नयी दिल्ली 19 नवम्बर, उच्चतम न्यायालय ने न्यायाधीशों की नियुक्तियों से संबंधित दो दशक पुरानी कॉलेजियम व्यवस्था में सुधार काे लेकर हुई सुनवाई पर फैसला सुरक्षित रख लिया। न्यायमूर्ति जे एस केहर की अध्यक्षता वाली पांच-सदस्यीय संविधान पीठ ने विभिन्न पक्षों की व्यापक दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया। इससे पहले केंद्र सरकार ने कॉलेजियम व्यवस्था में सुधार के मुद्दे पर आए सभी सुझावों पर विचार करके मेमोरेंडम ऑफ प्रोसिजर (एमओपी) मसौदा तैयार करने से इन्कार कर दिया। न्यायालय ने केंद्र के पाले में गेंद डालते हुए दो दशक से अधिक पुरानी कॉलेजियम व्यवस्था में सुधार के मुद्दे पर सभी सुझावों पर विचार करने के बाद उसे एमओपी का मसौदा तैयार करने का जिम्मा सौंपा था। केंद्र सरकार ने न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर सरकार द्वारा नया अथवा संशोधित कानून लाने की संभावनाओं से इन्कार नहीं किया।
एटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने संविधान पीठ से कहा कि नियुक्ति प्रणाली में सुधार के लिए कॉलेजियम को देश भर से आये सुझावों पर खुद अंतिम निर्णय करना चाहिए। उन्होंने दलील दी कि कॉलेजियम प्रणाली के तहत शीर्ष अदालत के मुख्य न्यायाधीश एवं चार वरिष्ठतम सदस्य मिल-बैठकर निर्णय लेते हैं। यह व्यवस्था 1998 में केंद्र सरकार और तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के राय मशविरे के बाद शुरू हुई थी और उसके बाद के सभी मुख्य न्यायाधीशों ने इस पर अमल किया। हालांकि याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं - पूर्व सॉलिसिटर जनरल गोपाल सुब्रह्मण्यम और संविधान विशेषज्ञ राजीव धवन- ने कॉलेजियम व्यवस्था में कार्यपालिका के किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप का विरोध किया। गौरतलब है कि संविधान पीठ ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) कानून और तत्संबंधी 99वें संविधान संशोधन कानून को गैर-संवैधानिक करार देते हुए निरस्त कर दिया था। हालांकि शीर्ष अदालत ने कॉलेजियम व्यवस्था में सुधार के लिए सभी पक्षों से सुझाव मांगे थे।

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