विशेष आलेख : युवापीढ़ी की निराशा बहुत घातक हो सकती है

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देश की अर्थव्यवस्था भले ही कई देशों के मुकाबले दोगुनी वृद्धि कर रही हो लेकिन युवाओं के लिए रोजगार सृजित करने के मामले में देश पिछड़ रहा है। रोजगार एवं उद्यम के मोर्चें पर युवा सपनों का बिखरना देश के लिये एक गंभीर चुनौती है। हमें गंभीरता से विचार करना चाहिए कि आखिर ऐसी कौन-सी परिस्थितियां हैं, जो इस पीढ़ी की तरुणाई को मूच्र्छित कर रही है, निराशा का वातावरण निर्मित कर रही है। एक सबल एवं सशक्त राष्ट्र की बुनियाद ही हिलती हुई दिखाई दे रही है। जबकि सरकार ने रोजगार सृजन के लिए मेक इन इंडिया और स्किल इंडिया जैसे कई कार्यक्रम चला रखे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि अन्य सरकारी योजनाओं की तरह ये योजनाएं भी कोरा दिखावा है। युवापीढ़ी राष्ट्रीय जीवन की ऐसी सम्पदा हैं कि अगर उन्हें रोज नहीं संभाला जाए या रोज नया नहीं किया जाए तो वे भोंथरा जाती हैं, विकराल हो जाती है, समस्या बन जाती है। कुछ सम्पदाएं ऐसी हैं जो अगर पुरानी हो जाएं तो सड़ जाती हैं। युवापीढ़ी और उनके सपनों को रोज खाद-पानी देने की जरूरत है और इसके लिये जिस तरह के राजनेताओं की अपेक्षा है, आज हमारे पास ऐसे राजनेता नहीं है, जो इस स्थिति से राष्ट्र को बाहर निकाल सके, राष्ट्रीय चरित्र को जीवित रखने का भरोसा दिला सके। युवापीढ़ी की यह निराशा बहुत घातक हो सकती है, होती रही है। महादेवी वर्मा के शब्दों में ‘‘बलवान राष्ट्र वही होता है जिसकी तरुणाई सबल होती है।’’ बेरोजगारी का बढ़ना एवं युवा सपनों का बिखरना देश की दुर्बलता को दर्शाता है। इन स्थितियों पर गंभीरता चिन्तन की अपेक्षा है। क्योंकि सरकारी स्तर पर ही नहीं, बल्कि बैंकों, सार्वजनिक उपक्रमों एवं नामी-गिरामी आईटी और अन्य कंपनियों में जिस रफ्तार से नौकरियों में इनदिनों कटौती देखने को मिल रही है, उससे युवापीढ़ी में निराशा व्याप्त होना स्वाभाविक है। 
हाल ही में आर्थिक सहयोग तथा विकास संगठन की ताजा रिपोर्ट ने बताया है कि देश में पंद्रह से उनतीस वर्ष के तीस प्रतिशत से अधिक युवाओं के पास रोजगार नहीं है। जिन युवाओं ने अपने साधनों से व्यापार की ओर कदम बढ़ाये हैं, उन्हें भी बड़ी कम्पनियों,ं विदेशी फंड की प्रतिस्पर्धा एवं सरकारी की कठोर औपचारिकताओं का सामना करना पड़ रहा है। पूरी दुनिया में सबसे तेज तरक्की करने वाली अमेरिकी कार शेयरिंग स्टार्ट-अप कंपनी ऊबर का माॅडल भारतीय अन्य क्षेत्र की कम्पनियों को लुभा रहा है, वे भारतीय कम्पनियां और ऊबर दोनों ही युवापीढ़ी के लिये गंभीर चिन्ता का विषय बने हुए हंै। क्योंकि इसकी फिलहाल दो वजह है- भारी नुकसान का माॅडल एवं नौकरियों में कटौती। इसके वैल्युएशन को लेकर भी कई सवाल खड़े हुए हैं। विभिन्न समस्याओं की शिकार इसी कंपनी के वर्किंग मॉडल में भारत की नामी-गिरामी आईटी कंपनियों को अपनी सद्गति नजर आ रही है। ऊबर का वर्किंग मॉडल यह है कि जिन टैक्सियों की सेवाएं वह अपने ग्राहकों को मुहैया करा रही है, वे किसी और की हैं। न ड्राइवर रखने की किचकिच, न गाड़ियों के ईंधन और मेंटिनेंस का झंझट। प्रारंभ में इस माॅडल से जुड़ने वाले युवा टैक्सी ड्राइवरों को बहुत सुकून मिला था, लेकिन अब वे भी कठिनाई को महसूस कर रहे हैं। उन्हें अपने खर्चें पूरे करना ही जटिल महसूस हो रहा है। ऊबर, ओला, फिलीपकार्ट, स्नेपडील, अमेजान जैसी कम्पनियों ने भी भारतीय व्यापार एवं रोजगार की स्थितियों को घूमिल किया है।
देश-विदेश में तमाम संकटों से जूझ रही भारतीय आईटी कंपनियों को लग रहा है कि ऊबर का तरीका अगर वे सॉफ्टवेयर इंजिनियरों को लेकर अपना लें - उन्हें नियमित नौकरी पर रखने के बजाय प्रॉजेक्ट की जरूरतों के अनुरूप ही उनकी सेवाएं लें - तो न सिर्फ उनके स्थायी खर्चे बचेंगे, बल्कि कर्मचारियों से जुड़ी हर तरह की जिम्मेदारी से भी वे मुक्त हो जाएंगी। अभी यह वर्किंग मॉडल सिर्फ पुणे स्थित एक छोटी आईटी कंपनी द्वारा ही अपनाया गया है, लेकिन निकट भविष्य में टीसीएस, इनफोसिस और विप्रो जैसी बड़ी कंपनियों को भी हम शायद इसी दिशा में बढ़ते देखें। इसके लिए नई पीढ़ी के कुछ प्रतिशत इंजिनियरों की मानसिकता का भी हवाला दिया जा रहा है, जो कहीं बंध कर काम करना पसंद नहीं करते। लेकिन सरकारों और समाज के जिम्मेदार लोगों को यह जरूर सोचना चाहिए कि ये नई पीढ़ी के इंजिनियर अब से दस-पंद्रह साल बाद भी ऐसे ही तो नहीं रहेंगे। कहीं ऐसा न हो कि जब उन पर अपना परिवार चलाने, बच्चे पालने की जिम्मेदारी आए तो उनके पास स्थायी काम और सामाजिक सुरक्षा के नाम पर कुछ भी न हो! इन स्थितियों को देखते हुए युवापीढ़ी का न केवल वर्तमान बल्कि भविष्य भी धुंधला ही दिखाई दे रहा है। 
मोदी सरकार युवाओं को लेकर गंभीर है, पूर्व सरकारंे भी जागरूक रही है, यही कारण है कि अनेक रोजगार की योजनाएं संचालित है। बावजूद इसके जिस तेजी से बेरोजगारी की दर में वृद्धि हो रही है उससे साफ है कि देश में बेरोजगारी से निपटने का कोई ठोस रोडमैप नहीं है। यहां उल्लेख करना आवश्यक है कि भारत सरकार ने लोगों को रोजगार प्रदान करने के लिए स्किल इंडिया के जरिए 2022 तक चालीस करोड़ लोगों को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य रखा है। लेकिन जिस गति से देश में बेरोजगारी की दर में वृद्धि हो रही है उस हिसाब से कारोबारी प्रशिक्षण की यह उपलब्धि ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। आमतौर पर पच्चीस से तीस वर्ष के बीच 95 प्रतिशत नौजवान अपनी पढ़ाई पूरी कर लेते हैं और फिर रोजगार की तलाश शुरू कर देते हैं। सीआइआइ की इंडिया स्किल रिपोर्ट-2015 बताती है कि भारत में हर साल तकरीबन सवा करोड़ शिक्षित युवा तैयार होते हैं। ये नौजवान रोजगार के लिए सरकारी और प्राइवेट क्षेत्र, सभी जगह अपनी किस्मत आजमाते हैं। लेकिन सिर्फ सैंतीस प्रतिशत कामयाब हो पाते हैं। चिन्ताजनक स्थिति यह है कि सरकारी क्षेत्र में नौकरियां सिकुड़ रही हैं, जबकि दूसरी ओर प्राइवेट क्षेत्र में उन्हीं लोगों को रोजगार मिल रहा है जिन्हें कारोबारी प्रशिक्षण हासिल है। देश में सालाना सिर्फ पैंतीस लाख लोगों के लिए कौशल प्रशिक्षण की व्यवस्था है, जबकि हर साल सवा करोड़ शिक्षित बेरोजगार युवा रोजगार की कतार में खड़े होते हैं। विदेशों में भी भारतीय नौजवानों के लिये नौकरियांे पर पहरा लग रहा है, वे भी भारत की ओर ताक रहे हैं।  

युवापीढ़ी के इस तरह सपनों का बिखरना त्रासदी से कम नहीं हैं क्योंकि आज के सपनों में, आने वाले कल के सवालों के गूढ़ उत्तर छिपे होते हैं। हर युवा पीढ़ी सपने देखती है, हर पिछली पीढ़ी से अलग। वह अक्सर एक कदम आगे का सोचती है, इसी नए के प्रति उनके आग्रह में छिपा होता है विकास का रहस्य। कल्पनाओं की छलांग या दिवास्वप्न के बिना हम संभावनाओं के बंद बैग को कैसे खंगाल सकते हैं? सपने देखना एक खुशगवार तरीके से भविष्य की दिशा तय करना ही तो है। किसी भी युवा मन के सपनों की विविधता या विस्तार उसके महान या सफल होने का दिशा-सूचक है। स्वप्न हर युवा मन संजोता है। यह बहुत आवश्यक है। खुली आंखों के सपने जो हमें अपने लक्ष्य का गूढ़ नक्शा देते हैं। लेकिन देश में बेरोजगारी एवं युवा-निराशा की स्थितियां कैसे से नये भारत का निर्माण करने में सहायक होगी? 
रोजगार बढ़ाने के लिए छोटे उद्योगों का विकास सबसे ज्यादा जरूरी है। अर्थशास्त्रियों की मानें तो लघु उद्योगों में उतनी ही पूंजी लगाने से लघु उद्योग, बड़े उद्योग की तुलना में पांच गुना अधिक लोगों को रोजगार देते हैं। बेरोजगारी केवल आर्थिक समस्या नहीं है। यह एक ऐसा मसला है जो अपराध नियंत्रण और सामाजिक शांति से भी उतना ही वास्ता रखता है। अगर बेरोजगारी बढ़ती ही जाएगी तो तरह-तरह के असंतोष और हिंसा के रूप में फूटेगी। क्योंकि संसार की सबसे बड़ी आबादी हमारे यहां युवाओं की है। पचपन करोड़ के आसपास है। उनमें मेट्रो वर्ग के युवा और उनके जैसे युवा टेंªडसेटर हैं। उनकी नकल गांव, गली, कस्बे तक में है, लेकिन वे सब एकरूप नहीं हैं। एक भूमिका में नहीं हैं। कश्मीर में वे पत्थर फेंकते हैं। छत्तीसगढ़ में वे माओवादी हैं। हिंसक हैं। वे राज्यसत्ता को हिंसक तरीके से उखाड़ फेंकना चाहते हैं। दरअसल हमारी युवा पीढ़ी महज स्वप्नजीवी पीढ़ी नहीं है, वह रोज यथार्थ से जूझती है, उसके सामने भ्रष्टाचार, आरक्षण का बिगड़ता स्वरूप, महंगी होती जाती शिक्षा जैसी तमाम विषमताओं और अवरोधों की ढेरों समस्याएं भी हैं। उनके पास कोरे स्वप्न ही नहीं, बल्कि आंखों में किरकिराता सच भी है। इस गला काट प्रतियोगिता के युग में, क्या महज रोजगार की समस्या के आधार पर पाया जा सकता है, वर्तमान की विदू्रपताओं को चुनौती देकर नया भविष्य गढ़ने का संकल्प-स्वप्न? शायद नहीं, क्योंकि हरेक समय की अपनी चुनौतियां होती हैं, कोई काल हो या कोई परिवेश... युवा आंखों से सपने कौन छीन सका? लेकिन उनके सपनों की अनदेखी अनेक समस्याओं का सबब बन सकती है, इसे गंभीरता से लेना ही होगा।




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(ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कुंज अपार्टमेंट
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