- क्षीर की अघर््‍य धार से गंगा समेत नदियों- तालाबों का पानी झक्क दुधिया हो गया। 


भगवान भाष्‍कर के दर्शन को रातभर टकटकी लगाकर बैठी व्रती महिलाओ के चेहरे पर आकाश में लालिमा छाते ही मुस्कान आ गई तो सुबह 6.25 बजे सूर्योदय के बाद महिलाओं ने सूर्य की उपासना के पर्व छठ की पूर्णाहुति दी। जलाशयों के किनारे पहले से ही बनायी गई वेदी की देवखरी मे गन्ने को गाड़कर बनाई गई छठ माता की प्रतिमा का विधिवत पूजन किया। यहां विधिवत छठ माता की कहानियां सुनी और गीत गाए, इसके बाद व्रती महिलाओं ने एक दूसरे को सिंदूर लगाकर सुहाग के सौभाग्‍य की कामना भी की। विधि-विधान से सूर्योपासना और अर्घ्य के बाद व्रतियां और श्रद्धालु अपने-अपने घरों की ओर लौट गए. छठ महापर्व को लेकर संपूर्ण बिहार भक्ति के माहौल में डूबा रहा. शहर में चारों ओर छठ मैया के गीतों की धुन सुनाई देती रही. स्थानीय नदियों व तालाबों के तट पर मनोरम दृश्य देखने को मिला. अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने के समय जितनी भीड़ यहां उमड़ी थी, उतने ही श्रद्धालु उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देने को आतुर दिखे. श्रद्धालु प्रातःकाल से ही छठ घाट की ओर डाला के साथ रवाना हो गए. सूर्य की लालिमा देखते ही व्रती एवं श्रद्धालुओं के चेहरे पर प्रसन्नता झलकने लगी. इससे पूर्व व्रती तथा श्रद्धालु ने घंटों भगवान सूर्य के उगने का इंतजार जल में खड़े होकर किया. व्रती के जल से निकलने के बाद लोगों ने उनके पांव छुए और आशीष प्राप्त किया. इस दौरान व्रतियों ने पुरूषों को टीका लगाया तथा महिलाओं की मांग में सिंदूर दिया तथा उनके सुहाग की दीघार्यु होने की प्रार्थना की. अर्घ्य देने के बाद लोगों में प्रसाद प्राप्त करने की होड़ लग गई. लोगों ने प्रसाद ग्रहण किया. इसकी तैयारी घरों में एक दिन पूर्व से ही शुरू हो गई थी। निराजल व्रती महिलाएं दिन भर छठ मइया का गीत गाते उन्हें चढ़ाने के लिए मीठे पकवान बनाती और छठ के गीत गुनगुनाती रहीं। कुछ घरों में आडियो-वीडियो माध्यम से बड़ी ही श्रद्धा से छठ मइया के गीत सुने जा रहे थे। जैसे-जैसे उजाला बढ़ता गया, वैसे-वैसे छठ मइया के प्रति अगाध श्रद्धा रखने वालों से अस्सी से राजघाट तक गंगा का पाट भरता गया। छठ पूजा को लेकर प्रशासन द्वारा पुख्ता व्यवस्था की गई थी. प्रमुख स्थलों पर पुलिस बल की तैनाती की गई थी.


फिरहाल, भारतीय संस्‍कृति में त्‍यौहार सिर्फ औपचारिक अनुष्‍ठान मात्र नहीं हैं, बल्‍कि जीवन का एक अभिन्‍न अंग हैं। त्‍यौहार जहाँ मानवीय जीवन में उमंग लाते हैं वहीं पर्यावरण संबंधी तमाम मुद्‌दों के प्रति भी किसी न किसी रूप में जागरूक करते हैं। सूर्य देवता के प्रकाश से सारा विश्‍व ऊर्जावान है और इनकी पूजा जनमानस को भी क्रियाशील, उर्जावान और जीवंत बनाती है। भारतीय संस्‍कृति में दीपावली के बाद कार्तिक माह के दूसरे पखवाड़े में पड़ने वाला छठ पर्व मूलतः भगवान सूर्य को समर्पित है। यह त्‍यौहार इस अवसर पर प्रत्‍यक्ष देव भगवान सूर्य नारायण की पूजा की जाती है। आदित्‍य हृदय स्‍तोत्र से स्‍तुति करते हैं, जिसमें बताया गया है कि ये ही भगवान सूर्य, ब्रह्‍मा, विष्‍णु, शिव, स्‍कन्‍द, प्रजापति, इन्‍द्र, कुबेर, काल, यम, चन्‍द्रमा, वरूण हैं तथा पितर आदि भी ये ही हैं। 

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