गंगा के उस पार रामनगर में 25 सितंबर से फिर ऐसा रंगमंच सजेगा, जिसकी कोई चारदीवारी नहीं। यहां रामलीला देखने के लिए दर्शक किसी एक जगह नहीं बैठते, बल्कि कथा के साथ चलते हैं। अयोध्या, जनकपुर, चित्रकूट, पंचवटी, अशोक वाटिका और लंका—रामायण के प्रसंगों के साथ करीब 31 लीलास्थल बदलते जाते हैं और पूरा नगर रामकथा का रंगमंच बन जाता है। करीब दो सौ साल पुरानी इस परंपरा की खासियत आज भी वही सादगी है। न माइक, न लाउडस्पीकर और न आधुनिक रोशनी। पेट्रोमैक्स की लौ में मानस की चौपाइयां और पारंपरिक संवाद वातावरण में घुलते हैं। शाम ढलते ही नेमी लीलास्थल की ओर उमड़ने लगते हैं। रामनगर की लीला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, काशी की साझा संस्कृति की भी जीवंत तस्वीर है। आतिशबाजी, पुतले और मेहताबी तैयार करने से लेकर अनेक व्यवस्थाओं में मुस्लिम परिवार पीढ़ियों से भागीदारी निभाते आए हैं। नाविक परिवार भी राम, सीता और भरत से जुड़े प्रसंगों में अपनी सेवा देते हैं। यही वजह है कि रामनगर में रामलीला देखी नहीं जाती—उसे जिया जाता है
दर्शक नहीं, रामकथा के सहयात्री
रामनगर की रामलीला देखने आने वाला व्यक्ति सामान्य अर्थों में दर्शक नहीं रह जाता। वनगमन होता है तो वह अयोध्यावासी बनकर राम के पीछे चल पड़ता है। राम-भरत मिलाप के समय आंखें नम हो जाती हैं। राम बारात निकलती है तो पूरा नगर बाराती हो उठता है। लंका की ओर कथा बढ़ती है तो वही भीड़ रणभूमि की साक्षी बन जाती है। यही कारण है कि काशी से भले ही लोग वर्ष के अधिकांश समय दूर रहें, लेकिन रामलीला का मौसम आते ही उनकी स्मृतियों की धुरी फिर रामनगर से जुड़ जाती है। विदेशों में बसे काशीवासी हों या देश के दूसरे हिस्सों में रहने वाले लोग—रामनगर की लीला की पुकार उन्हें खींच लाती है। बाहर से आने वाले नेमी तो कई दिन पहले ही रामनगर अथवा गंगा किनारे के धर्मशालाओं और होटलों में डेरा जमा लेते हैं। लीला स्थल पर भीड़ से बचने के लिए अनेक लोग चार बजे के आसपास ही पहुंचने लगते हैं। यहां की सादगी ही उसका सौंदर्य है। न चकाचौंध, न आधुनिक मंचीय आडंबर। मानस की चौपाइयां और संवाद बिना लाउडस्पीकर के वातावरण में घुलते हैं और पेट्रोमैक्स की रोशनी में पात्रों के चेहरे कथा के भावों को और गहरा कर देते हैं।
जब काशी ने रामकथा के लिए पूरा नगर रच दिया
रामनगर की रामलीला की शुरुआत को लेकर अनेक लोककथाएं प्रचलित हैं। एक प्रसिद्ध प्रसंग के अनुसार काशी नरेश महाराजा उदित नारायण सिंह एक बार मिर्जापुर के समीप छोटी मिर्जापुर की रामलीला देखने पहुंचे, लेकिन किसी कारण से उनके पहुंचने तक धनुषभंग का प्रसंग समाप्त हो चुका था। उन्हें इसका गहरा क्षोभ हुआ। इसके बाद 1855 ईस्वी में रामनगर में रामलीला आयोजित कराने का निर्णय लिया गया। आगे चलकर महाराजा ईश्वरी नारायण सिंह ने इसे नाटकीय और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध स्वरूप दिया। भारतेंदु हरिश्चंद्र और रीवां के महाराजा रघुराज सिंह के सहयोग से रामलीला के संवादों का पुनर्लेखन कराया गया। कथा के प्रसंगों के अनुरूप रामनगर के अलग-अलग स्थानों को अयोध्या, जनकपुर, चित्रकूट, अशोक वाटिका और लंका जैसे नाम दिए गए। इस तरह रामायण केवल मंच पर प्रस्तुत होने वाली कथा नहीं रही, बल्कि रामनगर की भौगोलिक पहचान का हिस्सा बन गई। आज भी रामलीला की शुरुआत प्रतिदिन शाम करीब पांच बजे शहनाई वादन के साथ होती है। परंपरा के अनुसार काशी नरेश हाथी पर सवार होकर लीला स्थल पहुंचते हैं। शाम लगभग सात बजे से रात दस बजे तक लीला का क्रम चलता है। समय बीतता जाता है, लेकिन वातावरण में ऐसा लगता है जैसे सदियां वहीं ठहर गई हों।
न माइक, न आधुनिक रोशनी—फिर भी हजारों कानों तक पहुंचती रामकथा
आज के दौर में जब छोटी-सी प्रस्तुति भी साउंड सिस्टम, एलईडी स्क्रीन और आधुनिक प्रकाश व्यवस्था के बिना अधूरी मानी जाती है, रामनगर की रामलीला इसके ठीक उलट खड़ी दिखाई देती है। यहां न माइक है, न लाउडस्पीकर। पेट्रोमैक्स की रोशनी में मंचन होता है। रामचरितमानस की चौपाइयां और पारंपरिक संवाद ही लीला की ध्वनि हैं। दर्शकों के बीच ऐसा अनुशासन रहता है कि कथा का प्रत्येक शब्द वातावरण में उतरता चला जाता है। यही सादगी रामनगर की लीला को विशिष्ट बनाती है। आधुनिक तकनीक जहां दृश्य को बड़ा बनाती है, वहीं यहां आस्था दृश्य को बड़ा बना देती है।
पात्र नहीं चुने जाते, परंपरा सौंपी जाती है
रामनगर की रामलीला के प्रमुख पात्रों का चयन भी इसकी परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और सीता की भूमिका के लिए ब्राह्मण परिवारों के करीब 10 से 12 वर्ष आयु के बालकों का चयन पहले ही कर लिया जाता है। अन्य भूमिकाओं के लिए 16 वर्ष से अधिक आयु के युवाओं का चयन किया जाता है। लीला शुरू होने से लगभग दो माह पहले ही चयनित पात्रों को व्यास के निर्देशन में प्रशिक्षण मिलने लगता है। मानस की चौपाइयों को संगीतात्मक ढंग से प्रस्तुत करने वाले कलाकारों को ‘रामायणी’ कहा जाता है, जबकि लीला के संचालक और निर्देशक की भूमिका ‘व्यास’ निभाते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में अभिनय से अधिक महत्व अनुशासन और परंपरा का है। पात्र बदलते हैं, पीढ़ियां बदलती हैं, लेकिन भूमिकाओं की मर्यादा और प्रस्तुति की शैली लगभग वही रहती है।
रामनगर की रामलीला में धर्म के साथ दिखती है गंगा-जमुनी संस्कृति
रामनगर की रामलीला की सबसे खूबसूरत तस्वीर उसके मंच पर ही नहीं, मंच के पीछे भी दिखाई देती है। यह आयोजन सांप्रदायिक सौहार्द की ऐसी मिसाल प्रस्तुत करता है, जहां हिंदू-मुस्लिम परिवार पीढ़ियों से मिलकर रामकथा को आकार देते आए हैं। लीला के दौरान तोपों से सलामी देने की परंपरा रही है। पहले 21 तोपों से सलामी दी जाती थी, अब दो तोपों में बारूद भरा जाता है और एक से ही सलामी दी जाती है। तोपों से जुड़े कार्य करने वाले कर्मचारी काशी राज परिवार से जुड़े स्थायी कर्मचारी रहे हैं और इनमें मुस्लिम परिवारों की भी सहभागिता रही है। आरती के समय आतिशबाजी और मेहताबी जलाने में राज, लालू खां और कादिर जैसे परिवारों की भूमिका रही है। लंका मैदान की रणभूमि में मुस्लिम परिवारों द्वारा शस्त्र प्रदर्शन भी परंपरा का हिस्सा रहा है। रामलीला में रावण दहन, आतिशबाजी और मंच सज्जा के अनेक काम भी मुस्लिम कारीगरों के हाथों होते हैं। यानी रामनगर की रामलीला केवल धार्मिक आस्था की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि उस साझा संस्कृति का जीवंत दस्तावेज भी है जिसमें आस्था की राह पर समुदायों के बीच की दीवारें छोटी पड़ जाती हैं।
लालू खां के हाथों में पीढ़ियों की आतिशबाजी
रामलीला की चमकदार आतिशबाजी और मेहताबी के पीछे भी एक पूरी परंपरा काम करती है। लालू खां बताते हैं कि उनके परिवार में पीढ़ियों से रामलीला में इस्तेमाल होने वाले पुतले, मेहताबी और पटाखे तैयार किए जाते रहे हैं। उनके दादा हाजी अली हुसैन ने परिवार के लोगों को इसका प्रशिक्षण दिया था। रामलीला शुरू होने से करीब एक माह पहले रामबाग परिसर में सराज, जमील, हलीम, सैफुद्दीन समेत करीब 25 लोग पुतले, मेहताबी और पटाखे तैयार करने में जुट जाते हैं। हर शाम आरती के समय लाल और सफेद मेहताबी की रोशनी जब आकाश को चमकाती है, तो रामलीला स्थल जयघोष से गूंज उठता है। देर से पहुंचने वाले श्रद्धालु भी उसी रोशनी में भगवान राम के दर्शन को लीला का पूर्ण अनुभव मानते हैं।
नाविक भी निभाते हैं रामकथा की सेवा
रामनगर की लीला में गंगा केवल पृष्ठभूमि नहीं है। कथा के अनेक प्रसंगों में नदी स्वयं पात्र की तरह उपस्थित होती है। श्रीराम को गंगा-यमुना पार कराने और क्षीरसागर की आरती जैसे प्रसंगों में नाव की आवश्यकता पड़ती है।महलिया टोला निवासी बबलू साहनी करीब 12 वर्षों से रामलीला के लिए नाव की सेवा दे रहे हैं। उनके बड़े भाई सुक्खू और भोपाल साहनी भी इस सेवा में साथ रहते हैं। बबलू बताते हैं कि रामलीला शुरू होने से दो दिन पहले नाव रामबाग पोखरे में लगा दी जाती है। पहले दिन की आरती इसी नाव पर होती है। श्रीराम के वनगमन के समय रामपुर के सगरा पोखरे में प्रतीकात्मक गंगा पर भी नाव की सेवा दी जाती है। भरतजी के आगमन के प्रसंग में भी नाविक परिवार अपनी भूमिका निभाता है। इस तरह रामनगर की रामलीला में कोई भूमिका छोटी नहीं है। अभिनेता से लेकर नाविक, आतिशबाजी बनाने वाले कारीगर से लेकर शहनाई बजाने वाला कलाकार—हर व्यक्ति इस विशाल सांस्कृतिक अनुष्ठान की एक कड़ी है।
धनुष-बाण का अपना इतिहास
रामनगर की रामलीला में धनुष-बाण का विशेष महत्व है। एक परंपरा के अनुसार मेघाभगत को अश्वारोही कुमारों ने धनुष-बाण प्रदान किया था। इसलिए धनुष-बाण की झांकी वाले दिन इसकी विशेष आरती उतारी जाती है और श्रद्धालु इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। इसी तरह हनुमान का मुखौटा भी राम के मुकुट के बाद सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। यह केवल मंचीय वस्तु नहीं, बल्कि परंपरा और श्रद्धा का प्रतीक है।
तीन जुलूस, जिन्हें देखने उमड़ता है रामनगर
रामलीला के दौरान तीन जुलूस विशेष आकर्षण का केंद्र होते हैं—राम बारात, विजयादशमी के दिन राम-लक्ष्मण के साथ महाराज की सवारी और भरत मिलाप। इन अवसरों पर रामनगर का वातावरण बदल जाता है। गलियां श्रद्धालुओं से भर जाती हैं। घरों की छतें और रास्ते दर्शक दीर्घा बन जाते हैं। बच्चे अपने बुजुर्गों के साथ पहुंचते हैं और बुजुर्ग अगली पीढ़ी को बताते चलते हैं कि कौन-सा स्थान किस प्रसंग का प्रतीक है।
चित्रकूट से लंका तक—एक नगर में पूरी रामायण
रामनगर की रामलीला में लीला के प्रसंगों के अनुरूप 31 प्रमुख स्थानों का उपयोग होता है। चित्रकूट, पंचवटी, सुंदर बगिया, किष्किंधा पर्वत, अशोक वाटिका और लंका जैसे स्थान कथा के साथ जीवंत होते हैं। यहां दृश्य बदलने के लिए पर्दा नहीं गिरता। कथा स्वयं आगे बढ़ती है और दर्शक उसके पीछे चलते हैं। यही कारण है कि रामनगर की रामलीला को दुनिया के सबसे बड़े ओपन थिएटर की संज्ञा दी जाती है। यहां रंगमंच किसी भवन में कैद नहीं। वह गलियों में है, पोखरों में है, मैदानों में है, मंदिरों के आसपास है और सबसे बढ़कर लोगों की स्मृति में है।
रामलीला में झांकियां कम, भाव अधिक
रामनगर की रामलीला में आधुनिक मंचीय झांकियों की भरमार नहीं है। फिर भी क्षीरसागर, राम जन्म, विराट दर्शन और राज्याभिषेक की झांकियां विशेष प्रसिद्ध हैं। पुष्पवाटिका, धनुष यज्ञ, अशोक वाटिका और लक्ष्मण शक्ति जैसे प्रसंग दर्शकों को लंबे समय तक बांधे रखते हैं। लीला समाप्त होने के बाद प्रतिदिन ऊंचे मंच पर राम-लक्ष्मण को विराजमान कर आतिशबाजी की रोशनी में आरती की जाती है। उस समय पूरा वातावरण भक्तिभाव से भर उठता है।
एक महीने के लिए बदल जाती है रामनगर की सांस
रामनगर की रामलीला का प्रभाव मंच समाप्त होने के बाद भी बना रहता है। यहां एक माह के लिए जीवन की गति जैसे राममय हो जाती है। दुकानें, गलियां, घाट, पोखरे और मैदान—सब कथा के प्रसंगों से जुड़ जाते हैं। किसी के लिए यह परंपरा है, किसी के लिए आस्था, किसी के लिए संस्कृति और किसी के लिए बचपन की स्मृति। लेकिन नेमी के लिए यह इन सबका संगम है। वह राम को केवल मंच पर नहीं देखता। वह उन्हें अपने साथ चलते हुए महसूस करता है। उसे लगता है कि वह अयोध्या से निकलकर चित्रकूट पहुंचा, पंचवटी में ठहरा, किष्किंधा से होकर लंका तक गया और फिर अयोध्या लौट आया। यही रामनगर की रामलीला का सबसे बड़ा जादू है—यह कथा सुनाती नहीं, कथा में प्रवेश करा देती है।
काशी की सांस्कृतिक आत्मा का जीवित अध्याय
बदलते समय, बदलती तकनीक और बदलती जीवनशैली के बीच भी रामनगर की रामलीला जिस तरह अपनी मूल परंपरा को बचाए हुए है, वह केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, सांस्कृतिक संरक्षण का भी उदाहरण है। यहां लगभग दो सौ वर्ष पुरानी परंपरा आज भी नई पीढ़ी के हाथों आगे बढ़ रही है। वही मानस, वही चौपाइयां, वही पारंपरिक पात्र, वही लीलास्थल, वही जुलूस और वही श्रद्धा—बस देखने वाली आंखें हर पीढ़ी में नई हैं। रामनगर की रामलीला इसलिए अद्भुत नहीं कि यहां रामायण का मंचन होता है। भारत के अनेक नगरों में रामलीलाएं होती हैं। इसकी असाधारणता इस बात में है कि रामनगर ने रामायण के लिए पूरा नगर ही सौंप दिया है। यहां मंच और दर्शक के बीच कोई दूरी नहीं। यहां कलाकार और श्रद्धालु के बीच कोई दीवार नहीं। यहां धर्म केवल पूजा का विषय नहीं, लोकजीवन का हिस्सा है। और यहां राम केवल पात्र नहीं—मर्यादा, संस्कृति और काशी की सामूहिक स्मृति के जीवित प्रतीक हैं। शायद इसीलिए रामनगर की रामलीला हर वर्ष समाप्त होकर भी समाप्त नहीं होती। अंतिम आरती के बाद मंच खाली हो जाता है, पेट्रोमैक्स बुझ जाते हैं, भीड़ लौट जाती है और लीलास्थल फिर सामान्य दिखाई देने लगते हैं। लेकिन रामकथा लोगों के भीतर चलती रहती है। अगले वर्ष फिर वही पुकार होगी—शहनाई बजेगी, रामनगर सज उठेगा और गंगा के उस पार एक बार फिर पूरा नगर कहेगा— राम आए हैं।
सुरेश गांधी
वरिष्ठ पत्रकार
वाराणसी


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