वांगचुक ने कहा, ‘‘मुझे लगा था कि मुझे अनशन पर नहीं बैठना पड़ेगा। मुझे दुख है कि मुझे फिर से अनशन पर बैठना पड़ रहा है। मैं खुशी से ऐसा नहीं कर रहा हूं; यह आसान भी नहीं है। हो सकता है कि मेरी मौत भी हो जाए, लेकिन अगर मैं मर भी जाऊं, तो भी मैं पीछे नहीं हटूंगा।’’ लद्दाख में संवैधानिक सुरक्षा उपाय, राज्य का दर्जा और केंद्र शासित प्रदेश के लिए अधिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग को लेकर लंबे समय से आंदोलन के बीच वांगचुक का यह नया अनशन शुरू हुआ है। केंद्र शासित प्रदेश की नागरिक संस्थाओं द्वारा लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची के अंतर्गत लाने की मांग प्रमुख मुद्दों में से एक रही है। केंद्र सरकार के साथ हुई वार्ता प्रक्रिया को याद करते हुए वांगचुक ने कहा कि उन्हें उम्मीद थी कि उनकी हिरासत के दौरान और उसके बाद हुई बैठकों से विश्वास बहाली में मदद मिलेगी। वांगचुक को लद्दाख आंदोलन के दौरान सितंबर 2025 में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत में लिया गया था और फरवरी 2026 में रिहा किया गया था। उन्होंने कहा, ‘‘चार फरवरी को, जब मैं जेल में था, एक बैठक हुई थी जो लगभग नाकाम रही। 22 मई को, मेरे रिहा होने के बाद, एक और बैठक हुई। मुझे उससे बहुत उम्मीद थी क्योंकि कहा गया था कि मुझे भरोसे का माहौल बनाने के लिए रिहा किया गया है और बातचीत जारी रहेगी।’’
वांगचुक के अनुसार, 22 मई की बैठक ने आगे बढ़ने का मौका दिया था, लेकिन उन्होंने आरोप लगाया कि नतीजों को औपचारिक रूप से दर्ज नहीं किया गया। उन्होंने कहा, ‘‘22 मई की बैठक वैसी ही थी, लेकिन अब वे नतीजों को लिखित रूप में देने से कतरा रहे हैं। यह लोगों का भरोसा जीतने का मौका था। एक कदम आगे और दो कदम पीछे हटने से लोगों का भरोसा उठ गया।’’ वांगचुक ने कहा कि भरोसे की कमी पहले दिए गए आश्वासनों में भी थी। उन्होंने संविधान की छठी अनुसूची के तहत सुरक्षा उपायों की मांग का उल्लेख करते हुए कहा, ‘‘भरोसे की कमी पहले से ही थी, क्योंकि 2013-14 में वादे किए गए थे, लेकिन बाद में उनसे पीछे हट गए।’’ हालांकि, उन्होंने ज़ोर दिया कि बातचीत में उनका भरोसा कम नहीं हुआ है। उन्होंने कहा, ‘‘मुझे अब भी उम्मीद है, वरना मैंने भी आत्महत्या कर ली होती, लेकिन मैं अभी यहां हूं। इसका मतलब है कि मुझे अब भी उम्मीद है। हमें उम्मीद है कि उनकी अंतरात्मा जागेगी और उन्हें एहसास होगा कि वे गलत कर रहे हैं। उन्होंने लिखित में वादा किया था।’’ वांगचुक ने कहा कि सरकारों को लोगों की चिंताओं पर सहानुभूति के साथ प्रतिक्रिया देनी चाहिए और असहमति को खतरे के तौर पर नहीं देखना चाहिए। उन्होंने कहा, ‘‘अगर आप भारत को लोकतंत्र मानते हैं...और अगर नहीं मानते, यानी अगर आप इसे तानाशाही या अधिनायकवादी सरकार समझते हैं, तो आप सख्त रवैया अपना सकते हैं, लेकिन फिर खुद को लोकतांत्रिक कहना बंद कर दें।’’ जवाबदेही की मांग करते हुए वांगचुक ने कहा कि प्रदर्शनकारियों द्वारा उठाए गए मुद्दों पर संसद में बहस होनी चाहिए। उन्होंने कहा, ‘‘जवाबदेही होनी चाहिए। हो सकता है कि एक इस्तीफे से सब कुछ न बदले, लेकिन हम चाहेंगे कि आने वाले सत्र में यह मुद्दा उठाया जाए। इस पर बहस होनी चाहिए।’’ आंदोलन का समर्थन करने के लिए राजनीतिक दलों से अपील करते हुए वांगचुक ने कहा कि उन्हें राजनीति से ऊपर उठकर आने वाली पीढ़ियों के बारे में सोचना चाहिए।
उन्होंने कहा, ‘‘मैं सभी दलों से आग्रह करता हूं कि अगर आप आने वाली पीढ़ियों के लिए खड़े हैं, तो आप इस आंदोलन का हिस्सा हैं। सकारात्मक सोच अपनाएं। इसे एक आशीर्वाद मानें कि लोग अब भी अपनी आवाज़ उठा रहे हैं। अगर वे मर चुके होते, तो वे आवाज़ नहीं उठाते। आप कब्रिस्तान नहीं चाहते हैं।’’ उन्होंने प्रदर्शनकारियों से शांति बनाए रखने की भी अपील की। वांगचुक ने कहा, ‘‘डरिए मत, लेकिन मन में नफरत भी मत रखिए। अपने संदेश को फूलों के साथ, शांति और प्रेम के रास्ते से आगे बढ़ाइए। भारत के सभी लोग आपके साथ खड़े होंगे। जब जनता आपके साथ होगी, तब कोई भी सरकार आपकी मांगों को नजरअंदाज नहीं कर सकेगी।’’ हिरासत में रहने के अपने अनुभव के आधार पर, वांगचुक ने युवा प्रदर्शनकारियों का हौसला बढ़ाया कि वे जेल जाने से न डरें। उन्होंने कहा, ‘‘जेल से मत डरिए। मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव से कह सकता हूं कि यह आपको बदल देती है और मजबूत बनाती है। किसी भी चीज से भयभीत मत होइए। आपको न्याय अवश्य मिलेगा।’’ यह दोहराते हुए कि उनका आंदोलन शिक्षा और पर्यावरण संरक्षण पर केंद्रित है, वांगचुक ने कहा कि लद्दाख की चिंताओं को लंबे समय तक अनसुलझा नहीं रहने दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, ‘‘शिक्षा और पर्यावरण मेरी दो आंखें हैं। पर्यावरण के संदर्भ में, मैं यहां लद्दाख का मुद्दा उठाने और इसके समाधान की मांग करने के लिए बैठा हूं।’’ उन्होंने कहा, ‘‘इसे नासूर न बनने दें। यह एक संवेदनशील सीमावर्ती इलाका है। इसे अधर में लटकाए रखना देश के हित में नहीं है।’’

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