डॉक्टर शापिंग का कंसेप्ट बीसवीं सदी में नशीली दवाओं की प्राप्ति के लिए किये जाने वाले प्रयासों के लिए चलन में आया था। नशीली दवाओं के आदतन लोग एक से दूसरे डॉक्टर के पास परचा लिखवाने इसलिए जाते थे ताकि नशीली दवाओं का संग्रह कर सके। क्योंकि नशीली दवा एक सीमा तक ही मिलती थी और बिना चिकित्सक के परचे के मिलना लगभग मुश्किल होता था। यही कारण है कि देश और विदेश में नित नए डॉक्टर से परचा लिखवाना औैर केमिस्ट से दवा प्राप्त करना आम होता जा रहा था। खासतौर से रोक वाली दवाओं को लेकर के यह प्रक्रिया अपनाई जा रही थी। हांलाकि इस प्रवृति को रोकने के लिए कई देशों में कानूनी प्रयास किये गए और कुछ हद तक इस पर अंकुश भी लग सका। अमेरिका जैसे देश में इसके लिए डॉक्टर शापिंग लॉ जैसी व्यवस्था की गई। खैर अब चिकित्सा सुविधा के विस्तार और सहजता के साथ ही डॉक्टर शापिंग का कंसेप्ट बदलता जा रहा है।
हो यह रहा है कि जब कोई मरीज यह महसूस करता है कि चिकित्सक की दवा से उसकी बीमारी में तेजी से सुधार नहीं हो रहा तो वह ईलाज के बीच ही दूसरे डॉक्टर की शरण में चले जाता है। खासतौर से यह प्रवृति महानगरों और बड़े शहरों में अधिक तेजी से फैल रही है। इसका कारण यह है कि आज सलाहकारों की लंबी फौज होने के साथ ही रोगी या रोगी के परिजन मैजिक टच की सोच रखने लगे हैं। दूसरा यह कि अब चिकित्सा सुविधा का भी तेजी से विस्तार हुआ है। निजी और सरकारी क्षेत्र में चिकित्सा सुविधा की सहज उपलब्धता होने के साथ ही मेडिक्लेम जैसी सुविधाएं प्राप्त होने लगी है। सरकारी और निजी विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता के कारण भी यह होने लगा है। बीमारी चाहे सामान्य हो या गंभीर तत्काल सुधार नहीं दिखने पर दूसरे डॉक्टर को दिखाने चले जाते हैं और डाक्टर बदलने का तत्काल जो प्रभाव पड़ता है वह रीसेट बटन होता है यानी कि दूसरा डॉक्टर फिर अपने तरीके से पहले जॉचों का सिलसिला आरंभ करते हैं क्योंकि पहले की डॉक्टर द्वारा कराई गई जांचों में किसी ना किसी तरह की कमी या अन्य कारण बता कर दुबारा से जांचें करवानी पड़ती है। इसके लिए रक्त जांच से लेकर रोग के अनुसार एक्सरे, एमआरआई या अन्य तरह की जांचें भी हो सकती है। इससे बार बार जांच और एक्सरे किरणों से दो चार होने के साथ ही रुपये पैसे का भार भी पड़ता है। एक तरह से बीमारी के पहचान की नए सिरे से प्रक्रिया आरंभ होती है। दवा का नया सिलसिला आरंभ होता है और पूर्व में चल रही एंटिबायोटिक या अन्य दवाओं के स्थान पर जेनेरिक दवाओं के ही दूसरे ब्राण्ड की दवा दी जाती है व कई बार तो पॉली फार्मेंसी जैसी स्थिति हो जाती है। दवाओं के असर पर विपरीत प्रभाव की संभावनाओं से भी नहीं नकारा जा सकता। ऐसे में सुधार के स्थान पर जटिलताओं की संभावनाओं से नहीं नकारा जा सकता।
डॉक्टर शापिंग के इस दौर में अन्य चिकित्सक की विशेषज्ञ सलाह लेने और चिकित्सक बदलने में हमें अंतर करना होगा। अन्य विशेषज्ञ की सलाह को तो ईलाज कर रहे चिकित्सक को विश्वास में लेकर लेने से ईलाज में और अधिक सकारात्मकता आती है पर बार बार चिकित्सक बदलना उचित नहीं माना जा सकता। होना यह चाहिए कि जिस चिकित्सक का ईलाज चल रहा है उससे ईलाज के संबंध में स्वयं रोगी या परिजनों द्वारा बीमारी और उसके ईलाज को लेकर विस्तार से चर्चा की जानी चाहिए। यह भी मालूम कर लेना चाहिए कि दवा का असर किस तरह का और कितने समय में दवा असर दिखाना शुरु कर देगी। चिकित्सक को भी मरीज को विश्वास में लेकर आवश्यक सभी जानकारी दे देनी चाहिए, जिससे ईलाज को लेकर किसी तरह के भ्रम के हालात ना रहे। अन्य चिकित्सक से प्राप्त की गई विशेषज्ञ सलाह को भी ईलाज कर रहे चिकित्सक से साझा कर लेना चाहिए। ईलाज कर रहे चिकित्सक की सलाह या रेफर करने पर ही अन्य चिकित्सक की और रुख करना चाहिए। नए चिकित्सक को भी रोगी का रोग कार्ड से पूरी तरह अवगत होते हुए क्या दवा चल रही है? कब से चल रही है? और रोगी के रोग का इतिहास से अवगत कराना चाहिए। डॉक्टर शापिंग को फैशन के रुप में नहीं लिया जाना चाहिए अन्यथा अनावश्यक जांचों, दवाओं, डाक्टरों की नित नई फीस आदि का नुकसान तो उठाना पड़ता ही है। इसके साथ ही अन्य दुष्परिणामों से नहीं नकारा जा सकता।
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

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