नेपाल की आपदा ने हिमालय के लिए एक कठिन सवाल सामने रखा है। अगर तापमान बढ़ने के साथ पहाड़ों में जोखिम की प्रकृति बदल रही है, तो केवल आपदा आने के बाद राहत देना पर्याप्त नहीं होगा। साइंटिफिक मॉनिटरिंग, सीमा-पार अर्ली वार्निंग, रेजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर और ऐसी क्लाइमेट फायनेंस व्यवस्था की जरूरत होगी जो संकट के बाद वर्षों तक इंतजार न करवाए। अब यह देखना बाकी है कि यूएनजीए में उठी नेपाल की आवाज सीओपी31 तक कितनी दूर जाती है। खासकर तब, जब लॉस एंड डैमेज फंड में उपलब्ध धन और प्रभावित देशों की जरूरत के बीच अभी भी बहुत बड़ा अंतर है।
शनिवार, 26 सितंबर 2026
सवाल बन UN पहुंचीं नेपाल की तबाही: कौन उठाएगा जलवायु संकट का नुकसान?
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