पक्की सड़क न होने का सबसे बड़ा असर बारिश के दिनों में दिखाई देता है। कच्चे रास्ते पर पानी और कीचड़ जमा होने के बाद पैदल चलना भी कठिन हो जाता है। ऐसे समय में एम्बुलेंस या दूसरी गाड़ियों का गांव के अंदर पहुंचना मुश्किल हो जाता है। बीमारी या प्रसव जैसी आपात स्थिति में यह समस्या परिवार के लिए गंभीर संकट बन सकती है। सड़क की कमी का असर केवल मरीज तक सीमित नहीं रहता। परिवार के किसी सदस्य को उसे मुख्य सड़क तक पहुंचाने के लिए अतिरिक्त समय और श्रम लगाना पड़ सकता है। सड़क की समस्या का एक और कम दिखाई देने वाला असर किशोरियों की शिक्षा पर पड़ता है। गांव की किशोरियों के लिए स्कूल तक पहुंचना केवल दूरी का मामला नहीं है। रास्ते की स्थिति, मौसम, परिवहन की उपलब्धता और परिवार की सुरक्षा संबंधी चिंता भी उनकी नियमित पढ़ाई को प्रभावित करती है। जब रास्ता खराब होता है तो स्कूल जाने और लौटने में अधिक समय लगता है। बारिश में कीचड़ और जलभराव के कारण अकेले निकलना कठिन हो जाता है। परिवार कई बार किशोरी को ऐसे रास्ते से भेजने में हिचकिचाता है, खासकर तब जब स्कूल गांव से बाहर हो। नतीजा यह हो सकता है कि कुछ दिनों की अनुपस्थिति धीरे-धीरे पढ़ाई से दूरी में बदल जाए।
यह समस्या इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ग्रामीण किशोरियों के लिए शिक्षा का हर अतिरिक्त वर्ष उनके भविष्य के विकल्पों को बढ़ाता है। स्कूल तक पहुंचने में कठिनाई केवल आज की परेशानी नहीं है। इसका संबंध आगे की पढ़ाई, कौशल प्रशिक्षण, रोजगार और सार्वजनिक जीवन में उनकी भागीदारी से भी है। जब खराब सड़क के कारण किसी किशोरी की आवाजाही सीमित होती है, तो उसके अवसर भी सीमित हो सकते हैं। दूसरी ओर गांव में बेहतर सड़क होने पर स्कूल, बाजार, स्वास्थ्य केंद्र और सार्वजनिक परिवहन तक पहुंच आसान होती है। इससे परिवारों को भी किशोरियों की शिक्षा जारी रखने का अधिक भरोसा मिलता है। वास्तव में, जमीन किसी ग्रामीण परिवार के लिए सिर्फ संपत्ति ही नहीं होती है बल्कि वह उसकी आजीविका, भविष्य की सुरक्षा और कई बार पीढ़ियों से जुड़ी पूंजी होती है। इसलिए उचित मुआवजे की मांग को नजरअंदाज करके सड़क निर्माण का समाधान संभव नहीं है। लेकिन दूसरी तरफ यह भी देखना होगा कि कुछ परिवारों की जमीन से जुड़ा विवाद पूरे गांव की बड़ी आबादी को बुनियादी सुविधा से वंचित न कर दे। इसलिए ललितपुर का विवाद केवल ‘सड़क बनाम जमीन’ का विवाद नहीं माना जाना चाहिए। इसे इस सवाल के रूप में भी देखना चाहिए कि विकास का लाभ किस तरह सभी तक पहुंचे और जमीन देने वाले परिवार के साथ न्याय भी हो।
समाधान बातचीत और भरोसे से निकल सकता है, टकराव से नहीं। प्रशासन को जमीन मालिकों, पंचायत प्रतिनिधियों, ग्रामीणों और सड़क निर्माण से जुड़े अधिकारियों की संयुक्त बैठक कराकर विवाद का समाधान तलाशना चाहिए। जहां संभव हो, सड़क की ऐसी वैकल्पिक रूपरेखा पर भी विचार किया जा सकता है जिससे कम से कम निजी जमीन प्रभावित हो। लेकिन यदि जमीन लेना अपरिहार्य हो, तो मुआवजे को लेकर उठे सवालों का निष्पक्ष समाधान जरूरी है। साथ ही, यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि केवल सड़क का निर्माण पूरा दिखाने के लिए कागजों पर समाधान न हो, बल्कि गांव के अंतिम हिस्से तक वास्तविक, टिकाऊ और हर मौसम में उपयोगी सड़क पहुंचे। ग्रामीण विकास की असली परीक्षा यही है कि योजना की पहुंच वहां तक हो जहां उसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। सड़क केवल मिट्टी, गिट्टी और डामर से नहीं बनती। उसके रास्ते में लोगों के अधिकार, उनकी आजीविका और पूरे समुदाय की जरूरतें भी होती हैं। इसलिए सरकार और ग्रामीणों दोनों को अपने-अपने पक्ष से आगे बढ़कर साझा समाधान तलाशना होगा। जमीन का उचित मूल्य मिलना ग्रामीण का अधिकार है और सड़क से जुड़ना पूरे गांव की जरूरत। इन दोनों के बीच ऐसा रास्ता निकालना ही सबसे टिकाऊ समाधान होगा।
अंकि कुमारी
सीतामढ़ी, बिहार
टीम, गाँव की आवाज़
(यह लेखिका की निजी राय है)


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