- नीतिगत प्रस्तुति पर मिला औपचारिक जवाब, प्रशासनिक संवेदनशीलता पर उठे सवाल
- नागरिकों का आरोप : क्या जनहित सुझाव भी शिकायतों की तरह निस्तारित हो रहे हैं?
मामला पत्रकारों की राष्ट्रीय पहचान व्यवस्था से जुड़े एक सुझाव का था। प्रतिवेदन में देशभर के पत्रकारों की पहचान, सुरक्षा और संस्थागत समन्वय पर विचार का आग्रह किया गया था। उत्तर में वर्तमान मान्यता व्यवस्था का उल्लेख किया गया, जबकि मूल नीतिगत प्रस्ताव पर अलग से कोई टिप्पणी नहीं की गई। इस घटनाक्रम को कई लोग सरकारी पत्राचार में मौजूद उस प्रवृत्ति का उदाहरण मान रहे हैं, जिसमें नागरिक की मूल मंशा और विभागीय प्रतिक्रिया के बीच अंतर दिखाई देता है। प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल शिकायत और जनसुनवाई प्रणालियों में बड़ी संख्या में आवेदन आने के कारण अनेक मामलों में मानक प्रारूप वाले उत्तर भेजे जाते हैं। किंतु जब कोई प्रस्तुति स्पष्ट रूप से नीति-सुझाव की श्रेणी में हो, तब उससे संबंधित विभागीय टिप्पणी भी उसी स्तर की अपेक्षित होती है। अन्यथा नागरिकों में यह धारणा बनती है कि उनकी बात सुनी तो गई, पर समझी नहीं गई।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिक सुझाव केवल शिकायत नहीं होते; वे नीति निर्माण के लिए सामाजिक अनुभव का स्रोत भी होते हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, पत्रकारिता, शहरी विकास और प्रशासन जैसे क्षेत्रों में अनेक सुधार नागरिकों और पेशेवर समुदायों के सुझावों से ही आगे बढ़े हैं। ऐसे में यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि सरकार तक पहुँचे विचारों का विषयानुकूल परीक्षण किया जाए। विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि प्रत्येक मंत्रालय और विभाग में ‘Policy Suggestion’ और ‘Grievance’ के बीच स्पष्ट वर्गीकरण की व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि जनहित से जुड़े सुझाव औपचारिक निस्तारण तक सीमित न रह जाएँ। इससे नागरिक भागीदारी बढ़ेगी और शासन के प्रति विश्वास भी मजबूत होगा। यह मामला किसी एक व्यक्ति से अधिक उस व्यापक प्रश्न को सामने लाता है कि क्या हमारी प्रशासनिक व्यवस्था नागरिकों की बात केवल प्राप्त करती है, या उसे समझकर नीति संवाद में भी बदलती है। यही प्रश्न अब सार्वजनिक चर्चा का विषय बनता जा रहा है। यहां जिक्र करना जरुरी है कि हाल ही में देशभर के पत्रकारों के लिए समान पहचान व्यवस्था की मांग को लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय भेजे गए प्रतिवेदन पर प्रेस सूचना ब्यूरो से प्राप्त उत्तर ने प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं। उनका कहना है कि उनका पत्र नीतिगत सुझाव था, लेकिन जवाब वर्तमान मान्यता नियमों की जानकारी देकर भेज दिया गया। उन्होंने इसे नीति संवाद की बजाय औपचारिक निस्तारण बताया है।

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