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शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

विशेष : हमारी सांस्कृतिक विरासत है हस्तकला

Sanjay-goshwami
7 अगस्त, नेशनल हैंडलूम डे, भारत की स्वदेशी चेतना, आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक गौरव का उत्सव। इसी दिन वर्ष 1905 में कोलकाता के टाउन हॉल से स्वदेशी आंदोलन का शंखनाद हुआ था। भारतीय  सांस्कृतिक विरासत और वृहद जनसंख्या के कारण भारत पूरे विश्व की हस्तनिर्मित उत्पादों की मांग को पूर्ण करने की क्षमता रखता है। बनारस और चंदेरी का बुनकर परंपरागत साड़ी को समसामयिक बनाने के साथ-साथ यदि निर्यात योग्य उत्पाद जैसे कि स्टोल, स्कार्फ, टाई, बेल्ट, बैग इत्यादि बनाता है, तो उसकी कमाई बढ़ सकती है। बुनकर यदि नवीन चलन के अनुरूप, साड़ियों के साथ अतिरिक्त सामान जैसे बेल्ट, स्टोल, पाउच आदि मैच करके लगा दें, तो यह उनकी आमदनी और निर्यात क्षमता दोनों में वृद्धि करेगा। प्रीमियम हथकरघा उत्पाद जैसे पाटन पटोला, बालूचरी, जामदानी, इक्कत और कानी जैसे उत्पादों को उत्कृष्ट उत्पाद के रूप में प्रस्तुत किए जाने की जरूरत है।ख्हैंडलूम वस्त्र हमारी सांस्कृतिक विरासत के अभिन्न अंग रहे हैं। ऋग्वेद, महाभारत और रामायण में भी कताई-बुनाई की कला के विवरण मिलते हैं। मोहनजोदड़ो एवं हड़प्पा में बुने हुए वस्त्र, हड्डी की सुई, तकली और धुरा आदि के अवशेष मिले हैं तो मिस्र के पिरामिड में गुजराती मूल के ब्लॉक प्रिंटेड कपड़े मिले हैं।आज हथकरघा क्षेत्र में 40 लाख से अधिक बुनकर और श्रमिक कार्यरत हैं। वर्ष 2010 की हथकरघा जनगणना रिपोर्ट से पता चलता है कि बुनकरों की संख्या प्रतिवर्ष 7 फीसद की दर से घट रही है। एक बुनकर की औसत आय केवल 34 सौ रुपए प्रतिमाह है जो भारत के अन्य कारीगरों की औसत आय 45 सौ रुपए प्रतिमाह से कहीं कम है। इसी वजह से नई पीढ़ी इस धंधे को अपनाना नहीं चाहती, जिसके चलते भारतीय हथकरघा उद्योग विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गया है। 


भारत हमेशा भाषा, खान-पान, कला, हस्तशिल्प, यह खंड भारतीय मूल के लोगों को उनकी संस्कृति के साथ जोड़ने का प्रयास करता है। हथकरघा उद्योग 40 लाख लोगों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार प्रदान करता है, मगर उन सभी को उच्च स्तरीय उत्पाद के लिए तुरंत प्रशिक्षित नहीं किया जा सकता। अधिकांश को अलग प्रकार की सरकारी सहायता की आवश्यकता होगी। उन्हें सब्सिडी वाले यार्न और क्रेडिट की जरूरत होती है। इस क्षेत्र में 6 फीसद ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध है। अगर इसे प्रभावी रूप से लागू किया जाए, तो बुनकरों को बुनाई, रंगाई, प्रॉसेसिंग और फिनिशिंग हेतु आवश्यक पूंजी उपलब्ध कराई जा सकती है। भारतीय लोगों के महत्‍व को समझती है जो भारत से दूर रहते हुए भी उसे वैश्विक मंच पर चमकाते हैं। यह क्षेत्र देश में उत्पादित कुल कपड़े का लगभग 19% योगदान देता है और भारत के निर्यात आय में भी काफी वृद्धि करता है। इस समय दुनिया के देशों में भारतीय प्रवासियों की संख्या लगभग 2 करोड़ है। हस्तकला ऐसे कलात्मक कार्य को कहते हैं जो उपयोगी होने के साथ-साथ सजाने के काम आता है तथा जिसे मुख्यतरू हाथ से या सरल औजारों की सहायता से ही बनाया जाता है। ऐसी कलाओं का धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व होता है। ज्यादातर देशों की आबादी इतनी नहीं है। इसके साथ-साथ दर्जनों देशों में अपने देश के भारतीय हथकरघा प्रौद्योगिकीविद् विदेशों में काम रहें है व भारत की शान में चार चांद लगा रहे हैं हथकरघा अपने और बहुमुखी सुंदर डिजाइन प्रतिभा में अद्वितीय है, और नवाचारों को प्रोत्साहित करता है सरकार ग्रामीण विकास और कुटीर उद्योग को बढ़ावा देने के लिए कई कार्यक्रम चला रही है। भारत की कुछ शीर्ष कंपनियां भगबती उद्योग,आनंद जूट इंडस्ट्रीज,बूम बाइंग प्राइवेट लिमिटेड,लवसन एक्सपोर्ट्स,अगमो इंटरनेशनल,डी टीआर एक्सपोर्ट्स,इको जूट प्राइवेट लिमिटेड,हरिमन एक्जिम,इंद्रसेन शामलाल,फ्लोरा फैब,माज इंटरनेशनल,जयकिशन दास मॉल जूट उत्पाद (पी) लिमिटेड,बावा पॉलिंस,जो हैंडलूम टेक्नोलॉजिस्ट को नौकारी प्रदान करती हैं हैंडलूम सेक्टर भारत में कपड़ा उद्योग के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है हस्तकरघा उद्योग कृषि क्षेत्र के बाद सर्वाधिक रोजगार उपलब्ध कराने वाला प्रदूषण रहित एक अच्छा उद्योग है। यह उद्योग अपनी परंपरागत कलात्मकता एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सुदृढ़ीकरण में महत्वपूर्ण योगदान प्रदान कर रहा है। 


भारत सरकार के कपड़ा मंत्रालय, द्वारा हस्तकरघा बुनकरों के कौशल को उन्नत करने के लिए भी हर कदम उठा रही है और उन्हें विपणन और अवसंरचनात्मक इनपुट सहायता भी प्रदान कर रही है। हस्तकरघा प्रौद्योगिकी में हस्तकरघा और कपड़ा उद्योग के लिए तकनीकी कर्मियों के कमी को पूरा करने के लिए अच्छा उद्योग है। यह फाइबर, कपड़े संरचना और कपड़ा विश्लेषण, बुनाई सिद्धांत और कपड़े की गणना, रंगाई और छपाई के साथ कपड़ा रसायन विज्ञान, कंप्यूटर एडेड कपड़ा डिजाइनिंग, जूट तकनीकी, रेशम तकनीकी, और विपणन आदि से संबंधित है पिछले कुछ समय से इसने विदेश में बहुत तेजी से ग्रोथ की है और इसमें विदेश में जॉब के भी बेहतर ऑप्शंस हैं। आजादी का अमृत महोत्सव के अवसर पर गुलामी के दौरान ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत की हथकरघा संस्कृति को कैसे नष्ट किया जाता है, इसके बारे में जानना आवश्यक है पुराने हस्तशिल्पों का ह्रास भारत के आर्थिक संक्रमण की सर्वाधिक नाटकीय घटना है। भारत में हस्तशिल्प उद्योग सदियों से फलता-फूलता आ रहा था। सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी के आरंभ में भारत में निर्मित वस्तुएं विश्व प्रसिद्ध थीं। प्राचीनकाल से ही मिश्र वासियों, ईरानियों, चीनियों, यूनानियों, रोमनों, अरबों और यूरोपियनों ने भारत के साथ हस्तशिल्प में बने वस्तुओं के लिए व्यापारिक सम्बन्ध रखे। भारतीय हस्तशिल्प उत्पाद इन देशों में प्रशंसा और ईष्र्या का कारण बना रहा। युगों तक इसके कारण भारत को ‘‘शानदार भारत’’ कहा गया। परन्तु भारत में जैसे-जैसे अंग्रेजों की राजनीतिक सत्ता में बढ़ोत्तरी हुई और जब उन्होंने भारत के आर्थिक जीवन में हस्तक्षेप करने शुरू किए, भारत के हस्तशिल्प उद्योगों का बड़ा ही आकस्मिक एवं सर्वग्राही विध्वंस होने लगा।भारतीय हस्तशिल्प उद्योगों में ह्रास के यद्यपि अनेक कारण रहे, परन्तु इसके कई कारण कतिपय रूप से महत्वपूर्ण हैं। जैसे इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप अंग्रेजों द्वारा भारत पर अपने औद्योगिक अर्थव्यवस्था को लादना, भारत में पुराने देशी दरबारों के संरक्षण का लोप, मशीन उद्योगों की शुरूआत, विदेशी शासन की भारत में स्थापना और उसका राजनीतिक दबाव, बिट्रेन की आर्थिक नीति जिसके तहत उसने भारत को मूल रूप से कृषि प्रधान बनाए रखने की कोशिश की, 1813 ई. का चार्टर एक्ट इत्यादि। 


अर्थशास्त्र का एक आधारभूत सिद्धांत है कि सहज श्रम से या औद्योगिक तकनीकों से वस्तुओं के उत्पादन में अपेक्षाकृत कम खर्च होता है। इस तरह मशीन उद्योगों के द्वारा कम समय में अधिक और सस्ते मालों की बिक्री प्रारंभ हुई, जिससे हस्तशिल्प से निर्मित वस्तुओं की मांग तथा बिक्री में कमी आई।मशीनीकरण से नुकसान:हस्तशिल्प का विनाश अंग्रेजी सत्ता के राजनीतिक दबाव व विदेशी मशीन उद्योगों के सस्ते उत्पादनों के कारण हुआ। इसके परिणामस्वरूप हस्तशिल्प उद्योगों के कारीगरों की जीविका का साधन नष्ट हो गया। यद्यपि 1850 ई. के पश्चात भारत में आधुनिक उद्योगों की स्थापना भी हुई, परन्तु इतनी तेजी से नहीं कि बेरोजगारी और बर्बादी के कगार पर पहुॅंचे कारीगरों और दस्तकारों को पूर्ण रोजगार मिल जाए।भारतीय हस्तशिल्पी अपने द्वारा निर्मित उत्कृष्ट किस्म की वस्तुओं को विदेश भेजते थे तो वहाॅं भी केवल अभिजात और कुलीन वर्ग के लोग ही साधारणतया उसे खरीद पाते थे। इस प्रकार की सीमित मंडी तब और भी सीमित हो गई जब भारतीय वस्तुओं के प्रति विदेश में अवरोधक कानून बनाए जाने लगे। इसका भारतीय दस्तकारी व हस्तशिल्प पर बुरा प्रभाव पड़ा। रोजमर्रा की आवश्यकताओं का उत्पादन भारतीय हस्तशिल्प व दस्तकारी उत्पादन के विकास के लिए आवश्यक था, लेकिन इसे प्राथमिकता नहीं मिली।ब्रिटेन तथा अन्य देशों में मशीन से निर्मित सस्ती वस्तुओं की बाढ़ भारत के ग्रामीण इलाकों में हस्तशिल्प के पतन का मूल कारण था। रेलवे तथा परिवहन के अन्य साधनों के विकास से इस बाढ़ को फैलने में मदद मिली, क्योंकि अब ग्रामीण लोगों की पहुॅंच भी विदेशों में उत्पादित सस्ती वस्तुओं तक होने लगी। कारखानों में विकसित उत्पादन की सस्ती और लाभकारी तकनीक का मुकाबला हस्तशिल्प व दस्तकारी न कर सकी और प्रायः नष्ट हो गई। औद्योगिक क्रांति का दौररू इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप भारतीय हस्तशिल्प व दस्तकारी उद्योगों का जम कर विनाश हुआ। ईस्ट इंडिया कम्पनी ने इंग्लैंड के उत्पादन को भारत में खपाने का प्रयास किया। 1813 ई. के कम्पनी चार्टर एक्ट के द्वारा जब भारत में कम्पनी के व्यापारिक एकाधिकार को लगभग समाप्त कर दिया गया तो भारतीय बाजारों में सस्ते दर की अच्छे किस्म की वस्तुओं की बाढ़ आ गई।इससे भारतीय हस्तशिल्प व दस्तकारी उद्योगों द्वारा बनाई गई वस्तुओं की बिक्री में भारी कमी आई। पूॅंजी की कमी, तकनीकी ज्ञान के अभाव आदि के कारणों से भारत औद्योगिकीकरण का लाभ न उठा सका और आर्थिक रूप से पिछड़ गया। 


ग्रामीण उत्पादन प्रणाली में मशीन का प्रयोग बढ़ने से भी हस्तशिल्प उद्योगों का ह्रास हुआ, मशीनों द्वारा स्वाभाविक रूप से बढ़ती मांग को पूरा किया जाने लगा।देशी रजवाड़े हस्तशिल्प उद्योगों के संरक्षक थे। उनके संरक्षण के समाप्त होने के कारण हस्तशिल्प में उत्पादित वस्तुओं के खरीददार समाप्त हो गए, जिसका दस्तकारी व हस्तशिल्प पर काफी बुरा प्रभाव पड़ा। ईस्ट इंडिया कम्पनी यद्यपि इन उद्योगों को प्रश्रय प्रदान कर सकती थी, परन्तु उसने अपने गृह राज्य के दबाव में आ कर ऐसा काम किया जो भारतीय हस्तशिल्प उद्योग के लिए अहितकर हुए। हस्तशिल्प व दस्तकारी उद्योगों का इसलिए भी विनाश हुआ कि अंग्रेजों की सीमा शुल्क नीति और परिवहन नियमन के तरीके भारत के हित के प्रतिकूल में थे, जिससे भारतीय व्यापारियों को व्यापार करने में अनेक कठिनाईयों का सामना करना पड़ा। उदाहरण स्वरूप लार्ड लिंटन के शासनकाल में भारत में बनी कपास की वस्तुएं जो बाहर के देशों में भेजी जाती थी, उन पर अतिरिक्त शुल्क लगाया गया, जबकि भारत में इंग्लैंड से लाई कई कपास की वस्तुओं पर इस शुल्क को माफ कर दिया गया। इसके परिणामस्वरूप भारतीय वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि हुई, जबकि इंग्लैंड में बनी वस्तुओं के मूल्य में कमी। इससे भारतीय वस्तुओं की मांग पर काफी बुरा प्रभाव पड़ा, जिससे हस्तशिल्प उद्योग भी प्रभावित हुआ। भारतीय हस्तशिल्प और दस्तकारी उद्योगों के ह्रास का एक कारण इनके मंडी या बाजार का सीमित होना भी रहा, चूॅंकि भारत के हस्त शिल्प उद्योग मध्ययुगीन समाज के सीमित अभिजात्य वर्ग की पहुॅंच तक ही सीमित थे।ब्रिटेन की आर्थिक नीति के कारण भी परम्परागत हस्तशिल्प व दस्तकारी उद्योगों का विनाश हुआ। इस नीति के तहत भारत में नये उद्योगों को विकसित होने से रोका गया। क्योंकि भारत में नये उद्योगों के विकास से ब्रिटेन में उत्पादित वस्तुओं की भारत में खपत घट जाती। इसके अलावे एक अन्य कारण से भी ब्रिटेन ने भारत को मूलतः कृषि प्रधान बनाए रखने का प्रयास किया। चूॅंकि इंग्लैंड को अपने उद्योगों को चलाने के लिए भारतीय कच्चे मालों के उत्पाद की जरूरत थी। इस तरह भारत एक औद्योगिक राष्ट्र का कृषि प्रधान औपनिवेशिक उपयोग बन कर रह गया।महात्मा गांधी ने कभी कहा था, ‘‘सिर्फ यह कहना ही काफी नहीं है कि हस्तकरघा एक ऐसा उद्योग है जिसे पुनर्जीवित किये जाने की आवश्यकता है। बल्कि सबसे बड़ी आवश्यकता इस बात पर जोर देने की है कि यह हमारा केंद्रीय उद्योग है और अगर हमें अपनी ग्रामीण संस्कृति को वापस पाते हुए दोबारा स्थापित करना चाहते है तो हमें इस ओर भी ध्यान देना होगा।’’चाहे वह कलाकारी हो, बुनाई या नक्काशी हो या फिर निर्माण और बढ़ईगीरी हो, जिन लोगों ने इन्हें तैयार करने में अपना अधिकतर समय बिताया होता है वही इस काम से मिलने वाली संतुष्टि को बेहतर तरीके से जान सकते हैं। 


हस्तशिल्प, जो अपने आप में खुद काफी वृहद है, सिर्फ दैनिक उपभोग से ही संबंधित नहीं है। पैसे बचाने के लिये अपने घर की मरम्मत खुद ही करने में और अपने घर को एक नया रूप देने का आनंद प्राप्त करने के अनुभव में आज कुछ उद्यमियोंए हस्तशिल्प के क्षेत्र में पूरे जुनून के साथ काम कर रहें हैं। महिला उद्यमियों जूट और कैनवस के बैग, गहने, पेंटिंग्स, की होल्डर, ट्रे इत्यादि की वस्तुएं देखी जा सकती है। लकड़ी, नारियल के खोल, जूट के पुराने टुकड़ों और अन्य अपशिष्ट और बेकार उत्पादों का प्रयोग करके इन्होंने हस्तशिल्प डिजाइन को उच्च स्तर तक पहुंचाने में कामयाबी पाई है लोगों के रोजमर्रा की वस्तुएं प्रदान कर समाज में इस रचनात्मकता कला को आगे बढाने में जुटी है इससे प्लास्टिक से बने सामानों की खपत कम होगी और यह कला प्लास्टिक उत्पादों के विकल्प के रूप में हस्तशिल्प से बने उत्पादों का उपभोग किया जा सकता है। लेकिन कड़ी मेहनत और अद्भुत कला के कारण आज यह कला विदेश में आमदनी के अच्छे अवसर प्रदान कर रही है।






संजय गोस्वामी

दुंदी बाजार, पटना सिटी, पटना बिहार 

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