आखिर क्या हैं डिस्ट्रीब्यूटेड रिन्यूएबल एनर्जी?
अब तक बिजली व्यवस्था का ढांचा ऐसा रहा है कि बिजली बड़े बिजलीघरों में बनती है और फिर लंबी ट्रांसमिशन लाइनों के जरिए शहरों और गांवों तक पहुंचती है। इसके उलट, डिस्ट्रीब्यूटेड रिन्यूएबल एनर्जी ऐसी तकनीकों को कहा जाता है जो बिजली वहीं पैदा करती हैं, जहां उसकी जरूरत होती है। रूफटॉप सोलर, सौर सिंचाई पंप, बायोगैस संयंत्र, बैटरियां और भविष्य में वाहन से बिजली ग्रिड तक पहुंचाने वाली Vehicle-to-Grid (V2G) जैसी तकनीकें इसी श्रेणी में आती हैं। इनका मकसद सिर्फ़ स्वच्छ बिजली पैदा करना नहीं, बल्कि बिजली व्यवस्था को अधिक लचीला और किफायती बनाना भी है।
भारत में सबसे बड़ी ताकत छतों पर
रिपोर्ट के मुताबिक भारत में अकेले रूफटॉप सोलर की तकनीकी क्षमता 637 गीगावाट आंकी गई है। इसके अलावा कृषि क्षेत्र भी बड़ी संभावना रखता है। देश में 2.9 करोड़ से अधिक सिंचाई पंप ऐसे हैं जिन्हें भविष्य में सौर ऊर्जा आधारित बनाया जा सकता है। यानी बिजली उत्पादन की संभावनाएं सिर्फ़ बड़े सोलर पार्कों तक सीमित नहीं हैं। लाखों घरों, दुकानों और खेतों की छतें भी देश की ऊर्जा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती हैं।
सरकारी योजनाओं ने बदली तस्वीर
रिपोर्ट का कहना है कि भारत में डिस्ट्रीब्यूटेड सोलर की तेज़ बढ़ोतरी के पीछे दो प्रमुख सरकारी योजनाओं की बड़ी भूमिका रही है। इनमें पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना और पीएम-कुसुम (PM-KUSUM) शामिल हैं। इन योजनाओं के तहत सब्सिडी, रियायती वित्त, अलग-अलग कारोबारी मॉडल और सरकारी सहयोग ने शहरी और ग्रामीण, दोनों इलाकों में रूफटॉप सोलर और कृषि क्षेत्र में सौर ऊर्जा को बढ़ावा दिया है। इसी का असर है कि भारत में डिस्ट्रीब्यूटेड सोलर क्षमता वित्त वर्ष 2018 में 1.8 गीगावाट से बढ़कर वित्त वर्ष 2026 में 31.5 गीगावाट तक पहुंच गई।
लेकिन एक चुनौती अब भी बाकी है
इतनी तेज़ बढ़ोतरी के बावजूद रिपोर्ट एक दिलचस्प तथ्य भी सामने रखती है। भारत की कुल रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता में डिस्ट्रीब्यूटेड सोलर की हिस्सेदारी पिछले कई वर्षों से करीब 21 से 22 प्रतिशत के आसपास ही बनी हुई है। इसकी वजह यह नहीं कि रूफटॉप सोलर की रफ्तार धीमी है। बल्कि इसलिए कि इसी दौरान बड़े यूटिलिटी-स्केल सोलर प्रोजेक्ट्स उससे भी तेज़ गति से बढ़े हैं। यानी भारत में दोनों तरह की सौर ऊर्जा बढ़ रही है, लेकिन बड़े प्रोजेक्ट्स की वृद्धि और तेज़ रही है।
दूसरे देशों से क्या सीख सकता है भारत?
रिपोर्ट ने भारत के साथ ऑस्ट्रेलिया और बांग्लादेश का भी अध्ययन किया है। ऑस्ट्रेलिया में आज लगभग 40 प्रतिशत घरों पर सोलर पैनल लगे हुए हैं। वहां 2014 से 2025 के बीच रूफटॉप सोलर की हिस्सेदारी राष्ट्रीय बिजली उत्पादन में बढ़कर 13 प्रतिशत से अधिक हो गई, जबकि कोयले की हिस्सेदारी 75 प्रतिशत से घटकर 52 प्रतिशत रह गई। अब वहां घरेलू बैटरियों का भी तेज़ी से विस्तार हो रहा है। वहीं बांग्लादेश में औद्योगिक इकाइयों की दिलचस्पी के कारण रूफटॉप सोलर तेजी से बढ़ रहा है। IEEFA का अनुमान है कि वहां स्थापित क्षमता सरकारी आंकड़ों से कहीं अधिक हो सकती है। रिपोर्ट यह भी कहती है कि इस बढ़ोतरी से दिन के समय बिजली की मांग में कुछ कमी दर्ज की गई है।
सिर्फ़ सोलर पैनल लगाने से काम नहीं चलेगा
रिपोर्ट के लेखकों का कहना है कि डिस्ट्रीब्यूटेड रिन्यूएबल एनर्जी का पूरा लाभ तभी मिलेगा, जब इसके साथ कुछ और सुधार भी किए जाएं। इनमें बैटरी स्टोरेज का विस्तार, स्मार्ट मीटरों की तेज़ तैनाती, आसान वित्तीय व्यवस्था और घरों, किसानों तथा छोटे कारोबारियों के लिए सस्ती पूंजी तक बेहतर पहुंच शामिल है।
भारत के एनर्जी ट्रांजिशन के लिए क्या मायने?
भारत आने वाले वर्षों में रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता को तेज़ी से बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है। लेकिन सिर्फ़ बड़े बिजलीघर बनाना ही पर्याप्त नहीं होगा। नई रिपोर्ट बताती है कि बिजली उत्पादन को लोगों के और करीब लाना भी उतना ही जरूरी है। यदि देश की लाखों छतें, खेत और छोटे उद्योग बिजली पैदा करने लगें, तो इससे न केवल स्वच्छ ऊर्जा बढ़ेगी बल्कि बिजली वितरण व्यवस्था पर दबाव भी कम हो सकता है। इससे किसानों, घरों और छोटे व्यवसायों की बिजली लागत घट सकती है और ऊर्जा सुरक्षा भी मजबूत हो सकती है। यानी भारत का अगला बड़ा ऊर्जा बदलाव शायद किसी विशाल सोलर पार्क से नहीं, बल्कि लाखों छतों पर लगने वाले छोटे-छोटे सोलर पैनलों से शुरू हो सकता है।

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