सीहोर : भागवत कथा के अंतिम दिवस हुआ सुदामा चरित्र और परीक्षित मोक्ष प्रसंग का वर्णन - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शनिवार, 3 अक्टूबर 2026

सीहोर : भागवत कथा के अंतिम दिवस हुआ सुदामा चरित्र और परीक्षित मोक्ष प्रसंग का वर्णन

  • जिसके पास प्रेम धन है, वह निर्धन नहीं हो सकता, राजा हो या रंक मित्रता में सभी समान : भागवत भूषण पंडित अरविंद व्यास

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सीहोर। शहर के बस स्टैंड स्थित गीता मानस भवन में जारी सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का विराम दिवस श्रद्धा और भक्ति के वातावरण में संपन्न हुआ। अंतिम दिवस भागवत भूषण पंडित अरविंद व्यास ने भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता, सुदामा चरित्र तथा राजा परीक्षित मोक्ष सहित विभिन्न महत्वपूर्ण प्रसंगों का विस्तार से वर्णन किया। कथा के दौरान पंडित अरविंद व्यास ने कहा कि जिसके पास प्रेम धन है, वह निर्धन नहीं हो सकता। राजा हो या रंक, मित्रता में सभी समान होते हैं। इसमें किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होता। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने सुदामा से मित्रता का धर्म निभाकर संसार को प्रेम, अपनत्व और सच्ची मित्रता का संदेश दिया। पंडित व्यास ने कहा कि श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता यह संदेश देती है कि सच्चे रिश्ते धन-दौलत और पद से नहीं, बल्कि प्रेम और आत्मीयता से बनते हैं। भगवान श्रीकृष्ण स्वयं राजा होने के बावजूद अपने निर्धन मित्र सुदामा के प्रति वही प्रेम रखते हैं, जो बाल्यकाल में था। उन्होंने कहा कि जीवन में धन-संपत्ति का महत्व हो सकता है, लेकिन प्रेम, विश्वास और आत्मीयता का कोई मूल्य नहीं लगाया जा सकता। सुदामा के पास भौतिक संपत्ति भले ही नहीं थी, लेकिन उनके पास भगवान श्रीकृष्ण जैसा मित्र और अटूट प्रेम का धन था। कथा के दौरान पंडित अरविंद व्यास ने शुकदेव जी के जन्म का भी वर्णन किया। उन्होंने कहा कि शुकदेव इस संसार में श्रीमद्भागवत का ज्ञान प्रदान करने के लिए ही प्रकट हुए थे। उनके जन्म से जुड़े प्रसंग का वर्णन करते हुए बताया कि मान्यता के अनुसार शुकदेव जी लंबे समय तक माता के गर्भ में रहे और इसके बाद संसार में प्रकट हुए। उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण मनुष्य को जीवन के वास्तविक उद्देश्य से परिचित कराता है। राजा परीक्षित ने भी शुकदेव जी से भागवत कथा का श्रवण किया और इसी के प्रभाव से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई।


शुकदेव-परीक्षित संवाद ने श्रद्धालुओं को किया भाव-विभोर

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परीक्षित मोक्ष प्रसंग का वर्णन करते हुए पंडित व्यास ने बताया कि एक बार राजा परीक्षित शिकार करते हुए घने वन में चले गए। उन्हें प्यास लगी तो वे समीप स्थित समीक ऋषि के आश्रम पहुंचे। राजा ने ऋषि से जल पिलाने का आग्रह किया, लेकिन समीक ऋषि उस समय समाधि में लीन थे और राजा की बात का उत्तर नहीं दे सके। पंडित व्यास के अनुसार, राजा परीक्षित ने इसे अपना अपमान समझ लिया और क्रोधवश वहां पड़ा एक मृत सर्प उठाकर समीक ऋषि के गले में डाल दिया। इस घटना की जानकारी ऋषि के पुत्र को हुई। उन्होंने क्रोध में आकर राजा परीक्षित को श्राप दिया कि जिसने उनके पिता का अपमान किया है, उसकी सातवें दिन मृत्यु हो जाएगी। बाद में समीक ऋषि को जब घटना की जानकारी मिली तो उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से जाना कि राजा परीक्षित महान धर्मात्मा हैं और यह अपराध उनसे कलियुग के प्रभाव में हुआ है। इसके बाद परीक्षित को श्राप की जानकारी दी गई कि सातवें दिन तक्षक के दंश से उनकी मृत्यु होगी। कथा में बताया गया कि मृत्यु का समय निश्चित होने के बाद राजा परीक्षित ने सांसारिक मोह छोड़कर भगवान की भक्ति और श्रीमद्भागवत कथा के श्रवण को अपना आधार बनाया। शुकदेव जी ने उन्हें भागवत का ज्ञान प्रदान किया। कथा श्रवण के माध्यम से राजा परीक्षित ने भगवान के स्वरूप, भक्ति और जीवन के परम सत्य को समझा और अंतत: मोक्ष को प्राप्त हुए। सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के समापन अवसर पर यजमान केएन आचार्य, ईश्वर जोशी एवं देवेंद्र जोशी के परिवार ने बताया कि कथा के अंतिम दिवस भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता सहित परीक्षित मोक्ष एवं अन्य महत्वपूर्ण प्रसंगों का वर्णन किया गया। सात दिनों तक गीता मानस भवन में श्रद्धालुओं ने कथा का श्रवण कर आध्यात्मिक लाभ लिया। अंतिम दिवस भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु कथा स्थल पर पहुंचे और भक्ति एवं धार्मिक वातावरण में कथा का श्रवण किया।

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