मायावती और अखिलेश के एक साथ आने की ललक से 1993 की याद फिर हुई ताजा

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लखनऊ 16 अप्रैल, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चल रही बयार को उत्तर प्रदेश में रोकने के लिए मायावती और अखिलेश यादव के एक मंच पर आने की चाहत ने सन् 1993 की याद ताजा कर दी है। इस चाहत से एक बात और साफ है कि बहुजन समाज पार्टी (बसपा) अध्यक्ष मायावती और समाजवादी पार्टी (सपा) अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मान ही लिया है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में श्री मोदी और उनकी भारतीय जनता पार्टी(भाजपा) से अकेले पार पाना मुश्किल होगा। डा़ भीमराव अम्बेडकर की जयंती 14 अप्रैल को सुश्री मायावती ने गैर भाजपा दलों से हाथ मिलाने का संकेत दिया था। उन्होंने कहा था कि बसपा गैर भाजपा दलों के साथ मिलकर लोकतंत्र को बचाने की लडाई लडने को तैयार है और बसपा को भाजपा से लडने के लिए दूसरे दलों से हाथ मिलाने में अब कोई गुरेज नहीं है। सुश्री मायावती के इस बयान के दूसरे दिन ही अखिलेश यादव ने भी महागठबंधन बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्हाेनें बताया कि इस बाबत वह राष्ट्रवादी कांग्रेस के अध्यक्ष शरद पवार, बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार और बंगाल की मुख्यमंत्री तथा तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी से मिल चुके हैं, लेकिन उन्होंने सुश्री मायावती से मुलाकात के बारे में कुछ नहीं कहा।

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