इसी परिस्थिति में छोटे और सीमांत किसान अपनी आमदनी के दूसरे रास्ते तलाशते हैं। कोई सब्जियों की खेती करता है, कोई फल उगाने की कोशिश करता है तो कोई डेयरी या पशुपालन से आय बढ़ाता है। इन विकल्पों ने ग्रामीण परिवारों के लिए आर्थिक सहारा ज़रूर पैदा किया है। यदि किसी मौसम में खेत से पर्याप्त आमदनी नहीं हो पाती, तो दूध या सब्ज़ी बेचकर घर का खर्च चलाने में मदद मिलती है। यह बदलाव सकारात्मक है, क्योंकि किसान परिस्थितियों के सामने हाथ पर हाथ रखकर बैठने के बजाय अपनी आय के नए रास्ते बना रहा है। लेकिन इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। खेती से बाहर आय के साधन बढ़ना अच्छी बात है, पर यदि किसान इसलिए दूसरे कामों की ओर जा रहा है क्योंकि खेती के लिए जरूरी साधन और बाजार लगातार मुश्किल होते जा रहे हैं, तो इसे केवल आर्थिक विविधता के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसके पीछे खेती के प्रति कमजोर होता भरोसा भी हो सकता है। आज एक परिवार सब्जी की खेती या डेयरी से अपनी जरूरतें पूरी कर लेता है, लेकिन यदि खेती की मूल समस्याएं बनी रहती हैं तो आने वाले समय में वही परिवार अनाज की खेती में कम रुचि ले सकता है।
इस प्रकार का असर सबसे पहले छोटे किसान पर पड़ता है। बड़े किसान के पास संसाधन, भंडारण या परिवहन की बेहतर सुविधा हो सकती है, लेकिन सीमांत किसान के पास विकल्प सीमित होते हैं। उसके लिए फसल खराब होना, पानी की कमी या बाजार में कम कीमत मिलना पूरे परिवार की आर्थिक स्थिति को प्रभावित कर सकता है। इसलिए जब हम किसान की समस्या की बात करते हैं तो सभी किसानों को एक ही नजर से देखना सही नहीं होगा। कम जमीन वाला किसान, सीमित सिंचाई वाला किसान और वह किसान जिसके पास अपनी उपज को बाजार तक ले जाने के साधन नहीं हैं, अलग-अलग तरह के जोखिम झेलते हैं। इसका असर परिवार के दूसरे सदस्यों पर भी पड़ता है। खेती में केवल खेत का मालिक ही काम नहीं करता। परिवार की महिलाएं बुवाई, निराई, कटाई, पशुओं की देखभाल, दूध निकालने और घर से जुड़े दूसरे कामों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। लेकिन उनके श्रम का बड़ा हिस्सा आमदनी के आंकड़ों में दिखाई नहीं देता। जब खेती कमजोर होती है तो परिवार की महिलाओं पर काम का बोझ बढ़ सकता है। युवाओं के सामने भी यह सवाल खड़ा होता है कि वे खेती को अपना भविष्य मानें या रोजगार के लिए गांव से पलायन करें?
कृषि को केवल किसान की निजी समस्या मानने की गलती नहीं करनी चाहिए। खेत में कम अनाज पैदा होने का असर आगे चलकर बाजार और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। खेती से जुड़े मजदूरों, परिवहन, स्थानीय दुकानों, मंडियों और दूसरे छोटे कारोबारों की आय भी कृषि गतिविधियों से जुड़ी होती है। जो आगे चलकर महंगाई का कारन भी बन सकता है. इसलिए जब किसान खेती कम करता है तो इसका असर केवल उसकी जमीन पर दिखाई नहीं देता। गांव की आर्थिक गतिविधियां भी धीरे-धीरे बदलने लगती हैं। ऐसे में ज़रूरी है कि खेती को बचाने की चर्चा केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। किसान को बीज चाहिए, पानी चाहिए, तकनीकी सहायता चाहिए और सबसे महत्वपूर्ण, अपनी फसल बेचने का भरोसेमंद रास्ता चाहिए। बाजार की उपलब्धता का अर्थ केवल मंडी का मौजूद होना नहीं है। इसका अर्थ यह भी है कि किसान अपनी छोटी मात्रा की उपज को उचित लागत पर बाजार तक पहुंचा सके, उसे कीमत की जानकारी मिले और उसके पास फसल बेचने के लिए एक से अधिक विकल्प हों। इसलिए सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि किसान खेती क्यों छोड़ रहा है। सवाल यह होना चाहिए कि क्या हमने खेती को उसके लिए इतना भरोसेमंद बनाया है कि वह उसे छोड़ना न चाहे?
मघी
लूणकरणसर, राजस्थान
टीम, गाँव की आवाज़
(यह लेखिका की निजी राय है)



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