विश्व आर्थिक मंच या यों कहें कि वर्ल्ड इकोनोमिक फोरम की स्थापना 1971 में हुई और 2006 से ड्ब्लूईएफ ने दुनिया के देशों में महिलाओं की भागीदारी को लेकर जेंडर लैंगिक गैप का सालाना सर्वे करना शुरु किया। 145 देशों में कराये गये हालिया सर्वें की रिपोर्ट में भारत की रेंक 131 वीं है। हांलाकि बीस सालों में रेंक में सुधार हुआ है। संस्था द्वारा जेंडर लैंगिक स्थिति का अध्ययन के लिए चार मानक बनाए हुए हैं। इनमेंं शिक्षा, स्वास्थ्य और सरवाइवल, आर्थिक गतिविधियों में महिलाओं भागीदारी और राजनीति सशक्तिकरण चार ऐसे क्षेत्र है जिनके माध्यम से दुनिया के देशों में महिलाओं की वैश्विक स्थिति का अध्ययन किया जाता है। जहां तक भारत की बात है देखा जाएं तो जेंडर लैंगिक गैप की रिपोर्ट के अनुसार शिक्षा और स्वास्थ्य व सरवाइवल के क्षेत्र में भारत में स्थिति बेहतर है। शिक्षा के क्षेत्र में यह 96.6 प्रतिशत और स्वास्थ्य और उत्तरजीवितता में 95.6 प्रतिशत का आंकड़ा है। इसे निश्चित रुप से सकारात्मक माना जाता है। इसका साफ साफ अर्थ यह हो जाता है कि शिक्षा और स्वास्थ्य व सरवाइवल क्षेत्र में लैंगिक गैप में सकारात्मकता है और महिलाओं और पुरुषों के बीच अंतर को लगभग पाट सा दिया है। जहां तक महिलाओं की आर्थिक क्षेत्र में भागीदारी की बात है तो इसमें समग्र रुप से 41.2 प्रतिशत महिलाओं की भागीदारी है। यानी अभी भी लैंगिक गैप का अंतर 50 फीसदी से भी अधिक बना हुआ है। हांलाकि आर्थिक क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी में लगातार सुधार देखा जा रहा है। कुल कामकाजी महिलाओं की हिस्सेदारी 39.9 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 42 फीसदी हो गई है। आर्थिक मोर्चे पर लगभग सभी क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है पर जिस तेजी से बढ़ोतरी होनी चाहिए थी या जिस तरह से लैंगिक गैप कम होना चाहिए था वह अभी नहीं हो पाया है।
तस्वीर का सबसे निराशाजनक पहलू राजनीतिक भागीदारी को लेकर हैं। खासतौर से मंत्रीमण्डल में तो महिलाओं की हिस्सेदारी में बहुत अधिक कमी देखने को मिल रही है। यह सब तो तब है जब सरकार राजनीति में महिला आरक्षण की दिशा में कदम बढ़ाने की पक्षधर है। एक बात जो सबसे महत्वपूर्ण है वह यह कि पिछले कुछ सालों के चुनावों पर नजर ड़ाली जाएं चाहे वे विधानसभाओं के हो या लोकसभा के सभी में मतदान से लेकर सरकार बनवाने में महिलाओं की भागीदारी महत्वपूर्ण रही है। कम से कम आंकड़े तो यही कह रहे हैं। हांलाकि फ्री बीज जैसी लुभावनी योजनाओं में महिलाओं को अपने पक्ष में करने के वादे सभी राजनीतिक दलों के घोषणा पत्रों में देखने को मिल जाएगा।
संतोष की बात यह है कि 145 देशों की समग्र ग्लोबल जेंडर गैप 2026 का जेंडर गैप पेरिटी स्कोर 69.2 प्रतिशत है जबकि भारत की 131 वीं रेंक होने के बावजूद इस रिपोर्ट में भारत का ग्लोबल जेंडर लैंगिक गैप पेरिटी स्कोर 64.5 प्रतिशत रहा है। रिपोर्ट के समग्र अध्ययन से यह साफ हो जाता है कि भारत के सामने सबसे अधिक चुनौती राजनीतिक स्तर पर गैप को कम करना है तो आर्थिक मोर्चे पर भी अभी बहुत कुछ किया जाना जरुरी हो गया है। देश में बेटी बचाओं-बेटी पढ़ाओं जैसे अभियानों के सकारात्मक परिणाम प्राप्त हुए हैं। पंचायतों, निकाओं आदि में महिलाओं के आरक्षण से राजनीति में जो भागीदारी देखी जा रही है वह संभव हो पाई हैं। निर्णय के स्तर पर भी महिलाएं अधिक स्वतंत्र हुई है और चुनाव नतीजे इस बात को पुष्ट भी करते हैं। अब महिलाएं अपने मताधिकार का प्रयोग स्वविवेक से करने लगी है।
ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट में 93 प्रतिशत के स्कोर के साथ आइसलैंड भले ही शीर्ष पर हो पर दुनिया के अधिकांश इस दौड़ में अभी बहुत पीछे हैं। शत-प्रतिशत स्कोर की तो अभी कल्पना करना बेमानी ही होगा। पर सकारात्मक पक्ष यह है कि लैंगिक गैप में अब काफी बदलाव देखने को मिल रहा है। शिक्षा और स्वास्थ्य का क्षेत्र इसका बड़ा उदाहरण है। आर्थिक मोर्चों पर भी महिलाओं की भागीदारी भले ही कम हो पर शीर्ष स्तर पर भी महिलाओं की हिस्सेदारी देखी जा सकती है। इसलिए चुनौती अवश्य है पर हालात सकारात्मकता की और संकेत कर रहे हैं।
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

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