विशेष : योगी जी! कब बंद होगा गरीबों के राशन पर डाका

‘गरीबी खत्म होगी, भूख मिटेगी, जैसे नारों को सुनते-सुनते कान पक गया है। गेहूं 2 रुपया, चावल 3 रुपये किलो मिलेगा। घर-घर तक गरीबों को गेहूं-चावल पहुंचाया जायेगा। अब तो योगी सरकार तीन रुपये में नाश्ता और पांच रुपये में खाना भी देने की तैयारी में है। बड़ा सवाल यह है कि यह सब करने के बाद भी गरीबों का भला हो पायेगा या नहीं, संशय बना हुआ है। क्योंकि अब तक कुल आबादी के 70 फीसदी गरीब अब भी सरकार की इन सुविधाओं से मरहूम है। क्या वाकई गरीबों को 2 रुपये में गेंहूं, तीन रुपये का चावल से कोटेदार गरीबों की भूख मिटा रही हैं? या उनका निवाला छिन रही है, जांच-पड़ताल की जहमत ही नहीं उठायी गयी, क्योंकि इसके काली कमाई का बड़ा हिस्सा से अधिकारी व सरकार में बैठे जनप्रतिनिधि, मंत्री मालामाल हो रहे है 



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हालांकि इन सवालों का जवाब जानने के लिए यूपी का कोई भी जनपद काफी है। किसी भी कोटेदार या गोदाम की जांच-पड़ताल में सच सामने आ जायेगा कि गोदामों से गेहूं, चावल गरीबों तक पहुंच रहा है या नहीं। जी हां, सरकार की नाक के नीचे यूपी में अधिकारियों की मिलीभगत सरेआम गरीबों का राशन ब्लैक हो रहा है। गरीबों का हजारों टन गेहूं चावल सरकारी गोदाम से राशन की दुकान न पहुंच कर बड़ी-बड़ी आटा मिलों व अढ़तियों में खप रहा है। करोड़ों रुपये के इस खेल में पुलिस, अधिकारी और व्यापारी मिले हुए हैं। यह अलग बात है राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत मिलने वाले सरकारी राशन में पारदर्शिता लाने के लिए योगी सरकार अब सख्त कदम उठाने जा रही है। लेकिन कब यह कदम उठेगा पता नहीं, लेकिन यह सच है कि अखिलेश राज का यह काला धंधा योगी राज में भी अब तक धड़ल्ले से चल रहा है। सरकारी राशन की दुकानों पर दुकानदारों की मनमानी के आगे विभाग के सारे नियम कानून बेअसर हैं। कोटेदारों की मनमानी के चलते कार्ड धारकों को उनके हिस्से का राशन भी नहीं मिल रहा है। 

पात्र गृहस्थी की सूची के साथ की जा रही छेड़छाड़ से उक्त सूची में पहले से दर्ज नाम गायब होने का सिलसिला आज भी चल रहा है। तमाम पात्रों के नाम हटाकर उनकी जगह पर उसी क्रमाक पर दूसरों का नाम अंकित करने का विभागीय गोरखधंधा तमाम शिकायतों के बाद भी नहीं थमा है। जिन पात्र गृहस्थी वालों को पिछले महीनों तक राशन मिलता था। उन्हें अचानक कोटेदारों ने यह कहकर राशन देना बंद कर दिया है कि उनका नाम वितरण सूची में नहीं है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का संसदीय क्षेत्र वाराणसी हो या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गोरखपुर, तकरीबन यूपी के हर जिलों में पात्र गृहस्थी की सूची में भारी हेराफेरी की शिकायत है। क्षेत्र के कई युवक विभाग की आईडी लेकर उसका दुरूपयोग कर रहे है। इस संबंध में पिछले दो महीने से लोग शिकायत करते आ रहे है। फिर भी आज तक न तो इन पर कोई कार्यवाही हुई। कोटेदारों की माने तो उन्हें हर महीने वितरण सूची मिलती है। जिससे वह वितरण करते है। वहीं लोगों की शिकायत है कि कोटेदार द्वारा स्वयं यह खेल कराया जा रहा है। जब एक बार उक्त सूची बन गई तो उसमे हर महीने बदलाव की क्या जरूरत है। ग्रामीणों ने पूर्ति निरीक्षक कार्यालय में कार्यरत लिपिक पर आरोप लगाया है कि वह कोटेदारों के साथ मिली सब कुछ कर रहा है। 


कोटेदार कार्ड धारकों को मिटटी का तेल न देकर उसकी कालाबाजारी कर रहे हैं। मतलब साफ है गरीबों के निवाले पर राशन माफिया डाका डाल रहे हैं। खाद्य एवं नागरिक पूर्ति विभाग में घोटाले का यह खेल लंबे समय स ेचल रहा है। ऐसे में जहां एक तरफ सूखे की मार झेल रहे किसानों को एक-एक दाने के लिए मोहताज होना पड़ रहा है वहीं दूसरी तरफ विभाग के अफसर गरीबों के राशन से ही अपनी जेबों को भरने में लगे हुए हैं। विभाग हर माह लाखों रुपये के राशन की कालाबाजारी कर रहा है। विभाग गरीबों के सरकारी राशन को दूसरे गोदामों के माध्यम से दूसरी जगह सप्लाई कर इसे बाजार में बड़े दामों पर बेच रहा है। दरअसल, सरकारी राशन हर माह पीसीएफ गोदाम में रखा जाता है। यहां से हर माह अलग-अलग राशन विक्रेताओं को नियत मानक के अनुसार राशन रिलीज किया जाता है। यहां से प्रत्येक बोरे का वजन नहीं तुलवाया जाता। यानि कि प्रत्येक खाली बोरे का वजन 650 से 800 ग्राम तक होता है। प्रत्येक माह हर जिले में करीब 10 हजार से 30 हजार कुंतल राशन रिलीज किया जाता है। इस हिसाब से हर माह करीब 25000-40,000 किलो राशन स्टोर कीपर और पीसीएफ गोदाम के अधिकारियों को बचता है। जिसका हिसाब किसी को नहीं देना होता और ये राशन प्रत्येक माह बाजार में बेच दिया जाता है। जिसकी कीमत लाखों रुपये तक की होती है। ये पूरा पैसा पीसीएफ गोदाम के अधिकारियों के जेब में जाता है। 

इसी तरह से दूसरी कालाबाजारी के खेल खेला जाता है। दरअसल, सामान्य रूप से पीसीएफ गोदाम से जो राशन रिलीज होता है उसके लिए पर्ची जारी की जाती है। जिस राशन माफियाओं से पीसीएफ अधिकारियों की सेटिंग होती है उन्हें बिना नाम की पर्ची जारी की जाती है। यदि किसी ने पकड़ लिया तो उसमें राशन डीलर का नाम लिख दिया जाता है। अगर नहीं पकड़ी जाती है तो वो राशन सीधे राशन माफियाओं के गोदाम तक पहुंच जाता है। जहां से सरकारी बोरों से इस राशन को दूसरे बोरों में पलट दिया जाता है और बाजार में आढ़तियों को बेच दिया जाता है। यानि हर जिले में दो से दस ट्रक राशन हर माह बेच दिया जाता है। इस पूरे काम में पीसीएफ अधिकारियों के साथ जनपद के करीब आधा दर्जन राशन माफिया सक्रिय हैं। यही एक वजह है कि अधिकारी राशन माफियाओं को किसी भी सूरत में नहीं पकडने देते और उन्हें बचा लेते हैं। नहीं तो उनकी प्रत्येक माह की लाखों रूपये की आमदनी बंद होने का खतरा रहता है। ये राशन माफिया प्रत्येक माह पीसीएफ और पूर्ति विभाग के अधिकारियों को लाखों रूपये पहुंचाते हैं तो उन राशन माफियाओं को बचाने की जिम्मेदारी भी इन्हीं अधिकारियों की होती है। 

इसके अलावा ग्रामीण अंचलों में भी यह खेल धडल्ले स ेचल रहा है, जहां दुकानदार गरीबों का हक मार रहे है। ग्रामीणोंका आरोप है कि कार्डधारकों को कोटेदार ने राशन की पर्ची आज तक नहीं दी है। राशन विक्रेता ने अपने बीवी बच्चों के नाम भी बीपीएल राशनकार्ड बनवा रखे हैं। कई लोगों के दो-दो राशनकार्ड से भी राशन बनवाकर लिया जा रहा है। कुल मिलाकर राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा योजना के तहत गरीबों को मिलने वाला राशन कालाबाजारी की भंवर में फंस गया है। आपूर्ति विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत से हो रही कालाबाजारी पकड़े जाने पर जांच के नाम सिर्फ लीपापोती हो रही है। कहीं-कहीं ऐसे लोग भी हैं जो सस्ता राशन पाने के लिए ग्रामीण व शहरी क्षेत्र में खुद को भूमिहीन, गरीब व झुग्गी झोपड़ी वाला बताकर अंत्योदय व खाद्य सुरक्षा के राशन कार्ड बनवा लिए हैं। और सस्ता राशन ले रहे हैं। जबकि सरकार ने भूमिहीन तथा पांच एकड़ से कम कृषि भूमि वालों को बीपीएल की श्रेणी में मानते हुए उन्हें सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए सस्ता राशन देने के लिए पात्र माना है। इससे कम जमीन वाले किसान लघु व सीमांत किसान माने जाते हैं और जिनके पास जमीन ही नहीं वे भूमिहीन माने जाते हैं। बीपीएल के नीचे जीवन यापन करने वालों को सरकार सस्ता राशन, चावल, मिट्टी तेल आदि देती है। ऐसे लोगों को अंत्योदय के राशन कार्ड बनाए जाते हैं। ऐसे लोगों की सूची में उन लोगों ने भी अपना नाम शामिल करा लिया जिनके खाते में पांच एकड़ से अधिक जमीन दर्ज है। ऐसे लघु किसान भी सरकारी तंत्र की आंख में धूल झोंक कर सस्ता राशन ले रहे है। एक तरफ तो वे अंत्योदय के राशन कार्ड धारक बनकर सरकारी योजनाओं का लाभ उठाते रहे हैं तो दूसरी ओर उनके पास पक्के घरों से लेकर जमन जायदाद और चार पतहया वाहन हैं। 





(सुरेश गांधी)
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