दुसरे सत्र के कार्यक्रम में विशाल राज के द्वारा लिखित नाटक पमरिया का मंचन किया गया. पमरिया” एक सामाजिक एवं लोक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर आधारित नाटक है, जिसमें समाज के उन लोगों की जिंदगी, संघर्ष और संवेदनाओं को केंद्र में रखा गया है, जिन्हें अक्सर मुख्यधारा से अलग समझा जाता है। पमरिया केवल एक व्यक्ति या समुदाय की कहानी नहीं, बल्कि सामाजिक सोच, परंपरा और मानवीय सम्मान के बीच चल रहे द्वंद्व का प्रतीक है। नाटक में पमरिया के जीवन के माध्यम से गरीबी, उपेक्षा, भेदभाव और सामाजिक असमानता जैसे विषयों को सामने लाया गया है। समाज में उसकी भूमिका को लेकर लोगों की अलग-अलग धारणाएँ हैं। कोई उसे परंपरा का हिस्सा मानता है तो कोई उसे हाशिये पर खड़ा व्यक्ति समझता है। इन परिस्थितियों के बीच पमरिया अपने अस्तित्व, सम्मान और पहचान के लिए संघर्ष करता है। कहानी आगे बढ़ते हुए यह सवाल उठाती है कि किसी व्यक्ति की पहचान उसके जन्म, पेशे या सामाजिक स्थिति से तय होनी चाहिए या उसके मानवीय गुणों से। नाटक लोकभाषा, लोकगीत और स्थानीय संस्कृति के माध्यम से दर्शकों को कहानी से जोड़ता है।
“पमरिया” अंततः समानता, सम्मान और मानवीय संवेदना का संदेश देता है तथा दर्शकों को अपने आसपास मौजूद सामाजिक भेदभाव और पूर्वाग्रहों पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है. नाटक के मुख्य पात्र में मिथिलेश मैथिल मोहना के किरदार में, कजरी के किरदार में दिव्या झा, सूत्रधार डाकिया के किरदार में अविनाश झा, सलीम काका के किरदार में नीरज कुमार पाण्डेय, लोटन के किरदार में राहुल चौधरी, श्रवण के किरदार में बादल कुमार, परमेश्वर के किरदार में विजय कुमार पासवान, परमेश्वर के पत्नी के किरदार में राखी कुमारी, ग्रामीण के किरदार में आलोक कुमार तथा जय कुमार तथा बाबा के किरदार में राहुल झा थे. इसके अतिरिक्त गीत संगीत में संजय कुमार, प्रकाश परिकल्पना में रौशन कुमार, मेकअप तथा वस्त्र विन्यास में अर्जुन राय थे. कैमरामैन के रूप में साहिल तथा मंच का संचालन शारदा झा ने किया. नाटक का रूपांतरण परिकल्पना तथा निर्देशन स्तुति कुमारी ने किया.

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