साक्षात्कार : वंदे भारत के बाद माल ढुलाई की रफ्तार भी बढ़ाएगा ICF - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शनिवार, 19 सितंबर 2026

साक्षात्कार : वंदे भारत के बाद माल ढुलाई की रफ्तार भी बढ़ाएगा ICF

भारतीय रेल की रफ्तार अब सिर्फ यात्रियों तक सीमित नहीं रहने वाली। चेन्नई की इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (ICF) वंदे भारत प्लेटफॉर्म को माल और पार्सल परिवहन में भी इस्तेमाल करने की तैयारी कर रही है। ICF के चीफ वर्कशॉप इंजीनियर अनुपम चौहान ने ‘सीनियर रिपोर्टर सुरेश गांधी’ से खास बातचीत में बताया कि हल्के पार्सल और कमर्शियल सामान को तेजी से एक शहर से दूसरे शहर पहुंचाने के लिए हाई-स्पीड गुड्स ट्रेन का ट्रायल किया जा रहा है। इसका लक्ष्य सामान्य मालगाड़ियों की तुलना में कहीं तेज परिवहन है। ट्रायल में करीब 130-140 किमी प्रति घंटे की गति हासिल करने का प्रयास है। परीक्षण पूरा होने के बाद रेलवे मांग और बाजार की जरूरत के अनुसार इसके रूट और संचालन का फैसला करेगा। ई-कॉमर्स और लॉजिस्टिक्स कंपनियों के लिए यह नई व्यवस्था उपयोगी हो सकती है। अनुपम चौहान के मुताबिक ICF अब तक वंदे भारत चेयर कार के 97 रेक रेलवे को भेज चुका है। अगला बड़ा लक्ष्य वंदे भारत स्लीपर है। इस साल चार स्लीपर रेक और अगले साल करीब 17 रेक तैयार करने की योजना है। देश में चरणबद्ध तरीके से 260 वंदे भारत स्लीपर रेक बनाने की योजना भी है। ICF ने 2024-25 में 3,007 कोच बनाए। नवंबर 2025 तक 1,659 LHB कोच भी तैयार किए जा चुके थे। वहीं मुंबई उपनगरीय रेल के लिए 238 एसी ईएमयू रेक की योजना में ICF को 120 रेक बनाने हैं। प्रस्तुत है सीनियर रिपोर्टर सुरेश गांधी के साथ अनुपम चौहान से बातचीत के प्रमुख अंश, जिसमे दावा है कि भविष्य की रेल केवल तेज नहीं होगी, बल्कि यात्री सुविधा, सुरक्षा, ऊर्जा दक्षता और जरूरत के मुताबिक तेज माल-पार्सल परिवहन को भी साथ लेकर चलेगी


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जी हाँ भारतीय रेल तेजी से बदल रही है। वंदे भारत ने जहां यात्रियों के सफर में रफ्तार और समय की नई परिभाषा गढ़ी है, वहीं अब वंदे भारत स्लीपर, हाई-स्पीड पार्सल ट्रेन और आधुनिक उपनगरीय ट्रेनों के जरिए अगले चरण की तैयारी शुरू हो गई है। चेन्नई स्थित इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (ICF) इस बदलाव के केंद्र में है। पीआईबी वाराणसी की ओर से आयोजित मीडिया टूर के दौरान ICF के चीफ वर्कशॉप इंजीनियर अनुपम चौहान से वरिष्ठ पत्रकार सुरेश गांधी ने वंदे भारत की तकनीक, राजधानी से उसके अंतर, स्लीपर ट्रेनसेट, जम्मू-कश्मीर के लिए संभावित विशेषताओं, कवच, हाई-स्पीड गुड्स ट्रेन, उत्पादन क्षमता और भविष्य की रेल को लेकर विस्तार से बातचीत की।


सुरेश गांधी : ICF में फिलहाल किस तरह के कोच और ट्रेनसेट तैयार किए जा रहे हैं?

अनुपम चौहान : हमारे यहां विभिन्न प्रकार के कोच तैयार किए जाते हैं। LHB टाइप के कोच बनते हैं और वंदे भारत ट्रेनसेट भी तैयार किए जा रहे हैं। अमृत भारत और मेट्रो के लिए भी कोच निर्माण हो रहा है। हमारी कोशिश है कि भारतीय रेलवे की जरूरत के अनुसार आधुनिक, सुरक्षित और यात्री सुविधाओं से युक्त कोच तैयार किए जाएं।


सुरेश गांधी : वंदे भारत के निर्माण को लेकर ICF की अब तक की उपलब्धि क्या है?

अनुपम चौहान : वंदे भारत चेयर कार के 97 रेक हम भेज चुके हैं। ये भारतीय रेलवे के विभिन्न हिस्सों में चल रहे हैं। वंदे भारत के निर्माण के साथ-साथ हम इसके अगले चरण की तैयारी भी कर रहे हैं। अब हमारा फोकस वंदे भारत स्लीपर की ओर है।


सुरेश गांधी : यानी अब ICF में वंदे भारत स्लीपर का उत्पादन शुरू होने जा रहा है?

अनुपम चौहान : हां। स्लीपर का उत्पादन शुरू करने की तैयारी है। इस साल हमारी योजना में चार चेयर कार और चार स्लीपर रेक हैं। उत्पादन प्रक्रिया के कारण वर्ष के अंत तक इसमें कुछ बदलाव हो सकता है। अगले साल यानी 2027 में करीब 17 वंदे भारत स्लीपर रेक निकालने की योजना है। देश में बड़े स्तर पर वंदे भारत स्लीपर के उत्पादन की योजना है। रेलवे की ओर से कुल 260 वंदे भारत स्लीपर रेक की योजना बताई गई है। इसका उत्पादन चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ेगा।


सुरेश गांधी : क्या वंदे भारत स्लीपर राजधानी एक्सप्रेस की जगह लेगी?

अनुपम चौहान : वंदे भारत स्लीपर लंबी दूरी की आधुनिक यात्रा के लिए तैयार की जा रही है। लेकिन भारतीय रेलवे में यात्रियों की जरूरत अलग-अलग होती है। इसलिए सिर्फ एक ही तरह की ट्रेन से पूरी जरूरत पूरी नहीं होगी। राजधानी जैसी प्रीमियम लंबी दूरी की सेवाओं के लिए वंदे भारत स्लीपर एक महत्वपूर्ण विकल्प बन सकती है। रेलवे बोर्ड की ओर से जिस तरह के निर्देश और रूट तय होंगे, उसी के अनुसार रेक का इस्तेमाल किया जाएगा। अभी ICF को सभी रूटों के लिए अंतिम और विशिष्ट निर्देश प्राप्त नहीं हुए हैं।


सुरेश गांधी : शताब्दी और वंदे भारत चेयर कार में क्या अंतर है?

अनुपम चौहान : सबसे बड़ा अंतर ट्रेनसेट की तकनीक में है। वंदे भारत एक ट्रेनसेट है। इसमें पावरिंग की व्यवस्था पूरे ट्रेनसेट में वितरित होती है। इससे ट्रेन को तेजी से गति पकड़ने और प्रभावी ढंग से ब्रेक लगाने में मदद मिलती है। यात्री के लिए इसका सीधा लाभ समय की बचत के रूप में सामने आता है।


सुरेश गांधी : राजधानी और वंदे भारत की तकनीक में सबसे बड़ा अंतर क्या है?

अनुपम चौहान : पारंपरिक राजधानी जैसी ट्रेन में सामान्य तौर पर एक लोकोमोटिव पूरी ट्रेन को खींचता है। यानी आगे इंजन और उसके पीछे कोच होते हैं। वंदे भारत में ऐसा नहीं है। इसमें डिस्ट्रीब्यूटेड पावर यानी ट्रेन के अलग-अलग हिस्सों में पावरिंग होती है। करीब 50 प्रतिशत कोच पावरिंग में योगदान करते हैं। ओवरहेड इलेक्ट्रिक सिस्टम से बिजली लेकर उसे आवश्यकतानुसार परिवर्तित किया जाता है और मोटर पहियों को चलाती है। इससे एक्सेलरेशन और ब्रेकिंग दोनों अधिक प्रभावी हो सकते हैं।


सुरेश गांधी : क्या यही वजह है कि वंदे भारत कम समय में ज्यादा दूरी तय कर पाती है?

अनुपम चौहान : ट्रेन की गति केवल एक चीज पर निर्भर नहीं करती। ट्रैक, सिग्नलिंग, परिचालन व्यवस्था और अन्य कई चीजें महत्वपूर्ण होती हैं। लेकिन ट्रेनसेट में वितरित पावर होने से तेज त्वरण और प्रभावी ब्रेकिंग का फायदा मिलता है। यात्रियों के लिए समय की बचत महत्वपूर्ण है।


सुरेश गांधी : वंदे भारत के बाद अगली बड़ी चुनौती क्या है?

अनुपम चौहान : इसे चुनौती के रूप में नहीं कहेंगे। वंदे भारत ऑपरेशनल और तकनीकी रूप से अच्छी ट्रेन है। अब हमारा प्रयास है कि इसे और बेहतर बनाया जाए। यात्रियों की अपेक्षाएं लगातार बढ़ रही हैं। इसलिए इंटीरियर, फर्निशिंग, डिजाइन, सुविधा और क्वालिटी में लगातार सुधार की गुंजाइश रहती है। हम इन्हीं पहलुओं पर काम कर रहे हैं।


सुरेश गांधी : वंदे भारत को माल ढुलाई में इस्तेमाल करने की बात भी सामने आई है। यह प्रयोग क्या है?

अनुपम चौहान : हां, इस दिशा में भी काम हो रहा है। एक ट्रायल ऑर्डर मिला था। यह मूल रूप से हाई-स्पीड गुड्स या पार्सल परिवहन की अवधारणा है। इसमें भारी माल ढोने के बजाय हल्के और जल्दी पहुंचाए जाने वाले पार्सल होंगे। आज ई-कॉमर्स और लॉजिस्टिक्स कंपनियों की जरूरत बढ़ रही है। फ्लिपकार्ट, अमेजन जैसी कंपनियों तथा अन्य लॉजिस्टिक्स ऑपरेटरों के लिए ऐसी सेवा उपयोगी हो सकती है।


सुरेश गांधी : इसकी गति कितनी रखी गई है?

अनुपम चौहान : इसका उद्देश्य सामान्य मालगाड़ी की तुलना में बहुत तेज परिवहन करना है। सामान्य गुड्स ट्रेन की औसत गति करीब 25-30 किमी प्रति घंटे के आसपास रहती है, जबकि इस हाई-स्पीड पार्सल अवधारणा में करीब 130-140 किमी प्रति घंटे के स्तर पर चलाने का परीक्षण किया जा रहा है। ट्रायल पूरा होने के बाद रेलवे मंत्रालय/रेलवे बोर्ड तय करेगा कि इसे किस रूट पर और किस बाजार की जरूरत के अनुसार चलाया जाए।


सुरेश गांधी : ट्रायल कब तक पूरा होने की उम्मीद है?

अनुपम चौहान : ट्रायल अंतिम चरण में है। उम्मीद है कि करीब दो महीने के भीतर इसके संचालन को लेकर स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। इसके बाद रेलवे की जरूरत और मांग के अनुसार आगे का निर्णय होगा।


सुरेश गांधी : वंदे भारत स्लीपर में फर्स्ट एसी की क्या व्यवस्था होगी?

अनुपम चौहान : फर्स्ट एसी में दो तरह की व्यवस्था होगी। दो बर्थ वाला कूपे और चार बर्थ वाला कूपे। दो बर्थ वाले कूपे को बंद किया जा सकेगा। परिवार के चार लोग यात्रा कर रहे हैं तो चार बर्थ वाले कूपे का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके अलावा सीटिंग अरेंजमेंट, चार्जिंग और यात्रियों की सुविधा के लिए अन्य आधुनिक व्यवस्थाएं भी होंगी।


सुरेश गांधी : सेकंड एसी और चेयर कार में क्या व्यवस्था होगी?

अनुपम चौहान : सेकंड एसी में सामान्य रूप से चार बर्थ वाली व्यवस्था होगी। चेयर कार में फिलहाल दो प्रमुख श्रेणियां हैं—एग्जीक्यूटिव क्लास और सामान्य चेयर कार। इनमें क्रमशः 2×2 और 3×2 सीटिंग व्यवस्था होती है। डिजाइन, फर्निशिंग और क्वालिटी को लगातार अपग्रेड किया जा रहा है।


सुरेश गांधी : जम्मू-कश्मीर जैसे अत्यधिक ठंड वाले क्षेत्र में वंदे भारत चलाने के लिए क्या विशेष बदलाव जरूरी होंगे?

अनुपम चौहान : अत्यधिक ठंड वाले क्षेत्रों में पानी की पाइपलाइन और जल प्रणाली को जमने से बचाना महत्वपूर्ण है। इसके लिए हीटिंग एलिमेंट और डिफ्रॉस्टिंग जैसी व्यवस्थाओं की जरूरत हो सकती है। वंदे भारत की ऐसी ट्रेनें वहां चलाने के लिए क्षेत्र की विशिष्ट जरूरत के अनुसार डिजाइन में बदलाव किए जा सकते हैं। फिलहाल जम्मू-कश्मीर के लिए ICF को रेलवे बोर्ड की ओर से अंतिम स्पेसिफिकेशन या विशेष रेक को लेकर स्पष्ट निर्देश प्राप्त नहीं हुए हैं। जब निर्देश मिलेंगे, उसी के अनुसार डिजाइन और तकनीकी व्यवस्था की जाएगी।


सुरेश गांधी : ट्रेन की सुरक्षा में कवच की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है?

अनुपम चौहान : कवच एक महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रणाली है। इसका उद्देश्य चालक को आगे की स्थिति की जानकारी देना और जरूरत पड़ने पर ट्रेन को नियंत्रित करने में मदद करना है। यदि आगे कोई बाधा या खतरे की स्थिति है और चालक निर्धारित समय पर प्रतिक्रिया नहीं करता, तो सिस्टम परिस्थितियों के अनुसार स्वचालित ब्रेकिंग की कार्रवाई कर सकता है। ट्रेन और ट्रैक से जुड़ी प्रणालियों के माध्यम से सुरक्षा को और मजबूत किया जा रहा है।


सुरेश गांधी : आने वाले वर्षों में क्या अधिकांश राजधानी और शताब्दी ट्रेनों की जगह वंदे भारत ले सकती है?

अनुपम चौहान : यह रेलवे बोर्ड और मंत्रालय के स्तर पर तय होने वाला विषय है। अभी कोई ऐसा अंतिम निर्देश हमारे पास नहीं है कि सभी राजधानी या शताब्दी को एक निश्चित समयसीमा में वंदे भारत से बदलना है। भारतीय रेल में यात्रा की अलग-अलग जरूरतें हैं। इसलिए वंदे भारत चेयर कार, वंदे भारत स्लीपर और अमृत भारत जैसी अलग-अलग श्रेणियों का विकास जरूरी है।


सुरेश गांधी : फिर अमृत भारत की भूमिका क्या होगी?

अनुपम चौहान : अमृत भारत भी महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म है। इसमें नॉन-एसी के साथ एसी कोच की जरूरत को भी ध्यान में रखा गया है। इसका उद्देश्य अलग यात्री वर्गों और लंबी दूरी की यात्रा की जरूरतों को पूरा करना है। यानी भविष्य की रेल व्यवस्था में अलग-अलग तरह के ट्रेनसेट होंगे और उनकी भूमिका यात्री तथा रूट की जरूरत के अनुसार तय होगी।


सुरेश गांधी : ICF की उत्पादन क्षमता कितनी बढ़ी है?

अनुपम चौहान : ICF लगातार अपनी उत्पादन क्षमता और तकनीकी क्षमता बढ़ा रहा है। हमारा लक्ष्य केवल संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि गुणवत्ता के साथ आधुनिक कोच तैयार करना है। वित्त वर्ष 2024-25 में ICF ने 3,007 कोच बनाए। इससे पहले 2023-24 में 2,829 कोच बनाए गए थे। LHB कोच निर्माण में भी ICF की महत्वपूर्ण भूमिका है।


सुरेश गांधी : क्या ICF सिर्फ वंदे भारत पर फोकस कर रहा है?

अनुपम चौहान : नहीं। ICF में कई प्रकार के कोच और ट्रेनसेट तैयार होते हैं। भारतीय रेल की जरूरत बहुआयामी है। LHB, वंदे भारत, अमृत भारत, मेट्रो और उपनगरीय रेल के लिए अलग-अलग तरह के कोच तैयार किए जा रहे हैं। यही वजह है कि उत्पादन के साथ-साथ डिजाइन और तकनीकी विकास पर भी लगातार काम होता है।


सुरेश गांधी : मुंबई की एसी लोकल के लिए भी ICF की भूमिका है?

अनुपम चौहान : हां। मुंबई उपनगरीय नेटवर्क के लिए एसी ईएमयू रेक भी तैयार किए जा रहे हैं। रेलवे ने कुल 238 एसी ईएमयू रेक की योजना बनाई है, जिसमें ICF की भी महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है। आधुनिक उपनगरीय रेल भी भारतीय रेलवे के भविष्य का अहम हिस्सा है।


सुरेश गांधी : इतनी तेजी से बदलती तकनीक के बीच कर्मचारियों को कैसे तैयार किया जा रहा है?

अनुपम चौहान : तकनीक बदलती है तो कर्मचारियों का प्रशिक्षण भी जरूरी है। रेलवे की ओर से प्रशिक्षण के लिए बजट का प्रावधान रहता है। कर्मचारियों को आवश्यकता के अनुसार प्रशिक्षण दिया जाता है। ICF में तकनीकी विकास, गुणवत्ता, उत्पादन और आधुनिक प्रणालियों के अनुरूप मानव संसाधन को तैयार करना लगातार चलने वाली प्रक्रिया है।


सुरेश गांधी : विदेशी ट्रेनों की तुलना में भारतीय ट्रेन तकनीक अभी कहां खड़ी है?

अनुपम चौहान : पिछले कुछ वर्षों में भारतीय रेलवे ने बहुत महत्वपूर्ण तकनीकी बदलाव किए हैं। वंदे भारत इसका एक बड़ा उदाहरण है। कुछ वर्ष पहले तक हमारे यहां पुरानी तकनीक के प्लेटफॉर्म लंबे समय तक चलते रहे, लेकिन अब डिजाइन, पावरिंग, सुरक्षा, यात्री सुविधा और ट्रेनसेट तकनीक में बदलाव आया है। हाई-स्पीड रेल के क्षेत्र में भी देश में क्षमता विकसित की जा रही है। मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल परियोजना के लिए जापान की तकनीक और भारतीय संस्थानों की अपनी निर्माण क्षमता—दोनों स्तरों पर काम हो रहा है।


सुरेश गांधी : आपकी नजर में भारतीय रेल का अगला बड़ा लक्ष्य क्या है?

अनुपम चौहान : सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यात्रियों की जरूरत के अनुसार बेहतर ट्रेन बनाई जाए। रफ्तार के साथ सुरक्षा, आराम, विश्वसनीयता और ऊर्जा दक्षता जरूरी है। वंदे भारत के बाद स्लीपर ट्रेनसेट, हाई-स्पीड पार्सल, एसी ईएमयू और अलग-अलग श्रेणी की आधुनिक ट्रेनों पर काम हो रहा है। भविष्य में भारतीय रेल को यात्रियों की जरूरत के अनुरूप और अधिक आधुनिक बनाने की दिशा में काम जारी रहेगा।


सुरेश गांधी : एक पत्रकार और यात्री के तौर पर वंदे भारत को देखकर सबसे बड़ा बदलाव क्या महसूस होता है?

अनुपम चौहान : सबसे बड़ा बदलाव समय को लेकर है। आज यात्री समय को बहुत महत्व देता है। वह चाहता है कि कम समय में सुरक्षित और आरामदायक तरीके से अपनी मंजिल तक पहुंचे। इसी सोच को ध्यान में रखते हुए ट्रेन की तकनीक, डिजाइन और यात्री सुविधाओं में लगातार सुधार किया जा रहा है। वंदे भारत इसी बदलाव का एक महत्वपूर्ण चरण है, लेकिन यात्रा यहीं समाप्त नहीं होती। अगला चरण और बेहतर ट्रेन बनाने का है।

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