आलेख : थियेटर और फ़िल्मी दुनियाँ

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आज थियेटर के कलाकारों की स्थिति भी फ़िल्मी कलाकारों से कम नहीं,हाँ ये अलग बात है की थियेटर के कलाकारों के पास दौलत और शौहरत फ़िल्मी कलाकारों के इतना नहीं मिल पाता फिर भी अगर मैं 80 के दशक की बात करुँ तो थियेटर के कलाकार निर्देशक अपने रंग मंच से काफी खुश और संतुष्ट रहा करते थे।जबकि 80 के दशक में कलाकार रंगमंच के लिए अपने समय के साथ-साथ अपना धन भी लगा दिया करते थे और जी-जान से नाट्य प्रस्तुति में लगकर सफलता पूर्वक नाट्य मंचन कर समीक्षा भी करने बैठ जाते थे।एक कलाकार बैनर लगाता था,दर्शकों को नाटक देखने के लिए प्रेरित करता था,2रुपये,5रुपये एवं 10रुपये का टिकिट भी बेचा करता था इतना ही नहीं टिकिट नहीं बिकने पर अपने हिस्से का टिकट लोगों में बाँटकर उनका पैसा अपने जेब से भरता था ताकि उसके मिहनत को ध्यान में रखते हुए आगामी होने वालों नाटक में उसे बढ़िया भूमिका अदा करने को मिले।और नाटक के दर्शक भी बनें शायद इसीलिए अपने जेब से पैसे भरते थे।उस समय दर्शकों की बड़ी आभाव रहा करता था और आज दर्शक तो हैं मगर वैसे नाटकों का ही आभाव सा हो गया है।उस वक़्त का नाटक अन्धा युग,कोर्ट मार्शल,आषाढ़ का एक दिन,जात ही पूछो साधू की,त्रिशंकु,नाग मण्डलम्,रक्त कल्याण,खामोश अदालत जारी है आदि जैसे नाटकों का मंचन हुआ करता था आज ऐसे नाटकों का आभाव खलता है उन दशकों के कलाकारों को,हालांकि उस वक़्त भी संगीत नाटक एकेडमी,एन एस डी आदि कई संस्थानो से सहयोग राशि भी मिला करते थे।उस वक़्त अभिनय के लिए महिला पात्र की भी भारी कमी थी मगर आज,आज की दौड़ में महिला व पुरुष पात्रों की कोई कमी नहीं।


कारण सभी व्यवसायिक हो गए हैं एन जी ओ के माध्यम,केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार के साथ-साथ कई ऐसे संस्थान हैं जो नाटक को बढ़ावा देने के लिए सहयोग राशि आवंटित कर रहे हैं मगर आज के तथा-कथित रंगकर्मियों को छोड़कर कोई भी सन्तुष्ट नहीं हैं नतीजा सभी कलाकार फ़िल्म की ओर मुखातिब हो रहे हैं।वालीवुड में अभिनय करना बड़ी टेढ़ी खीर साबित होता है अतः कुछ सीरियलों में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं तो कुछ स्थानीय पैसेवालों को प्रेरित कर फ़िल्म बनवाते हैं और उसमे कार्य करते हैं।कुछ ऐसे भी पैसेवाले हैं जो अपना नाम प्रोड्यूसर के डायरी में अंकित करवाने के लिए अपने रिश्तेदारों अपने पुत्रों को हीरो बनाने के लिए फ़िल्म निर्माण के कार्य में जुट गए हैं,मगर ऐसे लोगों से सफलता कोसों दूर ही है।क्षेत्रीय भाषा में तो हर जगह फ़िल्म बन ही रही है,आज से पहले भी बनती थी और आगे भी बनेगी अपने अपने प्रदेश के फिल्मों की अपनी गरिमा है और वो फ़िल्म चलती भी है और व्यवसाय के क्षेत्र में सफल भी होती है तभी तो भोजपुरी,बंगाली,मराठी,असमिया, तेलुगु,कन्नड़ आदि भाषाओं में आज भी फ़िल्म निर्माण का कार्य जारी है।बिहार से भी कई फिल्में बनीं कमोवेश बिजनेस भी हुआ परन्तु बॉक्स ऑफ़ीस के कसौटी पर कोई खरा नहीं उत्तरा।इसका एक मात्र कारण फ़िल्मी व्याकरणों के जानकारियों का आभाव। चाचा भतीजाबाद मुँह देखी कलाकारों का चयन और सबसे बड़ी बात तो ये की अर्थ की कमी,जो है सो किसी तरह फ़िल्म बनाकर सिनेमा घरों के मालिक को मुनाफे में 60 से 70 % मुनाफ़ा देने पर रज़ामन्दि आदि के जरिए फ़िल्म को प्रदर्शित कर गुड़ बेचकर साहूकार कहलाने की मुहावरे को जिवंत करना ही तो है।और ऐसे क्षेत्रीय फिल्मो को नहीं चलने का कारण टी व्ही,मोबाइल भी कुछ हद तक जिम्मेवार है।कुल मिलाकर यदि देखा जाये तो आज भी समाज के लिए प्रेरणा श्रोत नाटक ही है अगर कागजी तोर पर राशि आवंटित करनेवाली संस्थान,केंद्र और राज्य सरकार पूरी जाँच पड़ताल कर सभी कलाकारों को यथा योग्य कार्य के आधार पर पैसों का आवंटन करे तो नाटक जैसी विधा जीवित रह सकती है।और नाटक { रंगमंच } से ऊपर कुछ हो ही नहीं सकता।




अरुण शांडिल्य,
बेगुसराय।
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