नाटक लोक कलाकार की पीड़ा, उसकी कला के प्रति समर्पण, बदलते समय की विडंबना और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की आवश्यकता को अत्यंत संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत करता है। इसमें मिथिला की लोकभाषा, लोकगीत, विद्यापति संगीत और ग्रामीण जीवन का सजीव चित्रण है. इसके मुख्य किरदार में मिथिलेश कुमार मैथिल थे. "रसप्रिया" केवल एक कलाकार की कहानी नहीं, बल्कि उन सभी लोक कलाकारों की संघर्ष गाथा है जो अपनी सांस्कृतिक परंपरा को जीवित रखने के लिए विपरीत परिस्थितियों में भी निरंतर प्रयासरत रहते हैं। इसके अतिरिक्त सारी रात नाटक की कहानी एक पति-पत्नी के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक रात यात्रा के दौरान भटककर एक सुनसान स्थान पर पहुँच जाते हैं. वहाँ उनकी मुलाकात एक रहस्यमय वृद्ध व्यक्ति से होती है, जो उन्हें अपने आश्रय में रात बिताने का निमंत्रण देता है. रात के दौरान तीनों पात्रों के बीच होने वाले संवाद धीरे-धीरे उनके भीतर छिपे भय, असुरक्षाओं, दांपत्य संबंधों की जटिलताओं, जीवन के खोखलेपन और अस्तित्व संबंधी प्रश्नों को उजागर करते हैं. वृद्ध व्यक्ति केवल एक पात्र नहीं, बल्कि अनुभव, विवेक और आत्मचेतना का प्रतीक बनकर सामने आता है. उसके साथ हुई बातचीत पति-पत्नी को अपने जीवन, संबंधों और मूल्यों पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करती है. सारी रात नाटक के मुख्य पात्र पति के किरदार में राहुल झा, पत्नी के किरदार में रानीजी तथा बूढ़े व्यक्ति के किरदार में अविनाश झा थे. नाटक में गीत - संगीत संजय कुमार मिश्रा तथा राहुल मनीष ने दिया, प्रकाश परिकल्पना विनय कुमार का था. तकनीकी सहायक के रूप में अर्जुन राय, केशव तथा रेमो थे. सूत्रधार के रूप में मिथिलेश कुमार मैथिल थे. कैमरे पर देवेंद्र तथा रामपूजन थे, तथा उद्घोषक के रूप में उपेंद्र पासवान ने मंच का जिम्मा संभाला था. नाटक का रूपांतरण परिकल्पना तथा निर्देशन सुश्री स्तुति कुमारी ने किया.
समापन के अवसर पर बोलते हुए संस्था के अध्यक्ष रवि रंजन कुमार ने कहा कि आज तीन दिवसीय मिथिला लोक उत्सव के सफल समापन के अवसर पर आप सभी के बीच उपस्थित होकर मुझे अत्यंत हर्ष और गर्व का अनुभव हो रहा है। यह उत्सव केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहा, बल्कि हमारी समृद्ध मिथिला संस्कृति, लोक कला, लोकगीत, लोकनृत्य, नाटक और परंपराओं के संरक्षण एवं संवर्धन का एक सशक्त अभियान बनकर उभरा है. पिछले तीन दिनों में हमने मिथिला की सांस्कृतिक विरासत के विविध रंगों को एक ही मंच पर देखा। लोकगीतों की मधुर स्वर लहरियों, लोकनृत्यों की मनमोहक प्रस्तुतियों तथा नाटकों के प्रभावशाली मंचन ने यह सिद्ध कर दिया कि हमारी लोक संस्कृति आज भी जीवंत है और नई पीढ़ी इसे आगे बढ़ाने के लिए उत्साहित है. मैं इस अवसर पर सभी कलाकारों, प्रशिक्षकों, स्वयंसेवकों, आयोजन समिति के सदस्यों तथा उन सभी सहयोगियों का हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ, जिनके अथक प्रयासों से यह आयोजन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। विशेष रूप से उन सभी दर्शकों का धन्यवाद, जिन्होंने अपनी उत्साहपूर्ण उपस्थिति से कलाकारों का मनोबल बढ़ाया और इस उत्सव को जन-जन का उत्सव बनाया. हमारा यह संकल्प है कि मिथिला की लोक कला, लोकभाषा, लोक साहित्य और लोक परंपराओं को आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुँचाया जाए। आधुनिकता के इस दौर में अपनी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। यदि हम अपनी जड़ों से जुड़े रहेंगे, तभी हमारी सांस्कृतिक विरासत सदैव सुरक्षित और समृद्ध बनी रहेगी. संस्था के द्वारा भविष्य में भी ऐसे सांस्कृतिक कार्यक्रमों, कार्यशालाओं, लोक उत्सवों, नाट्य मंचनों तथा प्रशिक्षण शिविरों का आयोजन करता रहेगा, ताकि हमारी लोक कलाओं को नए कलाकार मिलें और हमारी सांस्कृतिक धरोहर को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल सके।

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