विशेष आलेख : सबकों मोक्ष देने वाले काशी का कब होगा उद्धार

भगवान भोलेनाथ के त्रिशूल पर टिकी काशी, गलियों का शहर है। इस शहर का कण-कण ऐतिहासिक है। संस्कृति, संस्कारों और परंपराओं की थाती सहेजती पुरातन शहर का अपना अलग मिजाज रहा है। सदियों से लोग बाबा विश्वनाथ, माता पार्वती और कलकल, निश्चल होकर बहने वाली मां गंगा को श्रद्धा से निहारने भारत ही नहीं सात समुंदर पार विदेशों से भी लोग आते रहे है। पर्यटन विभाग की मानें तो हजारों पर्यटक रोजाना बनारस आ रहे हैं। लेकिन अब गंदगी, जाम, टूटी-फूटी सड़के, प्रशासनिक बदइंतजामी इसके साख पर बट्टा लगा रही है 



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वाराणसी (सुरेश गांधी )‘काशी क्योटो बनेगा। माॅडल सिटी के रुप में विकसित होगा। गड्ढामुक्त होंगी सड़के। वरुणा एवं अस्सी नदी का कायाकल्प होगा। ओवरब्रिजों का जाल बिछाकर बीएचयू, सारनाथ समेत कई स्थलों की दूरियां कम होगी।‘, जैसे विकास के जुमले सुनते-सुनते कान पक गए हैं। लेकिन वास्तविकता के धरातल पर तीन साल में बनारस की व्यथा जस का तस है। खस्ताहाल टूटी सड़के, हिचकोले खाते यात्री, सुविधाओं के अभाव एवं लापरवाहियों के चलते दम तोड़ते मासूम मरीज। कचड़ों से पटी सड़के व नालियां इस कदर बजबजा रही है कि चलना दूभर हो गया है। मतलब साफ है संस्कृति, संस्कारों और परंपराओं की थाती सहेजती काशी जो सबकों मोक्ष देती है, लेकिन उसका कब उद्धार होगा, इसका जवाब अब हर काशीवासी चाहते हैं। यह बातें संकटमोचन मंदिर के महंत एवं आईआईटी बीएचयू के प्रो. विश्वम्भरनाथ मिश्र ने कहीं। वे बुधवार को वाराणसी नगर-निगम और ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ लोकल सेल्फ-गवर्नमेंट के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित बेटर बनारस समारोह को संबोधित कर रहे थे। 


आंकडों से नहीं जमीनी कवायद से बदलेगी काशी की सूरत। 
श्री मिश्र ने स्पष्ट शब्दों में कहा, आंकडों से नहीं जमीनी कवायद से बदलेगी काशी की सूरत। इसके लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत स्थानीय मंत्री व जनप्रतिनिधियों को आंकडों की बाजीगरी व लुभावने बयानों से बाहर निकलकर जमीनी कवायद करनी होगी, तभी बदलेगी काशी की सूरत। काशीवासियों ने गुजरात के नरेन्द्र मोदी को अपनाया, उन्हें अपना नेता इस उम्मीद में चुना कि अब काशी का उद्धार हो जायेगा। लेकिन अफसोस है कि उनके प्रधानमंत्री बनने के तीन साल बाद भी काशी जस की तस है। मोदी जी ने वायदे बहुत किए लेकिन उन वायदे पर सिर्फ कागजों में ही काम नजर आता है, हकीकत की जमीन पर सब गोलमाल है। बनारस का मूल काशी स्टेशन का उद्धार आज तक नहीं हो पाया। जबकि रेल राज्यमंत्री मनोज सिनहा यही के पड़ोसी जिले से है। गंगा किनारे 87 से अधिक घाट है, लेकिन बदइंतजामी के चलते सारे घाट खोखला हो चुके है। इसकी बड़ी वजह यह है कछुआ सेंचुरी के नाम पर गंगा उस पार बालू का टीला खड़ा हो गया है और पानी का दबाव घाटों पर है। उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति पुराना होता है उसकी देखभाल और इलाज दोनों बेहद संजीदगी से होनी चाहिए। लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा है। सड़कों का आलम यह है कि दो-चार को छोड़ दें तो सब गड्ढे में ही तब्दील हो चुके हैं। लंका से लेकर गोदौलिया तक की सड़क पिछले 10 वर्षों से जर्जरता की शिकार होकर अब यमराज बन चुकी है। हर दिन कोई न कोई यात्री गिरकर अपनी हाथ-पैर तुड़वा रहा है। 

गंगा नदी नहीं मां है 
प्रो. मिश्र ने कहा कि मां गंगा को नदी की संज्ञा देने वाले लोग अज्ञानता के परिचायक है। मां गंगा कभी नदी नहीं हो सकती। पूरी दुनिया में मां गंगा का जल ही ऐसा जल है जिसे श्रद्धालु दरश, परश, स्नान और आचमन के लिए दूर-दूर से आते है। मां गंगा को नदी की संज्ञा देकर लोग अदूरदर्शी सोच का परिचय दे रहे है। बनारस की स्वच्छता पर बोलते हुए महंत प्रो. विश्वम्भरनाथ मिश्र ने कहा कि नगर-निगम जब नगर-पालिका था तो काशी चमकती थी। पालिका के कर्मचारी मशक के सहारे नालियों की ऐसी सफाई करते थे कि लोग यह कहते थे कि उपरोक्त नाली की सफाई अभी हुई है उधर गंदगी मत करना। लेकिन जब से नगर पालिका नगर-निगम का रुप लिया तब से इच्छाशक्ति के आभाव में काशी की गालियां और नालियां गन्दगी से कराह रही है। यह दुर्भाग्य है कि काशी की सफाई के लिए दिल्ली और लखनऊ के पंचसितारा होटलों में बैठकर काशी की स्वच्छता का खाका खींचने वाले लोग यह भूल गए है कि नगर-निगम की भी अपनी जिम्मेदारी होती है। आज स्वच्छता को लेकर देशभर में अभियान चलाया जा रहा है मगर पीएम का संसदीय क्षेत्र काशी में की दुर्दशा के लिए कोई जिम्मेदार है तो केवल अफसर है। कहा जा सकता है वर्षों से यह शहर सबसे प्रदूषित और गंदे शहरों में से एक बनता जा रहा है। यहां की बढ़ती जनसंख्या के लिए पर्याप्त बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। खस्ताहाल सड़कों, हिंसा, सड़क जाम और बिजली एवं पानी की बाधित आपूत्र्ति से लोग परेशान है। सरकारी विभागों में माफिया और ठेकेदारों का हस्तक्षेप भी एक प्रमुख कारण है। 

निगम को आर्थिक मजबूती देने के बजाय औद्योगिक घरानों को मजबूत करना घातक 
बढ़ती बेरोजगारी के साथ शहर के सबसे बड़े मार्केट ट्रेंड ‘बनारसी पान‘ और ‘बनारसी साड़ी‘ अपने अस्तित्व के लिए लड़ रहे हैं। जबकि वाराणसी के इस प्राचीन विरासत को बरकरार रखने की आवश्यकता है। स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा करने के लिए कुटीर, हस्तशिल्प और हथकरघा उद्योग को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। इसके अलावा शहर की पुरानी प्रतिष्ठा को भी वापस लाने की जरूरत है। वर्तमान दौर में यह देखा जा रहा है कि देश के औद्योगिक घरानों द्वारा सिमित अपने आमदनी के 10 फीसदी हिस्सा नगर-निगम को देकर निगम को पंगु बनाया जा रहा है। यह दुर्भाग्य है कि सरकारें नगर-निगम को आर्थिक मजबूती न देकर औद्योगिक घरानों की मजबूरी बना ली है। यह भविष्य के लिए खतरनाक है। निगम को इस विशेष कार्य के लिए अपने कोष में धन रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि बेहतर नागरिक सुविधाओं को उपलब्ध कराए बिना काशी का उद्धार संभव नहीं है। इन समस्याओं को दूर कराने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने लोकसभा चुनाव के दौरान दूर कराने का वादा किया था। लेकिन उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद विभिन्न योजनाओं के तहत पैसे तो खूब आएं लेकिन वह जमीन पर दिखाई नहीं पड़ रहे हैं। 


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