तभी मिल पाती है अमर प्रतिष्ठा !!
जीवन के ध्येय को सामने रखकर जो लोग जीवननिर्माण का प्रयास करते हैं उन्हें जीवन में लक्ष्य पाने में सफलता जरूर प्राप्त होती है और जो लोग निरूद्देश्य होते हैं उन्हें जो चाहते हैं वह भी नहीं मिलता और अनचाहे भी कुछ प्राप्त नहीं हो पाता है। इसलिए जीवन की दशा और दिशा को स्वयं तय करें। कई लोग जमाने की चकाचौंध के मारे निर्णय लेते हैं और कई अपने परंपरागत संस्कारों और आदर्शों से बंधे हुए जीवन की राह चुनते हैं। सभी प्रकार के लोेगों के जीवन निर्माण में उनके द्वार तय किए गए ध्येय ही जीवन निर्माण की सीमाएं, उच्छृंखलताएं और मर्यादा-अमर्यादाओं को तय करते हैं।
दैवीय ऊर्जाओं और दिव्यताओं से संपन्न कुछ बिरले ही होते हैं जिन्हें अपने समग्र जीवन में सभी सुख और संसाधन एक साथ मिले होते हैं। लेकिन ये उन्हीं लोगों को एक साथ प्राप्त होते हैं जो इन भौतिक संसाधनोें की माया से ऊपर उठे हुए रहते हैं। फिर चाहे बात पद-प्रतिष्ठा, पैसे या पुण्य की ही क्यों न हो। जिनके पास पद-प्रतिष्ठा है उनके पास पैसा बना रह सकता है लेकिन उसका स्थायित्व संदिग्ध ही होता है क्योंकि असल में ऎसे लोगों के पास जो पैसा होता है वह लक्ष्मी न होकर अलक्ष्मी होता है, यह अलक्ष्मी और अधिक चंचला हुआ करती है। फिर जो लोग अपने पद के साथ न्याय करते हैं और पदों का उपयोग लोक कल्याण के लिए करते हैं उन्हीं के पास पैसा तथा प्रतिष्ठा बनी रह सकती है और जो ऎसा नहीं करते हैं उनके साथ न पैसा लंबे समय रह पाता है न प्रतिष्ठा।
बल्कि प्रतिष्ठा का हश्र ऎसा होता है कि चंद माहों और वर्षों में ही सिमट कर रह जाता है। और फिर इनकी प्रतिष्ठा ऎसी धूल धुसरित हो जाती है कि बरसों तक कोई नामलेवा नहीं रह जाता। कई तो हमारे सामने ऎसे उदाहरण हैं जिनको कोई कभी याद नहीं करता, न इनके करम ही ऎसे होते हैं लोग उन्हें याद करें। लोग वे ही याद आते हैं जो औरों के लिए जीते और मरते हैं। उन लोगों को कोई याद नहीं करता जो अपने लिए जीते हैं और औरों के हकों को कुचलकर अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखने भर के लिए मनुष्यत्व से हीन होकर हथकण्डों को अपनाते रहते हैं।
ऎसे लोगों का पूरा जीवन चार दिन की चाँदनी से ज्यादा कुछ नहीं होता। ये लोग कुछ दिन मौज करने के बाद गुमनामी के अंधेरों में खो जाते हैं और फिर उन्हें अपने पूरे जीवन में चारों तरफ वह अंधेरा दिखता है जिस अंधेरे का आश्रय पाकर ये लोग अपने कद को ऊँचा करने के प्रयासों में जुटे रहते हैं। जो लोग समाज और औरों के लिए त्याग तथा समर्पण की भावना से काम करते हैं वे ही जीवन के सभी उद्देश्यों में सफलता प्राप्त कर मानव जीवन को सार्थक बना सकते हैं। समाज का अधिकांश हिस्सा आज अपने में घिर कर रह गया है जहां उसकी दूसरों के प्रति संवेदनशीलता समाप्त होती जा रही है और उसकी बजाय ऎसी मनोवृत्ति का विकास होता जा रहा है जिसमें यदि इन लोगों के पास हिंसक जानवरों की देह होती तो सामने वालों को फाड़ खाते।
अपने आस-पास हो या दूर कहीं, ऎसे लोग बहुतायत में हैं जिनका शरीर तो आदमी का दिखता है लेकिन हिंसक और उन्मादी जानवरों के सारे गुण उनके कर्मों और व्यवहार से साफ झलकने लगते हैं और हमें अक्सर यह आभास होता है कि ये लोग वाकई पशु होते तो मनुष्यों की प्रजाति का क्या होता। इसलिए जीवन में वास्तविक आनंद और परम शांति की कामना हो तो त्याग करें और उन सारे कर्मों को त्यागें जिनसे हमारी पहचान करने में पशुता के लक्षणों का इस्तेमाल किया जाता है।
---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077
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