विचार : गहन सोच और मंथन का परिणाम है तिरंगा ध्वज - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शुक्रवार, 14 अगस्त 2026

विचार : गहन सोच और मंथन का परिणाम है तिरंगा ध्वज

Dr-rajendra-sharma
केसरिया, सफेद और हरे रंग के तिरंगे के बीच 24 तिलियों के चक्र के राष्ट्रीय ध्वज की विकास यात्रा भी काफी लंबी व आजके युवाओं के लिए रोचक और प्रेरक भी है। आजादी के बाद से ही आज हम जिस राष्ट्रीय ध्वज को फहरा रहे हैं इसका डिजाइन आंध्रप्रदेश के पिंगली वेंकैया द्वारा किया गया। आरंभ में इस ध्वज के बीच प्रगति के प्रतीक चरखे को भी दर्शाया गया था पर बादमें बाबासाहेब की सलाह पर इसमें सारनाथ के अशोक स्तंभ में 24 तिलियों का चक्र लिया गया। 24 तिलियों का चक्र गति, अनवरत प्रगति और न्याय का प्रतीक माना गया है। 15 अगस्त को समूचा देश घ्वजारोहण के साथ उत्साह पूर्वक स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहा है। ऐसे में आज की पीढ़ी के लिए राष्ट्रीय ध्वज की विकास यात्रा से रुबरु होना जरुरी हो जाता है। दरअसल राष्ट्रीय ध्वज सबसे पहले 7 अगस्त 1906 को कोलकता के पारसी बागान स्क्वायर पर फहराया गया था। यह ध्वज लाल, हरे और पीले रंग का था और उस समय वंदे मातरम् अंकित था। विदेषी धरती पर आजादी से बहुत पहले 1907 में स्वतंत्रता सेनानी मैडम भीकाजी कामा ने घ्वज फहराया। उन्होंने जर्मनी के स्कॉटकार्ड मे भारतीय ध्वज फहराया। एनीबिसेंट और लोकमान्य तिलक ने 1917 में होमरुल आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय ध्वज फहराया पर इस ध्वज में सप्त ऋषि के प्रतीक सात तारें और यूनियन जैक को शामिल किया गया था। माना जाता है कि आंध्रप्रदेश के स्वतंत्रता सेनानी पिंगले वेंकैया पहले लाल हरे झण्डे का प्रारुप बनाया, फिर इसमें सफेद रंग को जोड़ा गया और इसके बीच में चरखा दर्षाया गया। 31 दिसंबर 1929 को रावी नदी के तट पर झण्डा फहराया गया। 1931 आते आते राष्ट्रीय ध्वज में केसरिया, सफेद और हरे रंग का समावेश किया गया और बीच में चरखे को दर्शाया गया। 1943 में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा पोर्ट ब्लेयर में झण्डा फहराया गया। कालांतर में इसमें 24 तिलियों के चक्र को बीच में प्रदर्षित किया गया और आजादी के बाद पहले स्वतंत्रता समारोह से अब तय यही ध्वज राष्ट्रीय ध्वज के रुप में 15 अगस्त को रोहण व 26 जनवरी को फहराया जाता है। 22 जुलाई 1947 को राष्ट्रीय ध्वज के रुप में अपनाये गये ध्वज को स्वीकारा गया और इसके बाद यही राष्ट्रीय ध्वज के रुप में फहराया जाता है। कहने का अर्थ यह है कि 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस आजादी का दिवस है इसलिए 15 अगस्त को केन्द्र में प्रधानमंत्री द्वारा लाल किले पर ध्वजारोहण किया जाता है और राज्यों में मुख्यमंत्रियों द्वारा ध्वजारोहण किया जाता है। इसी तरह से 26 जनवरी को हम गणतंत्र दिवस मनाते हैं और उस दिन केन्द्र सरकार में राष्ट्रपति और राज्यों में राज्यपालों द्वारा ध्वज फहराया जाता है। इसलिए हमें रोहण और फहराने का अंतर समझना होगा।


राष्ट्रीय ध्वज का जो आज रुप देखा जा रहा है उसके बीज राजाराममोहन राय के विदेश यात्रा के दौरान जहाजपोत पर फ्रांस के घ्वज को देख कर आया था। वैसे तो हमारी परंपरा अपना ध्वज की सनातन काल से ही रही है। राजा-महाराजाओं के अपने ध्वज होते थे तो मंदिरों मठों पर भी घ्वजरोहण की सनातन परंपरा रही है। आज तिरंगा झण्डा हमारा राष्ट्रीय प्रतीक है। वैसे इतिहास के झरोखे में देखते हैं तो एक समग्र राष्ट्र के रुप में डेनमार्क में ध्वजारोहण की परंपरा 14 वी शताब्दी से ही देखने को मिलती है। डेनमार्क के राष्ट्रीय ध्वज को डैनब्रोग के नाम से पुकारा जाता रहा है। आज सभी स्वतंत्र देशों के अपने ध्वज है और राष्ट्रीय ध्वज को राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक माना जाता है। आज जब दो राष्ट्रों के बीच कोई समझौता, वार्ता या अन्य स्थिति में दोनो ही राष्ट्रों ध्वज को सम्मान के साथ प्रदर्शित किया जाता है। अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों, वार्ताओं, स्पर्धाओं आदि में भाग लेने वाले सभी देषों के राष्ट्रीय ध्वजों को सम्मानपूर्वक प्रदर्शित किया जाता है।


यह भी एक तथ्य है कि स्वतंत्रता का पहला ध्वजारोहण 14-15 अगस्त की रात दिल्ली के संसद भवन पर फहराया गया। वहीं 15 अगस्त 1947 को इंडिया गेट के पास प्रिंसेज पार्क में ध्वजारोहण हुआ और उसके अगले दिन आधिकारिक रुप से 16 अगस्त 1947 को लालकिले पर पहले प्रधानमंत्री स्व. जवाहर लाल नेहरु द्वारा किया गया। आज 15 अगस्त और 26 जनवरी को लाल किले पर तिरंगा झण्डा रोहण व फहराया जाता है। 15 अगस्त को प्रधानमंत्री द्वारा ध्वजारोहण के साथ ही देश के नाम संबोधन और सेना द्वारा शौर्य प्रदर्शन होता हेै। इसी तरह से 26 जनवरी को झाकिंयां भी प्रदर्शित की जाती रही है। केसरिया, सफेद और हरे रंग का तिरंगे झण्डे में 24 तिलियां का चक्र दर्शाया गया है और यह सब अपना विशिष्ट मायने रखते हैं। केसरिया रंग जहां साहस, त्याग और बलिदान का प्रतीक है तो सफेद रंग सत्य, शांति और पवित्रता का प्रतीक है। इसी तरह से हरा रंग विश्वास, समृद्धि और प्रगति का प्रतीक है। अशोक के सारनाथ के स्तंभ से लिए गए 24 तिलियों के चक्र का भी अपना महत्व है और यह निरतंता, गति, प्रगति और न्याय का माना जाता है। राष्ट्रीय ध्वज हमारी पहचान और देष की अस्मिता का प्रतीक है ऐसे मेें देश भक्ति और राष्ट्रप्रेम का संदेश हमें समूचे देश में फैलाना है। आज कुछ अतिवादियों, अतिउत्साहियों द्वारा देष विरोधी आंदोलन और नारे लगाये जाते हैं या राष्ट्रीय ध्वज के अपमान करने का दुस्साहस किया जाता है तो गहरी पीड़ा होती है। देश की आजादी के लिए जिन्होंने अपने प्राण न्यौछावर कर दिये उनके प्रति सम्मान प्रत्येक देशवासी का दायित्व हो जाता है। आज घर घर तिरंगा यात्रा का संदेश दिया जा रहा है। तो हमें इसमें भागीदार भी बनना होगा।






डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

स्तंभकार

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