तिब्बत को नापने वाले नैन सिंह को समर्पित गूगल का डूडल

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नयी दिल्ली 21 अक्टूबर, सर्च इंजन गूगल ने आज का अपना डूडल बिना आधुनिक उपकरणों के केवल रस्सी,कंपास और बैरोमीटर के जरिए पूरे तिब्बत क्षेत्र को नाप कर उसका पहला नक्शा बनाने का दुस्साहसिक काम करने वाले शख्स नैन सिंह रावत को समर्पित किया है। श्री रावत की आज 187 वीं जयतीं है। श्री रावत दुनिया के पहले ऐसे शख्स थे जिन्होंने ल्हासा की समुद्र तल से ऊंचाई कितनी है यह बताया था। उनकी इस प्रतिभा के अंग्रेजी हुक्मरान भी कायल हो गए थे और उनका नाम पूरे सम्मान के साथ लेते थे। उन्नीसवी शताब्दी में अंग्रेज भारत का नक्शा तैयार कर रहे थे लेकिन तिब्बत का नक्शा बनाने में उन्हें बहुत दिक्कत आ रही थी। तिब्बत उन दिनों ‘फाॅरबिडन लैंड’ के नाम से जाना जाता था जहां किसी भी विदेशी के जाने की मनाही थी अगर चोरी छिपे कोई चला गया तो उसके लिए सजाए मौत तय थी। ऐसे में अंग्रेजों ने वहां किसी किसी भारतीय नागरिक को भेजने की योजना बनाई। वर्ष 1863 में अंग्रेज सरकार को दो ऐसे लोग मिल गए। ये थे उत्तराखंड निवासी 33 साल के पंडित नैन सिंह और उनके चचेरे भाई मानी सिंह। दोनों भाइयों को ट्रेनिंग के लिए देहारदून लाया गया। उस समय दिशा और दूरी नापने के यंत्र काफी बड़े हुआ करते थे। लेकिन उन्हें तिब्बत तक ले जाना खतरनाक था, क्योंकि इन यंत्रों के कारण पंडित नैन सिंह और मानी सिंह दोनों ही पकड़े जाते। ऐसा होता तो उन्हें मौत की सजा पाने से कोई नहीं रोक सकता था। ऐसे में तय किया गया कि दिशा नापने के लिए छोटा कंपास और तापमान नापने के लिए बैरोमीटर इन भाइयों को सौंपा जाएगा। दूरी नापने के लिए नैन सिंह के पैरों में 33.5 इंच की रस्सी बांधी गई ताकि उनके कदम एक निश्चित दूरी तक ही पड़ें। हिंदुओं की 108 की कंठी के बजाय उन्होंने अपने हाथों में जो माला पकड़ी वह 100 मनकों की थी ताकि गिनती आसान हो सके। साल 1863 में दोनों भाइयों ने अलग-अलग राह पकड़ी। नैन सिंह रावत काठमांडू के रास्ते और मानी सिंह कश्मीर के रास्ते तिब्बत के लिए निकले। हालांकि, मानी सिंह इसमें असफल रहे और वापस आ गए, लेकिन पंडित नैन सिंह रावत ने अपनी यात्रा जारी रखी। नैन सिंह सफलतापूर्वक तिब्बत पहुंचे और पहचान छिपाने के लिए बौद्ध भिक्षु के रूप में वहां घुल-मिल गए. वह दिन में शहर में टहलते और रात में किसी ऊंचे स्थान से तारों की गणना करते. इन गणनाओं को वे कविता के रूप में याद रखते। नैन सिंह अपना काम पूरा कर 1866 में मानसरोवर के रास्ते भारत वापस आ गए। पंडित नैन सिंह रावत के इस काम को ब्रिटिश सरकार ने काफी सराहा और 1877 में बरेली के पास 3 गांवों की जागीरदारी उन्हें उपहार स्वरूप दी और उन्हें ‘ कम्पेनियन ऑफ द इंडियन एम्पायर’ के खिताब से भी नवाजा।

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