गुजरात मेरे लिए ‘दूसरा घर’ : राष्ट्रपति कोविंद

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महेसाणा, 03 सितंबर, राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने आज कहा कि गुजरात में उन्हें सहज अपनेपन का अनुभव होता है तथा यह राज्य उनके लिए दूसरे घर जैसा है। श्री कोविंद ने आज से शुरू हुए अपने दो दिवसीय गुजरात प्रवास के दौरान यहां जैन संत पद्मसागरसुरीश्वरजी महाराज के 83 वें जन्मदिन के अवसर पर आयोजित समारोह में कहा कि राष्ट्रपति बनने के बाद यह उनकी पहली गुजरात यात्रा है पर इस राज्य से उनका करीब 45 साल पुराना संबंध है। वह पहले भी लगातार गुजरात आते रहे हैं। युवा अवस्था में वह तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के साथ काम कर चुके हैं और उनके साथ भी यहां आ चुके हैं। वह गुजरात के कोने कोने से वाकिफ हैं। यहां उन्हें अपनेपन का सहज अनुभव होता है। भले ही उनका जन्म उत्तर प्रदेश में हुआ हो पर गुजरात उनके लिए दूसरे घर जैसा है। राष्ट्रपति ने कहा कि गुजरात ने देश को वलसाड जिले के निवासी स्वर्गीय देसाई तथा उत्तर गुजरात के महेसाणा जिले के रहने वाले श्री नरेन्द्र मोदी के तौर पर दो प्रधानमंत्री दिये हैं। गुजरात के किसानों की भी एक अलग पहचान है और सहकारी आंदोलन देश के लिए उदाहरण हैं। उन्होंने हाल में उत्तर गुजरात में बाढ के दौरान मुख्यमंत्री विजय रूपाणी के पांच दिन तक वहीं रह कर सरकार चलाने की भी सराहना की। उन्होंने इस मौके पर महात्मा गांधी की न्यास सिद्धांत (थ्योरी ऑफ ट्रस्टीशिप) की चर्चा करते हुए लोगों से ऐसी ही भावना से काम करने का आहवान किया। उन्होंने जैन संत से 1994 से हुई अपनी पहचान की चर्चा की तथा उनके साथ अपने संबंध को पूर्वजन्म से जुडा करार दिया। मानवसेवा के लिए उनकी ओर से की जा रही पहल तथा प्राचीन पांडुलिपियों को बचाकर गांधीनगर के नजदीक कोबा के ज्ञान मंदिर में दो लाख पांडुलिपियों के विशालतम संग्रह के निर्माण जैसे सांस्कृतिक योगदान की सराहना की तथा उनसे आहवान किया कि वे अपने लाखों करोडों अनुयायियों को अहिंसा और न्यास सिद्धांत की तर्ज पर काम करने को कहें। राष्ट्रपति ने कहा कि वह चाहते हैं कि आज राष्ट्र का हर व्यक्ति राष्ट्र का निर्माता बने। इस मौके पर उन्होंने पूर्व सैनिक कल्याण कोष के लिए 63 लाख रूपये का योगदान देने के लिए मनीष भाई मेहता की सराहना की। उन्होंने कहा कि सशस्त्र बलों के सर्वोच्च कमांडर के तौर पर वह उन्हें धन्यवाद देते हैं। मैने राष्ट्रपति बनने के बाद यह निर्णय लिया था कि दिल्ली के बाहर पहली यात्रा सेना से संबंधित होगी और मैने लद्दाख में गोरखा बटालियन की पहली यात्रा की थी। 

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