चेन्नई : जहां अंधेरे में दिखाई देता है ईश्वर का उजाला - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शनिवार, 26 सितंबर 2026

चेन्नई : जहां अंधेरे में दिखाई देता है ईश्वर का उजाला

  • दक्षिण के मंदिरों में गर्भगृह की चकाचौंध से दूर, दीपशिखा में होता है देवदर्शन

Deepshikha-dev-darshan
चेन्नई (सुरेश गांधी) । मंदिर के बाहर रोशनी की जगमगाहट है। ऊंचे गोपुरम पर रंगों की छटा, प्रांगण में श्रद्धालुओं की भीड़ और गलियारों में गूंजते मंत्रोच्चार के बीच जैसे ही कदम गर्भगृह की ओर बढ़ते हैं, रोशनी धीरे-धीरे पीछे छूटने लगती है। बाहर का शोर धीमा होता जाता है और भीतर एक अलग ही संसार खुलता है—शांत, गंभीर और रहस्यमय। यहां बिजली की चकाचौंध नहीं, एक छोटी-सी दीपशिखा है। उसी कांपती लौ में भगवान का विग्रह दिखाई देता है और कुछ क्षण के लिए आंखें नहीं, मन दर्शन करता है। तमिलनाडु और पुडुचेरी की मंदिर यात्राओं में यह अनुभव दक्षिण भारतीय मंदिर परंपरा की एक खास विशेषता से परिचित कराता है। द्रविड़ स्थापत्य में मंदिर के बाहरी हिस्से से गर्भगृह तक पहुंचना जैसे संसार से साधना की ओर जाने की यात्रा है। विशाल गोपुरम से शुरू होने वाला वैभव भीतर जाते-जाते सिमटता है और अंततः गर्भगृह में पहुंचकर प्रकाश भी सीमित हो जाता है। यह अंधेरा किसी अभाव का संकेत नहीं लगता। श्रद्धालुओं के लिए यह ध्यान का वातावरण है। पुडुचेरी में दर्शन के दौरान मिले श्रद्धालुओं ने बताया कि दीपक की लौ में भगवान का दर्शन करने की अनुभूति ही अलग है। एक श्रद्धालु के शब्दों में, “जब चारों तरफ रोशनी नहीं होती और सिर्फ दीपक की लौ में भगवान दिखाई देते हैं तो मन अपने आप शांत हो जाता है। ऐसा लगता है जैसे बाहर की दुनिया कुछ देर के लिए पीछे छूट गई।”


दूसरे श्रद्धालु ने कहा, “यहां भगवान को सिर्फ देखने की बात नहीं है। दीपक की रोशनी में दर्शन करते समय मन भी उनके सामने ठहर जाता है।” यही ठहराव शायद इस परंपरा की सबसे बड़ी खूबसूरती है। आधुनिक समय में जहां मंदिरों के बाहरी परिसर से लेकर बाजार तक विद्युत रोशनी से जगमगाते हैं, वहीं गर्भगृह का सीमित प्रकाश श्रद्धालु को अनायास ही भीतर की ओर मोड़ देता है. दक्षिण भारतीय मंदिरों में दीपक केवल रोशनी का साधन नहीं है। वह पूजा का अभिन्न अंग है। तमिल संस्कृति में कुथुविलक्कु जैसे पारंपरिक दीपों की अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान है। केरल में निलविलक्कु की परंपरा भी इसी व्यापक दक्षिण भारतीय दीप-संस्कृति की एक विशिष्ट क्षेत्रीय अभिव्यक्ति है। गर्भगृह की वास्तुकला भी इस अनुभव को गढ़ती है। मोटी दीवारें, अपेक्षाकृत छोटा आंतरिक कक्ष और सीमित प्रकाश—ये सब मिलकर उस स्थान को मंदिर के सबसे एकाग्र हिस्से में बदल देते हैं। बाहर जहां दृष्टि चारों ओर दौड़ती है, वहीं गर्भगृह में दृष्टि एक बिंदु पर टिक जाती है. फिर आता है वह क्षण, जब पुजारी दीपाराधना करता है। लौ देवविग्रह के सामने घूमती है। कुछ क्षण के लिए मुकुट चमकता है, आभूषण झिलमिलाते हैं, फूलों की माला उभरती है और विग्रह का चेहरा दीपशिखा में जैसे जीवंत हो उठता है। अगले ही पल लौ दूसरी दिशा में घूमती है और आकृति फिर अंधेरे में विलीन होने लगती है।


दर्शन का यह क्षण स्थायी तस्वीर नहीं, बल्कि क्षणभंगुर अनुभूति बन जाता है। शायद यही कारण है कि श्रद्धालु दीपाराधना की प्रतीक्षा करते हैं। दीपक की लौ जितनी छोटी है, उसके भीतर समाया भाव उतना ही बड़ा।दक्षिण भारत के मंदिरों में क्षेत्र, संप्रदाय और मंदिर की अपनी परंपरा के अनुसार प्रकाश व्यवस्था अलग-अलग हो सकती है। हर मंदिर में यह अनिवार्य नहीं कि गर्भगृह में आधुनिक प्रकाश बिल्कुल न हो। लेकिन अनेक प्राचीन मंदिरों में गर्भगृह को अपेक्षाकृत अंधकारमय रखने और दीपक के प्रकाश को प्रमुख बनाने की परंपरा आज भी दर्शन को विशिष्ट अनुभव देती है। चेन्नई से पुडुचेरी और तमिलनाडु के मंदिरों तक इस परंपरा को देखते हुए एक बात बार-बार महसूस होती है—मंदिर केवल स्थापत्य नहीं, अनुभव भी है। गोपुरम आंखों को आकर्षित करता है, विशाल प्रांगण मन को विस्मित करता है, लेकिन गर्भगृह की दीपशिखा मन को ठहराती है। यहां अंधेरा रोशनी का विरोध नहीं, बल्कि रोशनी को अर्थ देने वाली पृष्ठभूमि है। दक्षिण के मंदिर मानो सदियों से यही कह रहे हों—बाहर की दुनिया को देखने के लिए बहुत-सी रोशनियां चाहिए, लेकिन भीतर के ईश्वर को देखने के लिए कभी-कभी एक दीपक ही काफी होता है।


दीपशिखा के पीछे की परंपरा 

प्राचीन मंदिर स्थापत्य में गर्भगृह को मंदिर का सबसे पवित्र और केंद्रित भाग माना गया। सीमित प्रकाश वहां एकाग्रता और अंतरंगता का वातावरण बनाता है।


दीपक का धार्मिक महत्व

हिंदू पूजा परंपरा में दीपक ज्ञान, पवित्रता और अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का प्रतीक माना जाता है। 


दक्षिण भारत की अलग-अलग दीप परंपराएं

तमिल क्षेत्र में कुथुविलक्कु और केरल में निलविलक्कु जैसे पारंपरिक दीप दक्षिण भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।


हर मंदिर में एक जैसी व्यवस्था नहीं

यह समझना जरूरी है कि दक्षिण भारत के सभी मंदिरों में गर्भगृह में बिजली पूरी तरह निषिद्ध या अनुपस्थित नहीं है। मंदिर-दर-मंदिर प्रकाश व्यवस्था और पूजा-पद्धति अलग हो सकती है।


दीपाराधना का खास क्षण

जब पुजारी देवविग्रह के सामने दीप घुमाता है, तो लौ की क्षणिक रोशनी में विग्रह का दर्शन होता है। यही दृश्य श्रद्धालुओं के लिए पूजा-अनुभव का अत्यंत भावपूर्ण हिस्सा बन जाता है।


स्थापत्य से जुड़ा संदेश

बाहर से भीतर की ओर बढ़ते हुए मंदिर का वातावरण अधिक शांत और केंद्रित होता जाता है। गर्भगृह इसी यात्रा का आध्यात्मिक केंद्र माना जाता है। 

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