राष्ट्रीय ध्वज का जो आज रुप देखा जा रहा है उसके बीज राजाराममोहन राय के विदेश यात्रा के दौरान जहाजपोत पर फ्रांस के घ्वज को देख कर आया था। वैसे तो हमारी परंपरा अपना ध्वज की सनातन काल से ही रही है। राजा-महाराजाओं के अपने ध्वज होते थे तो मंदिरों मठों पर भी घ्वजरोहण की सनातन परंपरा रही है। आज तिरंगा झण्डा हमारा राष्ट्रीय प्रतीक है। वैसे इतिहास के झरोखे में देखते हैं तो एक समग्र राष्ट्र के रुप में डेनमार्क में ध्वजारोहण की परंपरा 14 वी शताब्दी से ही देखने को मिलती है। डेनमार्क के राष्ट्रीय ध्वज को डैनब्रोग के नाम से पुकारा जाता रहा है। आज सभी स्वतंत्र देशों के अपने ध्वज है और राष्ट्रीय ध्वज को राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक माना जाता है। आज जब दो राष्ट्रों के बीच कोई समझौता, वार्ता या अन्य स्थिति में दोनो ही राष्ट्रों ध्वज को सम्मान के साथ प्रदर्शित किया जाता है। अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों, वार्ताओं, स्पर्धाओं आदि में भाग लेने वाले सभी देषों के राष्ट्रीय ध्वजों को सम्मानपूर्वक प्रदर्शित किया जाता है।
यह भी एक तथ्य है कि स्वतंत्रता का पहला ध्वजारोहण 14-15 अगस्त की रात दिल्ली के संसद भवन पर फहराया गया। वहीं 15 अगस्त 1947 को इंडिया गेट के पास प्रिंसेज पार्क में ध्वजारोहण हुआ और उसके अगले दिन आधिकारिक रुप से 16 अगस्त 1947 को लालकिले पर पहले प्रधानमंत्री स्व. जवाहर लाल नेहरु द्वारा किया गया। आज 15 अगस्त और 26 जनवरी को लाल किले पर तिरंगा झण्डा रोहण व फहराया जाता है। 15 अगस्त को प्रधानमंत्री द्वारा ध्वजारोहण के साथ ही देश के नाम संबोधन और सेना द्वारा शौर्य प्रदर्शन होता हेै। इसी तरह से 26 जनवरी को झाकिंयां भी प्रदर्शित की जाती रही है। केसरिया, सफेद और हरे रंग का तिरंगे झण्डे में 24 तिलियां का चक्र दर्शाया गया है और यह सब अपना विशिष्ट मायने रखते हैं। केसरिया रंग जहां साहस, त्याग और बलिदान का प्रतीक है तो सफेद रंग सत्य, शांति और पवित्रता का प्रतीक है। इसी तरह से हरा रंग विश्वास, समृद्धि और प्रगति का प्रतीक है। अशोक के सारनाथ के स्तंभ से लिए गए 24 तिलियों के चक्र का भी अपना महत्व है और यह निरतंता, गति, प्रगति और न्याय का माना जाता है। राष्ट्रीय ध्वज हमारी पहचान और देष की अस्मिता का प्रतीक है ऐसे मेें देश भक्ति और राष्ट्रप्रेम का संदेश हमें समूचे देश में फैलाना है। आज कुछ अतिवादियों, अतिउत्साहियों द्वारा देष विरोधी आंदोलन और नारे लगाये जाते हैं या राष्ट्रीय ध्वज के अपमान करने का दुस्साहस किया जाता है तो गहरी पीड़ा होती है। देश की आजादी के लिए जिन्होंने अपने प्राण न्यौछावर कर दिये उनके प्रति सम्मान प्रत्येक देशवासी का दायित्व हो जाता है। आज घर घर तिरंगा यात्रा का संदेश दिया जा रहा है। तो हमें इसमें भागीदार भी बनना होगा।
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें