1 जनवरी 2008 को अस्तित्व मे आये ‘‘अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परम्परागत वन निवासी वन अधिकारांे की मान्यता कानून 2006 नियम 2008’’ को 8 वर्ष पूरे हो गए हैंै। जंगल पर आश्रित लोग जंगल के दुश्मन नहीं बल्कि दोस्त हैं। उसकी रक्षा उनका धर्म है और उनके बिना जंगल की रक्षा असंभव है। इन्हीं पहलुओं पर विचार कर सरकार ने यह नया अधिनियम बनाया है। इसके माध्यम से पहली बार आदिवासियों को उनके द्वारा वर्षो से जोती जा रही जंगल की जमीन ,सामुदायिक जंगल एवं आवास और आजीविका के अधिकारों को कानूनी मान्यता मिली है। इस कानून को अंग्रेजो के जमानेे से आदिवासियो एवं अन्य परम्परागत वन निवासियों पर चले आ रहे ऐतिहासिक अन्याय से मुक्ति दिलाने हेतु औजार के रूप में देखा गया। लेकिन बीते इन वर्षों में यदि इसकी समीक्षा की जाए तो कानून अब तक अपने लक्ष्यों को पूरा नहीं कर सका है। मांगल्या के पुत्र और गांव के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति 98 वर्षीय भावसिंह कहते है, कि हम कई सालों से उम्मीद लगाये बैठे थे, ‘‘कि जिस जंगल की जमीन को हम पीढि़यों से जोत रहे है, उस जमीन पर एक न एक दिन हमे सम्मान से रहने और खेती करने का अधिकार जरूर मिलेगा’’ और वर्षो के इंतजार और तमाम संघर्षो के बाद आये वन अधिकार कानून से उन्हे उनकी यह उम्मीद पूरी होने का भरोसा था उनका यह सपना तमाम अवरोधों के बाबजूद चली लम्बी प्रक्रिया के बाद पूरा हो गया, किन्तु अन्य वन निवासियों की तरह उन्हे भी जमीन का यह हक पाने के लिए कई तरह की व्यवहारिक और कानूनी अड़चनों का सामना करना पड़ा। साथ ही सतत रूप से लम्बा और थका देने वाला संघर्ष भी करना पड़ा।
वास्तविक रूप से देष में करोड़ो आदिवासी एवं गैर आदिवासी परिवार सदियों से अपनी संस्कृति और जीवनषैली के साथ जंगलों में गुजर-बसर कर रहे है ,किन्तु अब तक उन्हे लगातार जंगल से बेदखली, अत्याचार और आजीविका के संकट का सामना करना पड़ा। जबकि परम्परा से ही जंगल और आदिवासियों के रिष्ते बहुत प्रगाढ़ और जीवंतता के रहे है, और अब वन अधिकार कानून लागू होने से उन्हेे उनका पारम्परिक अधिकार मिल गया है। किन्तु पूरे 8 वर्ष गुजर जाने के बाद भी कानून का क्रियान्वयन आज भी एक चुनौती की तरह बना हुआ है। जिससे जंगल वासियों को अपना पारम्परिक अधिकार पाने के लिए अपने जंगल वासी होने के सबूत देने सहित तमाम तरह की अन्य बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है। ऐतिहासिक अन्याय से मुक्ति के लिए बनाये गये वन अधिकार कानून का क्रियान्वयन आज भी कई सवाल खडे़ कर रहा है। डेढ़ सौ साल के लम्बे अन्तराल के बाद सरकार ने स्वीकार किया, कि आदिवासियों एवं अन्य वन निवासियों पर ऐतिहासिक अन्याय हुआ है। वर्षांे से चले आ रहे इसी अन्याय को खत्म करने के लिए यह कानून अस्तित्व मे आया। जिसके चलते आदिवासीयों एवं अन्य वन निवासियों को वन एवं वनभूमि पर अधिकार दिये जाने की प्रक्रिया षुरू हो गई है। जिससे जंगल वासियों द्वारा किये जा रहे संघर्ष मे एक नया मोड़ आया है और ऐसे ही एक संघर्ष के परिणाम स्वरूप पीढियों से जंगल की जमीन पर खेती कर रहे जीरोठ फलिया के 113 परिवारों ने समान रूप से दो हेक्टैयर जमीन का यह अधिकार प्राप्त किया है। नर्मदा बचाओ आन्दोलन के बैनर तले एकजुट हुए ओंकारेष्वर बांध से प्रभावित जीरोठ वासियों को आन्दोलन की पहल एवं तराषी संस्था की मदद से जमीन का यह हक पाने मे सफलता मिली है । जिसके परिणाम स्वरूप उन्हे जमीन का नगद मुआवजा दिया गया है।
मध्य प्रदेष के पष्चिमी भाग मे स्थित पूर्वी निमाड़ के नाम से पहचाने जाने वाले खण्डवा जिले की पहचान नर्मदा नदी के सुन्दर तट ,पुरातात्विक धरोहर के अलावा नर्मदा नदी पर बन रहे बांधों के कारण पूरे विष्व मे हो गई है, जिले की तहसील पुनासा के सक्तापुर पंचायत के निर्भर गांव केलवा बुजुर्ग के जिरोठ फलिया के निवासियों ने अपने संघर्ष के बूते जंगल की जमीन पर यह हक पाने मे सफलता हासिल की है । इसके पीछे उनका पीढि़यांे से चला आ रहा संघर्ष उन्हे सफलता अर्जित करने के लिए प्रोत्साहित करता रहा। नर्मदा नदी पर बन रहे ओंकारेष्वर बांध के कारण डूब मे आ रहे 30 गांव मे से एक गांव केलवा बुजुर्ग भी है, गांव का जीरोठ फलिया भी डूब प्रभावित क्षेत्र के रूप मे घोषित किया गया। दरअसल भील आदिवासियों के इस फलिया के रहवासी पिछले 40 सालों से कक्ष क्रमांक 268 मे जंगल की जमीन पर अतिक्रमण कर खेती कर रहे है ,किन्तु इन रहवासियों के पास उपरोक्त जमीन का मालिकाना हक न होने के कारण डूब प्रभावितों के तौर पर मिलने वाले बाजिब हक से वंचित होना पड़ता। जबकि फलिया के रहवासी पिछले चालीस वर्षांे से जंगल की जमीन पर खेती कर अपना जीवकोपार्जन कर रहे है। किन्तु बेदखली की प्रक्रिया षुरू होने के पूर्व 1 जनवरी 2008 मे आये ‘‘अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 एवं नियम 2008 नामक कानून के चलते उन्हंे उपरोक्त जमीन का हक मिल गया। जमीन का यह हक पाने के लिए उन्हे सबसे पहले साक्ष्य के साथ दावेदारी की प्रक्रिया षुरू करना पड़ी, सबसे पहले उन्हे कानून के बारे मे विस्तार से जानकारी दी गई तत्पष्चात फार्म भरने के पूर्व वंषवृक्ष के माध्यम से गांव वासियो द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी जानकारी ली गई। फिर षुरू हुआ दावे फार्म भरने का सिलसिला जो कई सत्रों में पूरा हुआ। विभिन्न चरणो मे हुए काम के आधार पर लगभग 4 वर्ष के अन्तराल के बाद वह इस जमीन के हकदार हो गये। दरअसल बेदखली की प्रक्रिया के दौरान आया यह कानून उनके लिए मील का पत्थर साबित हुआ। और अप्रैल 2008 से उन्होने दावे करने की व्यवस्थित प्रक्रिया षुरू की, यह प्रक्रिया दावा फार्म भरने से लेकर ग्राम वन अधिकार समिति को दावे जमा करने, ग्राम सभा की कार्रवाही करने एवं ब्लाक से लेकर जिला स्तर तक चली। उपरोक्त प्रक्रिया के दौरान साक्ष्य जुटाने से लेकर विभिन्न समितियों द्वारा जानकारी लेने के लिए सूचना के अधिकार कानून का सबसे ज्यादा उपयोग किया गया।
दावे के लिए दावेदारों द्वारा कानून मे मांगे गये सम्पूर्ण साक्ष्य पर्याप्त होने एवं ग्रामसभा, ग्राम वन अधिकार समिति एवं ब्लाक समिति द्वारा मान्य किये जाने के बाबजूद इन्हे जिला समिति द्वारा पूर्व मे अमान्य कर दिया गया था, जबकि कानून होने के बाबजूद दावेदारों को दावे निरस्त करने के कारणांे के बारे मे जानकारी नही दी गई और न ही कोई अपील करने का मौका दिया गया। जिला स्तर समिति द्वारा दावे अमान्य किये जाने के बाद दावेदारों को अपना हक पाने के लिए अन्ततः हाईकोर्ट जबलपुर की षरण लेना पड़ी। आन्दोलन की मदद से 6 दावेदारों ने मिलकर हाई कोर्ट मे जनहित याचिका दायर की। जिसके निर्णय मे हाईकोर्ट ने 11 अक्टूबर 2010 को जिला समिति को ग्रामसभा एवं उपखण्ड समिति की अनुषंसा के अनुरूप पुनः विचार करने के आदेष दिये और कहा कि जब तक आदिवासियों की पुनव्र्यवस्थापन कार्रवाही पूर्ण नही हो जाती तब तक निष्कासन कानून के विरूद्ध है। जिला समिति को वन अधिकार कानून के तहत पुनः जांच करने एवं जांच के परिणाम आने तक न हटाये जाने की बात कही। यह प्रक्रिया चार माह के अन्दर पूरा करने की बात कही गई। इस निर्णय के आधार पर जिला समिति ने पुनः प्रक्रिया चलाकर इन दावों को मान्य कर 113 परिवारों को 5-5 एकड़ जमीन के अधिकार पत्र (पटटे) का वितरण कर दिया। सरकार ने जीरोठ वासी 113 परिवारों मे प्रति परिवार को 11,32,450 रूपये मुआवजा वितरित किया है। इस तरह तीन साल चली लम्बी प्रक्रिया के बाद कुल 12 करोड़ 79 लाख रूपये का मुआवजा प्रदान किया गया है।
कानून के मुताबिक सम्पूर्ण साक्ष्य होने एवं वाजिब हकदार होने के बाबजूद भी इन दावेदारों को अपना हक पाने के लिए लम्बा इंतजार करना पड़ा । जबकि सभी दावेदारों के दस्तावेज में वास्तविक हकदार होने के कई प्रमाण मिले जिनमे मतदाता परिचय पत्र ,राषन कार्ड जैसे जरूरी दस्तावेजों के अलावा वन विभाग द्वारा विभिन्न वर्षो मे काटी गई जुर्माना रसीदें प्रमुख थी ,जबकि वास्तव मंे वह उस अवधि के पहले से ही खेती कर रहे थे । जिसके बारे मे गांव के बुजुर्ग आज भी कई कहानियां सुनाते है। गांव के इतिहास से रूबरू कराते जीरोठ के निवासी डेवा बताते है ,कि उनके पिता सुरसिंह एवं गांव के दूसरे बुजुर्ग भावसिंह ने मिलकर अजनार नदी के किनारे यह गांव बसाया। कई सालों पूर्व खरगौन जिले से मजदूरी के सिलसिले मंे आये हमारे पूर्वज यहीं बस गये और यहां जमीन खेती करना षुरू किया। धीरे-धीरे हमारे परिवार बढ़ते गये और जमीन का रकबा भी जरूरत के हिसाब से बढ़ता गया। जब से हमने यहां जमीन जोतना षुरू किया उस समय से ही लगातार हमे कई तरह की परेषानियों का सामना करना पड़ा। हमारे साथ लगातार कई तरह के अत्याचार हुए कई बार गंभीर आरोप लगाकर हमे जेल की सजा सुनाई गई तो एक बार सजा के रूप मे जिला बदर की कार्रवाही भी हुई, किन्तु लगातार संघर्ष का सामना करते हुए हम एक जुटता के साथ यहां डटे रहे। और आज नर्मदा बचाओं आन्दोलन के बेनर तले हुए संघर्ष के परिणामस्वरूप पूरे 113 परिवारों ने अपना हक प्राप्त किया। वर्षो के इंतेज़ार के बाद मिली जीत कीे खुषी मनाते जीरोठ वासियों को उम्मीद है, कि इस अधिकार के आधार पर अब बाकी के हक भी उन्हे अवष्य ही मिल जायेगें । जीरोठ फलिया का यह उदाहरण अनेकानेक प्रकरणों मंे राज्य ही नही बल्कि देष के स्तर पर मार्गदर्षक बनेगा और जंगल वासियों को एतिहासिक अन्याय से मुक्ति दिलाने के लिए अवष्य ही सहायक और कारगर सिद्ध होगा।
नीति दीवान
(चरखा फीचर्स)

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