विशेष आलेख : क्यों जिन्दगी का सच नहीं ढूंढ़ पाये?

life-and-dream
जिन्दगी के सवालों से घिरा वक्त जीवन के सच को ढूंढ़ने की कोशिश कर रहा है। यह कोशिश अतीत से वर्तमान तक होती रही है। अनेक महापुरुषों ने इसके लिये अपना जीवन होम कर दिया। इसी जीवन के सच की सांसों की बांसुरी में सिमटे हैं कितने ही अनजाने-अनसुने सुर जो बुला रहे हैं अपनी ओर, बाहें फैलाए हुए। हमें बिना कुछ सोचे, ठिठके बगैर, भागकर जिंदगी की पगडंडी को ढूंढ लेना चाहिए। लेकिन क्या कारण है कि हम चाह कर भी जिन्दगी का सच नहीं ढूंढ़ पाये? जो इस सच से रू-ब-रू कराने की कोशिश करते हैं हम उनके कोमल हृदय को क्रूरता से लील देते हैं। वे चाहे गांधी हो या सुकरात। चाहे दयानन्द सरस्वती हो या ब्रूनो। यह कैसी मानसिकता के वारिस हैं हम? इसीलिये फ्रेंच फिलाॅसफर रेने देकार्त को कहना पड़ा कि जहीन से सोचने वालांे की एक दिक्कत यह रही है कि वे बहुत अच्छे और बहुत बुरे एक साथ होते हैं। 


बाढ़ आ रही थी, लोग सो रहे थे। सुकरात ने हल्ला मचाया कि लोग सावधान हों, जीवन बचाएं, जीवन के सच को पकडे़ और अज्ञान की बाढ़ में न डूबें। पर लोगों ने सोचा, यह हमारी नींद खराब कर रहा है और उन्होंने सुकरात को जहर पिला दिया। ईसा ने अपने मतलब की बात कभी किसी से नहीं कही। प्रेम और सेवा ही उनका सन्देश था। पर लोगों ने भड़क कर उन्हें क्रूरता के साथ क्राॅस पर चढ़ा दिया। ब्रूनो ने क्या कहा था लोगों को? यही कि किसी और की बात मानने से पहले अपनी आत्मा की बात सुनो। पर लोगों ने उसे रोम के उस चैराहे पर जीवित जला दिया, जिस पर आज उसकी विशाल मूर्ति खड़ी है। जब चारों तरफ पाखण्ड का अंधेरा था तब स्वामी दयानन्द ने राह दिखाई, साहस किया। पर क्या हुआ? उन्हीं लोगों ने उन्हें कांच पिला कर मार डाला। गुलामी से मुक्ति देने वाले गांधीजी का जीवन क्या ऐसा था कि उनकी छाती को गोलियां छलनी किया जाये? इतिहास साक्षी है कि जो सुधारक के सामने विनम्र एवं जिज्ञासु भाव से खड़े रहे हैं, वे बलिदान के बाद सुधारक की स्मृति में नतमस्तक हुए हैं। इसलिए बलिदान ही जीवन मूल्य है समाज के लिए और बलिदान ही जीवन मूल्य है सुधारक के लिए। एक लेकर पुजारी बनता है, दूसरा देकर पूज्य। पूज्य और पुजारी के इसी रिश्तें ने जीवन को उन्नत बनाने की दिशा सार्थक प्रयास किया है। आज जीवन की दिशाएं उलझनभरी होती जा रहा है, चारों ओर एक घना अंधेरा छाया है, रोशनी की किरण कहीं दिखाई नहीं दे रही है।

इस बिन्दु पर सोच उभरती है कि हम दायें जाएं चाहे बायें, अगर श्रेष्ठ बनना है तो दृढ़ मनोबल चाहिए और संकल्प चाहिए। गीता से लेकर जितने ग्रंथ हैं वे सभी हमें यही कहते हैं कि ‘मनोबल’ और ‘संकल्प’ ही वह शक्ति है जो भटकते हुए व्यक्ति को लक्ष्य तक पहुंचाती है। घुटने टेके हुए व्यक्ति को हाथ पकड़ कर उठा देती है। अंधेरे में रोशनी दिखाती है। विपरीत स्थिति में भी मनुष्य को कायम रखती है। वरना हम अन्ध-विश्वासों में, ताबीजों, मंत्रों-तंत्रों के चक्कर में मनोबल जुटाने के बहाने और कमजोर एवं संकल्पहीन हो जाते हैं।  एक दृढ़ मनोबली व्यक्ति के निश्चय के सामने जगत् किस तरह झुक जाता है। बाधाएं अपने आप हट जाती हैं। जब कोई मनुष्य समझता है कि वह किसी काम को नहीं कर सकता तो संसार का कोई भी दार्शनिक सिद्धांत ऐसा नहीं, जिसकी सहायता से वह उस काम को कर सके। यह स्वीकृत सत्य है कि दृढ़ मनोबल-संकल्प से जितने कार्य पूरे होते हैं उतने अन्य किसी मानवीय गुणों से नहीं होते। इसलिये जीवन कलापूर्ण होना चाहिए। जो जीने की कला को जानता है, वह आनंद, सुख और शांति के साथ जीवन जी सकता है। जो जीने की कला को नहीं जानता, वह मर-मर कर जीता है, दुखमय जीवन जीता है।

सच्चाई की कसौटी पर खरा उतरा हुआ हेनरी का वाक्य है कि अपने सपनों और अपनी महत्वाकांक्षाओं पर अपनी पकड़ ढ़ीली मत पड़ने दीजिए, उनके हाथ से निकल जाने पर आप जीवित तो रहेंगे किन्तु जीवन नहीं रह जाएगा।’ सचमुच हम जीवित तो हैं लेकिन उसमें जीवन ऊर्जा-संयम, संकल्प और मनोबल नहीं है। संयम नहीं, संकल्प नहीं, मनोबल नहीं, तो जीवन क्या है? मात्र बुझी हुई राख है। फिर तो वह मृत्युमय जीवन है। भयभीत जीवन है। ब्रिटिश पीएम और लेखक बेंजमिन डिजरायली हालात इंसान के काबू में नहीं हैं लेकिन बर्ताव आदमी के अपने हाथ में हैं। हमें इसी जिंदगी से खोजना होगा वह अर्थ, जो मनुष्य को मनुष्य होने की प्रेरणा देता है, संवेदनाओं को देता है ऐसा विस्तार, जिससे जीत ली जाती है बड़ी से बड़ी जंग। हमें चुराने होंगे वे लम्हे, संजोने होंगे वे एहसास, जो कदम-कदम पर जिंदगी के साथ होने की आहट को उमंगों की तरह पिरो दें। रोजमर्रा की सख्त सड़क पर हमें ढूंढ लेना होगा वो कोना, जो रचा लेता है, चाय की प्यालियों के साथ कोई खूबसूरत-सी कविता की पंक्ति। दीवारों में बनानी होंगी वे अलमारियां, जो फैज़्ा और गालिब की मौजूदगी से कोने-कोने को भींच दे, नज़्मों की रूह में। आचार्य तुलसी और गांधी की-सी जिजीविषा से सराबोर कर दे आती हुई हवाओं को। रंगों और ब्रश की छुअन से उकेरने होंगे ऐसे चेहरे, जो याद दिलाते रहें शांति, सह-जीवन और एकता की तस्वीर को। दरवाजे को देनी होगी वो थाप जो आत्मसात कर ले हर इक टकटकी को सुबह के मिलने पर.. उगाने होंगे वे पौधे, जिनकी टहनियों से छनती सूरज की रोशनी बदल दे दोपहरी के ताप। इसीलिये महान बाॅक्सर मुहम्मद अली ने कहा है कि सपनों को सच करने का सबसे अच्छा तरीका है कि जाग जाएं।

हमारे जीवन के गुणात्मक पहलू को ऊंचा बनाने के लिए आदमी की तीसरी आंख जागृत हो और चरित्रनिष्ठा का विकास हो। जो आदमी अनीति के रास्ते पर चलता है, उसका बीच में ही पतन हो जाता है। इसलिए व्यक्ति सही-गलत व अच्छे-बुरे का विवेक रखता हुआ अपने गुणात्मक पक्ष को मजबूत बनाने का प्रयास करे। गुणी व्यक्ति सबका प्रिय बन सकता है। हमारी दुनिया में कुछ श्रेष्ठ लोग होते हैं, कुछ मध्यम या सामान्य स्थिति के लोग होते हैं और कुछ अधम स्थिति के लोग भी मिल जाते हैं। यह दुनिया बहुरंगी है। बहुरत्ना वसुन्धरा धरती में अनेक प्रकार के रत्न हैं तो कुछ कंकर भी हैं। एक समूह या समाज जहां होता है वहां कुछ व्यक्ति बहुत अच्छे मिल सकते हैं तो कुछ व्यक्ति सामान्य की रेखा से नीचे भी मिल सकते हैं। सामान्य की रेखा से नीचे का मतलब है जिनमें स्थिरता की कमी है, शालीनता की कमी है, सभ्यता की कमी है, विनयशीलता भी नहीं है, जिनमें ज्ञान या समझ का भी अभाव है और जिनकी वृत्तियों में उत्तेजना का प्राबल्य है। जिस प्रकार समुद्र में अच्छी चीजें मिलती हैं तो अवांछनीय और अनपेक्षित चीजें भी मिल सकती हैं। उसी प्रकार एक समूह में सब कुछ समान नहीं होता, कुछ बातों में समानता हो सकती है तो कुछ बातों में असमानता भी देखने को मिलती है। परन्तु श्रेष्ठ व्यक्तियों को देखकर मध्यम स्थिति वाले व्यक्ति स्वयं में श्रेष्ठता का विकास कर सकते हैं।

जीवन अंधेरा-सा स्याह ही नहीं है, बल्कि रंग-बिरंगा भी है। यह श्वेत है और श्याम भी। जिंदगी की यही सरगम कभी कानों में जीवनराग बनकर घुलती है तो कहीं उठता है संशय का शोर। जीवन को मजबूत बनाते हैं, रिश्ते, लेकिन वे भी साथ की गर्माहट मांगते हैं। सिखाते हैं, मकानों को घर की शक्ल दे दो। ऐसे जिओ कि खुद से पार चले जाओ। किसी से डरना ही हो तो बुरे कामों से डरो। ऐसा कर सके तो हर अहसास, हर काम खूबसूरत होगा और साथ-साथ सुंदर हो जाएगी जिंदगी अपनी। खुद को इसी जिंदगी के बीच देखना तो होगा ही, जिंदगी के सच्चे अर्थों के लिए। उन्हीं छोटे-से जमीन के टुकड़ों पर छोटी-सी जिंदगी के लिए देखना तो होगा, इस दौड़-भाग को। घर को बचाए रखना होगा.. बस मकान होने से, आखिर ईंट और रेत के गारे को सीमेंटों का जुड़ाव कब तक टिकाए रखेगा? इसे प्रेम के स्पर्श से ही सजीव बनाया जा सकता है। लेकिन संशय से भरा हुआ आदमी प्रेम से खाली होता है। पारस्परिक स्नेह, सद्भाव, सौहार्द और विश्वास के अभाव में उसका संदेहशील मन सदैव सुरक्षा के साधन जुटाने में संलग्न रहता है। उसका मन कभी निर्भय नहीं होता, वृत्तियां शान्त नहीं होतीं, संग्रह उसके सुख, संतोष और शांति को सुरसा बन लील जाता है। आचार्य श्री तुलसी ने कहा, ‘परिग्रह के साथ लिप्सा का गठबंधन होता है। लिप्सा भय को जन्म देती है और भय निश्चित रूप से हिंसा और संघर्ष का आमंत्रण है।’ जब संग्रह का स्थान त्याग लेता है, शक्ति की अपेक्षा शांति लक्ष्य बनती है, तब अपरिग्रह, अभय और अहिंसा का पूरा वृत बनता है तभी भावी जीवन को सुदृढ़ और शुभ आधार मिलता है। 





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(ललित गर्ग)
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