कामेश्वर की रिहाई के जरिए भागलपुर दंगा पीड़ितों का रचाया गया न्यायिक संहार: कुणाल

  • नीतीश कुमार ने किया दंगा पीड़ितों से विश्वासघात.

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पटना 30 जून, भाकपा-माले राज्य सचिव कुणाल ने कहा है कि भगालपुर दंगे के मुख्य आरोपी कामेश्वर यादव की पटना हाईकोर्ट से रिहाई न केवल बीस बरसों से न्याय की उम्मीद लगाए बैठे दंगा पीड़ितों के साथ घोर अन्याय है, बल्कि लोकतांत्रिक समाज के लिए बेहद खतरनाक है. बाथे-बथानी-मियांपुर के जनसंहारियों की ही तर्ज पर कामेश्वर यादव की रिहाई ने साबित कर दिया है कि बिहार में सामंती-सांप्रदायिक ताकतों का राज बदस्तूर जारी है. भागलपुर दंगा पीड़ितों को न्याय दिलाने का वादा करने वाली नीतीश सरकार ने अपने वादे से मुकरते हुए उनका न्यायिक संहार रचाया है. माले राज्य सचिव ने आगे कहा कि अपने 49 पन्ने के आदेश में हाइकोर्ट ने ठीक उन्हीं बातों का उल्लेख किया है, जैसी टिप्पणी वह बाथे-बथानी जैसे जनसंहारों के मामले में कर चुकी है. प्राथमिकी दर्ज करने से लेकर केस के अनुसंधान करने सहित गवाहों की गवाही ठीक से नहीं कराने, प्राथमिकी दर्ज कराने वाले सूचक की गवाही सही ढंग से नहीं कराने के आधार पर कामेश्वर प्रसाद को इस केस से बरी कर दिया गया है. जाहिर है कि नीतीश सरकार ने दंगाइयों को सजा दिलाने के प्रति घोर लापरवाही बरती है और इस तरह से उसने दंगाइयों की रिहाई के लिए आधार तैयार करवाने का काम किया है.


नीतीश सरकार की मंशा का पर्दाफाश इस तथ्य से भी हो जाता है कि उन्हीं के द्वारा गठित भागलपुर दंगा आयोग की रिपोर्ट पिछली विधानसभा के अंतिम सत्र में पेश किया गया था, जिसकी वजह से उसपर कोई चर्चा तक नहीं हो सकी है. हमने उसी वक्त कहा था कि धर्मनिरपेक्षता का चाहे नीतीश कुमार जितना दावा कर लें, भागलपुर सांप्रदायिक दंगे की सच्चाई पर वे पर्दा डालने की चाल चल रहे हैं. अंत में माले राज्य सचिव ने कहा कि यदि सरकार में तनिक भी बिहार जनादेश 2015 के प्रति सम्मान बचा है, तो कामेश्वर यादव की रिहाई के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाए और उसकी रिहाई के आदेश को खारिज करवाए.
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