सिर्फ कोर्ट ट्रायल से नहीं बदलेगा हमारा समाज , परिवार और समाज को भी कसौटी पर कसना होगा

हाल फिलहाल मुंबई में एक फ्लैट में विदेश में रह रहे बेटे के माँ के कंकाल मिलने की खबर आयी, फिर बक्सर के  डी एम के आत्म हत्या की खबर , फिर गौरी लंकेश की हत्या की खबर और फिर गुरुग्राम के स्कूल में सात साल के बच्चे की हत्या की खबर।  पिछले साल कोटा में इंजीनियरिंग की प्रतियोगी परीक्षा में पास होने के बाद बच्ची की आत्महत्या की खबर। देखा जाये तो ऐसी खबरें अब रोज़मर्रा बन गयी हैं। लेकिन फिर भी कोई इनमें सिर्फ राजनीतिक रंग देख पाता है तो कोई सिर्फ पारिवारिक या मनोवैज्ञानिक कारण बताकर आगे निकल जाता है. कोई बेटे पर सारा दोष मढ़ देता है तो कुछ अपराधी को फांसी की सजा देने की सिफारिश में समस्या का समाधान ढूँढ लेते  है और असली वजहों तक जाने का हमारे पास वक़्त ही नहीं होता। स्कूल बस के कंडक्टर को पकड़ लिया जायेगा, सजा सुना दी जायेगी, वह जेल चला जायेगा, ऐसा ही और भी घटनाओं के दोषियों के साथ भी किया जायेगा।  हर घटना का सिर्फ कोर्ट ट्रायल होगा, लेकिन एक भी घंटना के लिए परिवार या समाज को कठघड़े में बिलकुल भी खड़ा नहीं किया जायेगा। हम ये कहाँ जान पाएंगे कि किन वजहों से एक आदमी इतना वहशी हो गया की एक मासूम को गोदते हुए उसके कलेजे से चीत्कार नहीं निकली, कैसे एक व्यक्ति को गोलियों से छलनी करते हुए हत्यारे का दिल नहीं बैठा, क्यूँ  एक माँ फ्लैट के अंदर कंकाल बन गयी और किसी को इसकी भनक तक नहीं मिली। अपनी अमूल्य जिंदगी को कोई कैसे समाप्त कर लिया जिसके पीछे इतने रोने वाले लोग बैठे थे। 



प्रसिद्ध समाजशास्त्री दुर्खेइम ने आत्महत्या के कारणों का जो विस्तृत आनुभविक अध्ययन १९वीं सदी में फ्रांस में किया था, वे सभी कारण महत्वपूर्ण रूप से आज हमारे समाज की वर्तमान परिस्थितियों को बयान कर पा रहे हैं।  उन्होंने सामाजिक संरचना, सांस्कृतिक मानकों एवं मूल्यों जैसे सोशल फैक्ट्स की बात की थी जो व्यक्ति के ऐसे विभिन्न कृत्यों की वजह बनती है। तकनीकी रूप से आधुनिक हो रहे समाज में निश्चित रूप से मीडिया और विशेषकर नयी मीडिया (फेसबुक, वाट्सएप्प) भी व्यक्ति के व्यवहार के महत्वपूर्ण सामाजिक कारण के तौर पर सामने आया है। इसका प्रभाव भी लोगों व्यवहारों पर खूब देखा जा सकता है।उन्होंने अपने अध्ययन में पाया था कि अकेले रहने वाला व्यक्ति ख़ुशी से साथ रह रहे साथियों की तुलना में ज्यादा आत्महत्या करते हैं।  अपने आंकड़ों के आधार पर उनका दावा था कि सामाजिक कारणों से आत्महत्याएं होती हैं न कि सिर्फ व्यक्तिगत और मनोवैज्ञानिक कारणों से। हमारे लिए ये सोचने का वक़्त आ गया है क्यूँ कि तेज़ी से हो  रहे शहरीकरण और तकनीकी विकास ने  एक ऐसा माहौल बनाया है जहाँ हर व्यक्ति अपने आप अकेला महसूस कर रहा है। वह दुविधा में भी  है कि उसे क्या करना चाहिए ? चाहे वह एक बच्चा हो, माँ -बाप हो, एक कोई भी एक आम इंसान।  अपनी भूमिकाओं को लेकर ऐसी दुविधा उत्पन्न हुई है जिसका समाधान किसी को नहीं मिल रहा है और उस स्थिति में तरह तरह के विचलित करने
वाले कृत्य सामने आ रहे हैं।  

दुर्खेइम ने कहा कि जो व्यक्ति समाज से जुड़ा हुआ है और समझता है कि उसके जीवन की कुछ अहमियत है, उसमें आत्महत्या करने की सम्भावना कम होती है, लेकिन जैसे ही यह जुड़ाव कम महसूस होगा उसमें यह भावना प्रबल हो जाएगी। और मुझे ऐसा लगता है कि ऐसा व्यक्ति जिसमे अपने समाज से जुड़ाव का भाव है , निश्चित रूप से किसी और की हत्या को भी अंजाम नहीं दे पायेगा. क्यूँ कि जुड़ाव का भाव एक सम्मान का भाव देता है और सम्मान का भाव जुड़ने के बाद एक ऐसी जिम्मेदारी का एहसास आता है कि अपनी या किसी और की हत्या करना आसान नहीं रह जाता। दुर्खेइम कहते  हैं कि सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक उथल पुथल का भी समाज और व्यक्ति के दैनिक जीवन पर ऐसा प्रभाव होता है कि व्यक्ति में अपने समाज से दूरी का अहसास आता है जिससे आत्महत्या की भावना प्रबल होती है। बड़े शहरों में ऐसे वारदातों की संख्या बढ़ी है और अपने परिवार और समाज से दूरी इसकी मुख्य वजह बनी है, जहाँ एक परिवार में भी लोगों के पास एक दूसरे के लिए वक़्त की कमी हुई है। तभी मुंबई के फ्लैट में माँ कंकाल बन जाती है और किसी को पता नहीं चलता। कौन जनता है मौत ही हुई या अपने जीवन को अकेलेपन में समाप्त ही कर लिया और फिर भी परिवार और समाज बेखबर ही रहा। और एक वज़ह दुर्खेइम ने बताया सुसाइड का।  अपनी अलग अलग भूमिकाओं के कारण परिवार या समाज से जुड़ा व्यक्ति किसी वजह से, जैसे किसी की मौत या रिटायरमेंट के कारण अपनी अहमियत खो देता है तो आत्महत्या की ओर अग्रसर होता है। वृद्धों में यह वजह मुखर रूप से सामने आता है। एक वजह ये भी बताया कि समाज बहुत नियामक बन जाये तो भी व्यक्ति खुद को नकारता है और अपना अस्तित्व समाप्त करना चाहता है. ऐसा नियामक हमारे परिवारों में बहुत हावी हो रहा है। जहाँ एक तरफ  डीएम के परिवार के लोग तो दूसरी तरफ बच्चों को नए युग के माता पिता अपने नियमों और इच्छानुरूप एक सांचे में ढालने को आतुर हैं। उस व्यक्ति या बच्चे की इच्छा को अहमियत नहीं दी जा रही और वे  तंग आकर उन परिस्थितियों से जूझने के बजाय अपने जीवन को ही समाप्त कर ले रहे हैं।  और हम हैं कि इन सभी घटनाओं की वज़ह सिर्फ उस व्यक्ति विशेष में देखकर आगे निकल जाना चाह  रहे हैं लेकिन फिर ऐसी ही वारदातों सेसामना हो रहा है। अब हमें रूककर इन कारणों पर  काम करना होगा। अपने आप को कठघड़े में खड़ा करना होगा और सोचना होगा कि परिवार और समाज की इकाई के बतौर हम अपनी भूमिका को कितनी अहमियत दे रहे है।  अपने परिवार, आस -पड़ोस से कितना इतिफाक रखते है, किसी की परेशानियां हमें परेशान करती भी है कि  सिर्फ अफ़सोस जताकर निकलने में माहिर होते जा रहे हैं हम?  तो फिर हम चाहे कितना भी सोच लें कि एक अदद फ्लैट, गाडी, घर में ढेरों सामान और सिर्फ अपने बच्चों के लिए ढेरों डिग्रियां जुटाकर ही खुशहाल हैं और उन्नति के पथ पर अग्रसर हैं तो दरअसल ये हमारी ग़लतफ़हमी है। अपने ही समाज के इन घटनाओं के लिए हम सब भी कहीं न कहीं जिम्मेवार तो हैं !
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निभा सिन्हा
स्वतंत्र पत्रकार एवं गेस्ट लेक्चरर

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