मधुबनी : मधुबनी नाट्य महोत्सव के तीसरे दिन "पमरिया" का मंचन - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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बुधवार, 23 सितंबर 2026

मधुबनी : मधुबनी नाट्य महोत्सव के तीसरे दिन "पमरिया" का मंचन

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मधुबनी, 23 सितंबर (संवाददाता). आदर्श महिला मंडल लड्डूगामा के द्वारा आयोजित तथा सांस्कृतिक कार्य निदेशालय, कला एवं संस्कृति विभाग, बिहार सरकार के द्वारा प्रायोजित तीन दिवसीय मधुबनी नाट्य महोत्सव के तीसरे और अंतिम दिन सुश्री स्तुति कुमारी के निर्देशन में गीत संगीत तथा विशाल राज के द्वारा लिखित नाटक पमरिया का मंचन शाहपुर में किया गया. कार्यक्रम के पहले सत्र में गीत संगीत के तहत सबसे पहले शिवम् मिश्रा के द्वारा विद्यापति के प्रसिद्ध गीत जय जय भैरवी असुर भयावनी के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया. दुसरे प्रस्तुति के रूप में शिवम् मिश्रा के द्वारा ही घर में पधारो गजानन जि मेरे घर में पधारो की प्रस्तुति दीगई. दिव्यांशी झा के द्वारा देवी वंदना निमिया के डाल मैया झुलेली झुलनिया तथा सिया सुकुमारिमिथिला के दुलारी, पाहून हमर रघुवर धनुर्धारी की प्रस्तुति दी गई. आनंद ठाकुर के द्वारा मैथिलि गजल बाहीं में रहू न रहू आंखिन में रहू के अतिरिक्त एक मिसिया जे मुस्कुरा देलिये की प्रस्तुति दी गई. दिव्या झा के द्वारा भगवती गीत जगदम्बा हे होईयु ना हमारो पर सहाय की प्रस्तुति दी गई. जय कुमार के द्वारा मैथिलि रैप मिथिला के राजा मधुबनी है घर, सबके प्यार छोट चाहे बर की प्रस्तुति दी गई. पुनः प्राची झा के द्वारा ही रे जान बैस गेल विरिक्षीय टार रे जान की प्रस्तुति दी गई. पुनः शिवम् मिश्रा के द्वारा ही सूफी गीत सांसो की माला में मैं, सिमुरु तेरा नाम की प्रस्तुति के साथ शिव भजन हे गौरा तोहरो सजनवा न, तोहरो सजनवा किछुओ ने बुझे से औढर धरनमा न की प्रस्तुति के साथ प्रथम सत्र की समाप्ति की गई. जिसमे वाध्य यंत्र पर उनका साथ दे रहे कलाकार में कीबोर्ड पर हरेराम सिंह, ढोलक पर प्रभात ठाकुर, तबला पर धीरज मिश्रा तथा ओक्टापैड पर राहुल मनीष थे.

       

दुसरे सत्र के कार्यक्रम में विशाल राज के द्वारा लिखित नाटक पमरिया का मंचन किया गया.  पमरिया” एक सामाजिक एवं लोक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर आधारित नाटक है, जिसमें समाज के उन लोगों की जिंदगी, संघर्ष और संवेदनाओं को केंद्र में रखा गया है, जिन्हें अक्सर मुख्यधारा से अलग समझा जाता है। पमरिया केवल एक व्यक्ति या समुदाय की कहानी नहीं, बल्कि सामाजिक सोच, परंपरा और मानवीय सम्मान के बीच चल रहे द्वंद्व का प्रतीक है। नाटक में पमरिया के जीवन के माध्यम से गरीबी, उपेक्षा, भेदभाव और सामाजिक असमानता जैसे विषयों को सामने लाया गया है। समाज में उसकी भूमिका को लेकर लोगों की अलग-अलग धारणाएँ हैं। कोई उसे परंपरा का हिस्सा मानता है तो कोई उसे हाशिये पर खड़ा व्यक्ति समझता है। इन परिस्थितियों के बीच पमरिया अपने अस्तित्व, सम्मान और पहचान के लिए संघर्ष करता है। कहानी आगे बढ़ते हुए यह सवाल उठाती है कि किसी व्यक्ति की पहचान उसके जन्म, पेशे या सामाजिक स्थिति से तय होनी चाहिए या उसके मानवीय गुणों से। नाटक लोकभाषा, लोकगीत और स्थानीय संस्कृति के माध्यम से दर्शकों को कहानी से जोड़ता है।


“पमरिया” अंततः समानता, सम्मान और मानवीय संवेदना का संदेश देता है तथा दर्शकों को अपने आसपास मौजूद सामाजिक भेदभाव और पूर्वाग्रहों पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है. नाटक के मुख्य पात्र में मिथिलेश मैथिल मोहना के किरदार में, कजरी के किरदार में दिव्या झा, सूत्रधार डाकिया के किरदार में अविनाश झा, सलीम काका के किरदार में नीरज कुमार पाण्डेय, लोटन के किरदार में राहुल चौधरी, श्रवण के किरदार में बादल कुमार, परमेश्वर के किरदार में विजय कुमार पासवान, परमेश्वर के पत्नी के किरदार में राखी कुमारी, ग्रामीण के किरदार में आलोक कुमार तथा जय कुमार तथा बाबा के किरदार में राहुल झा थे. इसके अतिरिक्त गीत संगीत में संजय कुमार, प्रकाश परिकल्पना में रौशन कुमार, मेकअप तथा वस्त्र विन्यास में अर्जुन राय थे. कैमरामैन के रूप में साहिल तथा मंच का संचालन शारदा झा ने किया. नाटक का रूपांतरण परिकल्पना तथा निर्देशन स्तुति कुमारी ने किया.

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