नयी दिल्ली, 25 दिसंबर, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) ने देश में वामपंथी आंदोलन के 90 वर्ष पूरे होने के मौके पर साम्प्रदायिकता जातिवाद तथा कारपोरेट समर्थक आर्थिक नीतियों की चुनौतियों का सामना करने के लिए सभी वामदलाें को एकजुट होने का आह्वान किया है1 पार्टी के महासचिव सुधारकर रेड्डी ने अपने एक लेख में 1925 से लेकर अब तक वाम आंदोलन के सफर का लेखा जोखा पेश करते हुए यह आह्वान किया है। गौरतलब है कि 26 दिसंबर 1925 को ही भारत की कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना हुई थी। श्री रेड्डी ने वाम आंदोलन को संघर्ष का इतिहास बताते हुए लिखा है कि 1916 में रूसी क्रांति के बाद पंडित जवाहर लाल नेहरू, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, जय प्रकाश नारायण , राममनोहर लोहिया, अच्युत पटवर्द्धन, जैसे कई कांग्रेसी नेता समाजवादी विचारों से प्रभािवत हुए थे और भगत सिंह और उनके सहयोगी अजय घोष तथा विजय कुमार सिन्हा जैसे क्रांतिकारी भी कम्युनिस्ट बन गए थे। कम्युनिस्टों के खिलाफ कानपुर-मेरठ तथा पेशावर षड़यंत्र मुकदमें चलाए गए और वे जेल में रहे। कई कामरेड तो 10 से 26 वर्ष तक जेल में रहे। आजादी के बाद तेलांगना सशत्र संघर्ष में 4,500 कामरेडों ने जान गंवायी। भाकपा ने बंगाल में किसानों के अधिकारों के लिए तेभागा आंदोलन चलाया। कम्युनिस्ट पार्टी आजादी के बाद दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बनी और तीसरी लोकसभा तक वह मुख्य विपक्षी दल रहा। लेकिन वामपंथी आंदोलन के भीतर गंभीर मतभेद होने तथा चीनी हमले के बाद भाकपा पार्टी विभाजित हुई और बाद में वह अपनी पुरानी स्थिति की तरफ लौट नहीं पायी।
श्री रेड्डी ने लिखा है कि 2004 में लोकसभा में 61 वाम सांसद थे, जिन्होंने भाजपा को रोकने के लिए कांग्रेस का साथ दिया लेकिन यूपीए सरकार (प्रथम) से परमाणु समझौते के मुद्दे पर समर्थन वापस ले लिया। हालांकि बाद में संसद में वामदलों की ताकत कम हो गयी। अब भाजपा के सत्ता में आने के बाद से चुनौतियाँ पहले से अधिक बढ़ गयी है। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार काला धन वापस न ला सकी और महंगाई भी काफी बढ़ गयी , जिससे गरीबों का जीना मुहाल हो गया है । मनरेगा, स्वास्थ्य,शिक्षा, आदि में बजट में भी कटौती की गयी , जबकि कारपोरेट टैक्स 30 प्रतिशत से घटाकर 25 प्रतिशत कर दिया गया। इसके अलावा साम्प्रदायिक एजेंडे को लागू करने की कोशिशें की गयी और समाज में असहिष्णुता बढ़ती गयी तथा अवैज्ञानिक सोच को बढ़ावा दिया जाने लगा। कामरेड गोविंद पंसारे, नरेन्द्र दाभोलकर तथा एम.एम कलबुर्गी जैसे लोगों की हत्याएं हुई। किसान विरोधी भूमिअधिग्रहण विधेयक लाने की कोशिशें की गयी लेकिन किसानों के विरोध के करण सरकार को वापस लेना पड़ा। श्री रेड्डी ने वाम आंदोलन पर आत्मचिंतन करते हुए कहा है कि इस दौर में वामदलों की न केवल सीटें कम हुई बल्कि उनकी ताकत भी घटी, क्योंकि वामदल जनता से कट गए। लेकिन अब सभी वामदलों को एकजुट होने की जरूरत है तभी वे नयी चुनौतियों को मुकाबला कर सकेंगे।

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