पटना उच्च न्यायालय ने 18 मई 2026 के अपने आदेश में रिशु श्री की याचिका खारिज कर दी थी। अदालत ने कहा कि ईसीआईआर (प्रवर्तन मामला सूचना रिपोर्ट) एक ‘‘आंतरिक दस्तावेज’’ है, न कि प्राथमिकी जैसा कोई कानूनी दस्तावेज। उच्च न्यायालय ने कहा था कि जांच के दौरान ईसीआईआर को आम तौर पर रद्द नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा था कि ईडी अधिकारी ‘‘पुलिस अधिकारी’’ नहीं हैं, इसलिए इकबालिया बयान से जुड़े दंड प्रक्रिया संहिता के सुरक्षा उपाय पीएमएलए की धारा 50 के तहत होने वाली कार्यवाही पर सख्ती से लागू नहीं होते। भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के वरिष्ठ अधिकारी संजीव हंस के कथित सहयोगी रिशु श्री ने ईडी पर आरोप लगाया है कि वह एक ही तरह के तथ्यों और जांच से जुड़ी सामग्री के आधार पर कई समानांतर जांच शुरू करके अपने अधिकार क्षेत्र का लगातार विस्तार कर रही है। यह कानूनी लड़ाई उन कई जांच से जुड़ी हुई है, जिनकी शुरुआत 2023 में आईएएस अधिकारी संजीव हंस और बिहार के पूर्व विधायक गुलाब यादव के खिलाफ लगे आरोपों से संबंधित प्राथमिकी के साथ हुई थी। हालांकि, शुरुआती जांच खास वित्तीय लेन-देन पर केंद्रित थी, लेकिन बाद में ईडी ने एक दूसरा मामला दर्ज किया। इसमें बिहार शहरी अवसंरचना विकास निगम और जल संसाधन विभाग समेत राज्य के कई विभागों में सरकारी निविदाओं में हेर-फेर से जुड़ी ‘‘बड़ी साजिश’’ का आरोप लगाया गया था। ईडी का आरोप है कि रिशु श्री ने बिचौलिये के तौर पर काम किया और कुछ खास कंपनियों को निविदा दिलाने के लिए कुल निविदा मूल्य का 5-7 प्रतिशत कमीशन लिया। एजेंसी का दावा है कि उसने 58 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के 61 बैनामा (सेल डीड) और ऊंचे ओहदे वाले अधिकारियों के लिए प्रायोजित की गई विदेश यात्राओं की जानकारी हासिल की है।

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