
बिहार में बिजली संकट बढ़ता जा रहा है। सरकार का आरोप है कि केन्द्र सरकार से बिजली खरीदने के लिए हुए करार का लगातार उल्लंघन किया जा रहा है। बिहार राज्य विद्युत बोर्ड के एक अधिकारी की मानें तो केन्द्र सेक्टर से राज्य को हर हाल में 1695 मेगावॉट बिजली मिलनी चाहिए। यदि विद्युत संयंत्रों में कोई खराबी भी आ जाए, तो भी इसकी भरपाई करनी होती है। लेकिन इस करार का लगातार उल्लंघन होता रहा है।
अधिकारी ने कहा कि राज्य में ठंड के दिनों में 2,100 से 2,400 मेगावॉट तथा गर्मी के दिनों में 2,500 से 3,000 मेगावॉट बिजली की जरूरत होती है। परंतु, पिछले कुछ दिनों से केन्द्रीय सेक्टर के तापीय एवं पनबिजली घरों से 700 से 900 मेगावॉट बिजली ही मिल पा रही है। राज्य के ऊर्जा मंत्री बिजेन्द्र प्रसाद यादव मानते हैं कि बिजली के मामले में राज्य पूरी तरह केन्द्र पर निर्भर है, परंतु केन्द्र सरकार मदद नहीं कर रही है। वह कहते हैं कि राज्य सरकार ने अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए अब बाजार से बिजली खरीदने का फैसला किया है। वह कहते हैं कि राज्य में तापघर लगाने की भी पहल की जा रही है।
उल्लेखनीय है कि पिछले विधानसभा चुनाव में जहां विपक्षी दलों ने बिजली समस्या को प्रमुख मुद्दा बनाया था, वहीं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अगले कुछ वर्षों में विद्युत संकट के समाधान का वादा किया था। ऊर्जा मंत्री यादव ने बताया कि 1,500 मेगावॉट बिजली बाजार से खरीदने की कोशिश की जा रही है। इसके लिए निविदा निकाली गई है। वह कहते हैं कि यह एक लंबी प्रक्रिया है। यानी राज्य को बिजली संकट से जल्द निजात मिलने की संभावना नहीं है।
विद्युत विभाग के आंकड़ों पर गौर करें तो शुरुआत से ही बिजली के मामले में राज्य पिछड़ा रहा है। वर्ष 2009-10 में राज्य में बिजली की अधिकतम मांग 2,500 मेगावॉट थी तो अधिकतम आपूर्ति 1,508 मेगावॉट थी। वर्ष 2008-09 में अधिकतम मांग 1,900 मेगावॉट थी तो आपूर्ति सिर्फ 1,348मेगावॉट थी। इसी तरह 2007-08में राज्य के लिए 1,800 मेगावॉट की बिजली आवश्यक थी तो आपूर्ति 1,244 मेगावॉट ही थी। अनुमान है कि वर्ष 2012-13 तक राज्य को 4,000 मेगावॉट बिजली की जरूरत होगी।
वर्तमान में पूरा बिहार बिजली संकट से जूझ रहा है। प्रतिदिन किसी न किसी क्षेत्र में बिजली की मांग को लेकर लोग सड़क पर उतर रहे हैं। इस मामले में सरकार ने हाथ खड़े कर दिए हैं। पिछले विधानसभा सत्र में सत्ता पक्ष और विपक्षी सदस्यों द्वारा सदन में हंगामे के बाद ऊर्जा मंत्री ने स्पष्ट किया था कि बिजली संकट के जल्द समाधान का कोई उपाय फिलहाल सरकार के पास नहीं है।
राज्य विद्युत बोर्ड के प्रवक्ता हरेराम पांडेय का कहना है कि पिछले एक महीने से केन्द्रीय सेक्टर से विद्युत आपूर्ति में कोई सुधार नहीं हो रहा है। इस कारण राज्य में विद्युत संकट उत्पन्न हो गया है। दूसरी ओर कहलगांव और कांटी तापघरों में बिजली उत्पादन पूरी तरह ठप है। कोयला और पानी की समस्या तथा तकनीकी कारणों से ताप और पनबिजली घरों की करीब आधा दर्जन इकाइयों में उत्पादन ठप है। बरौनी तापीय विद्युत केंद्र से सिर्फ 50 मेगावॉट बिजली का उत्पादन हो रहा है। एक अन्य अधिकारी ने बताया कि केन्द्र सेक्टर से 800 मेगावॉट बिजली मिल रही है, जिसमें से 350 मेगावॉट बिजली अनिवार्य सेवा के तहत है।
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