यूरोप के इस आंकड़े की एक अहम बात यह है कि यह सीधे खेत से दर्ज हुआ अंतिम नुकसान नहीं है। यह उत्पादन के पूर्वानुमानों में आया बदलाव है, जिसे मौजूदा कीमतों से जोड़कर आर्थिक नुकसान का अनुमान लगाया गया है। ECIU ने यह भी बताया है कि रोमानिया, बुल्गारिया, पोलैंड और स्वीडन में उत्पादन के ऊपर की ओर संशोधन को अलग कर दिया जाए तो पश्चिमी और मध्य यूरोप में नुकसान का अनुमान €4.1 अरब तक पहुंचता है। भारत की स्थिति इससे अलग है। यहां अभी 2026 के मौसम से जुड़ी फसल क्षति का ऐसा राष्ट्रीय आकलन उपलब्ध नहीं है, जिसमें मौसम से हुए अनाज के नुकसान को मिलियन टन और रुपये की कीमत में जोड़ा गया हो। लेकिन इस साल का मानसून खेती पर दबाव के कई संकेत जरूर छोड़ गया है। भारत में जून से सितंबर के बीच दक्षिण-पश्चिम मानसून की बारिश लंबी अवधि के औसत से 12.6% कम रही। 2026 का मानसून 2015 के बाद सबसे कमजोर रहा। दक्षिण भारत में बारिश लंबी अवधि के औसत की सिर्फ 76% और पूर्वी भारत में 74% रही। पूर्व और पूर्वोत्तर भारत में इस मौसम की बारिश 1901 के बाद सबसे कम रही।
पूरे देश का औसत हालांकि खेती की पूरी तस्वीर नहीं बताता। महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में लंबे सूखे दौर ने फसल की अंतिम पैदावार को लेकर चिंता बढ़ाई है। दक्षिण भारत के जलाशयों में 24 सितंबर को लाइव स्टोरेज क्षमता का करीब 50% पानी था, जबकि पूरे देश का आंकड़ा 79% था। इसका असर खरीफ की बची फसलों के साथ आने वाली रबी बुवाई पर भी पड़ सकता है। कृषि मंत्रालय के मुताबिक 18 सितंबर तक खरीफ फसलों की बुवाई करीब 110.39 मिलियन हेक्टेयर में हुई थी, जो पिछले साल से लगभग 1.5 मिलियन हेक्टेयर कम है। धान का रकबा 3.7% घटकर 42.9 मिलियन हेक्टेयर रह गया। मक्का, सोयाबीन और कपास के रकबे में भी कुछ कमी दर्ज हुई, जबकि दलहनों का रकबा बढ़ा। सरकार को कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, राजस्थान और गुजरात में करीब 611,000 हेक्टेयर में फसल नुकसान की प्रारंभिक रिपोर्ट मिली है। हालांकि इसका विस्तृत वैज्ञानिक आकलन अभी चल रहा है। इसलिए इसे अंतिम फसल या उत्पादन नुकसान कहना जल्दबाजी होगी।
इसी बीच 2026-27 के लिए भारत का खाद्यान्न उत्पादन लक्ष्य 373.93 मिलियन टन रखा गया है। 2025-26 में दर्ज 376.56 मिलियन टन के मुकाबले यह कम है। सरकार ने चावल के लिए 123.15 मिलियन टन और मक्के के लिए 31.04 मिलियन टन का खरीफ लक्ष्य रखा है। ये लक्ष्य हैं, अंतिम उत्पादन के आंकड़े नहीं। यही वह जगह है जहां भारत और यूरोप की कहानी को एक जैसा मानने से बचना जरूरी है। यूरोप के मामले में 16.7 मिलियन टन की संख्या उत्पादन पूर्वानुमानों में आई गिरावट का अनुमान है। भारत में फिलहाल हमारे पास कमजोर मानसून, कुछ फसलों के घटे रकबे, करीब 611,000 हेक्टेयर में प्रारंभिक नुकसान की रिपोर्ट और कम खाद्यान्न लक्ष्य जैसे अलग-अलग संकेतक हैं। इन्हें जोड़कर अभी मौसम से हुई कुल टन या रुपये की क्षति बताना संभव नहीं है। भारत के लिए तत्काल चिंता केवल देश में अनाज की उपलब्धता की नहीं है। 1 सितंबर 2026 को केंद्रीय पूल में करीब 39.05 मिलियन टन चावल और 48 मिलियन टन गेहूं का स्टॉक था। दोनों ही निर्धारित बफर मानक से ऊपर थे। इसका मतलब है कि कमजोर एक मौसम अपने आप राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा संकट में बदल जाए, ऐसा जरूरी नहीं है। लेकिन इससे किसानों की आय, स्थानीय बाजार और कुछ फसलों की कीमतों पर पड़ने वाला दबाव खत्म नहीं होता।
मौसम का असर भी हर जगह एक जैसा नहीं होता। कहीं बारिश कम होती है और फसल को पानी नहीं मिलता। कहीं लंबे सूखे के बाद अचानक भारी बारिश खेत को नुकसान पहुंचा सकती है। खेती के लिए केवल पूरे मौसम में कितनी बारिश हुई, यह मायने नहीं रखता। बारिश कब हुई, कितने अंतराल पर हुई और फसल के किस चरण में हुई, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यूरोप में इस साल के अनुभव ने इसी जोखिम को आर्थिक आंकड़े में बदलकर दिखाया है। वहां ECIU के मुताबिक जून और सितंबर के बीच उत्पादन अनुमान में 16.7 मिलियन टन की गिरावट हुई। भारत में अभी ऐसा हिसाब उपलब्ध नहीं है, लेकिन 2026 का कमजोर मानसून यह जरूर दिखा रहा है कि बारिश में असमानता और लंबे सूखे दौर खेती के लिए कितने महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इसे सीधे जलवायु परिवर्तन से जोड़ने में भी सावधानी जरूरी है। भारत की 2026 फसल क्षति में जलवायु परिवर्तन का कितना योगदान है, इसका कोई राष्ट्रीय एट्रिब्यूशन अध्ययन अभी सामने नहीं आया है। इस साल के मौसम पर अल नीनो, बारिश की असमानता, सूखे दौर, स्थानीय बाढ़ और पानी की उपलब्धता जैसे कई कारकों का असर है।
हालांकि यूरोप के मामले में वैज्ञानिक आकलन एक बड़ी पृष्ठभूमि की ओर इशारा करता है। World Weather Attribution के वैज्ञानिकों के अनुसार जून की यूरोपीय हीटवेव जलवायु परिवर्तन के बिना 50 साल पहले लगभग असंभव होती। भारत के लिए फिलहाल ज्यादा सटीक सवाल यह है कि कमजोर मानसून के बाद रबी की खेती कैसी रहती है, मिट्टी में कितनी नमी बची है और जलाशयों में कितना पानी उपलब्ध है। अक्टूबर से दिसंबर के दौरान देश के ज्यादातर हिस्सों में सामान्य से कम बारिश का अनुमान भी दिया गया है। अल नीनो के नवंबर में चरम पर पहुंचने की संभावना जताई गई है। यूरोप में मौसम के असर का बिल अब अरबों यूरो में दिखाई दे रहा है। भारत में 2026 का बिल अभी लिखा नहीं गया है। लेकिन खेतों में पानी की कमी, फसल के बदलते रकबे और 611,000 हेक्टेयर में शुरुआती नुकसान की रिपोर्ट बता रही है कि उसकी गणना का आधार तैयार हो चुका है।

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