रक्षाबंधन : पहला रक्षा का धागा पत्नी ने पति को बांधा

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इलाहाबाद रक्षा बंधन रक्षा की प्रतिबद्धता, आत्मीयता और स्नेह से रिश्तों को मजबूती प्रदान करने वाला पर्व रक्षाबंधन है। वैदिक शोध संस्थान एवं कर्मकाण्ड प्रशिक्षण केन्द्र के पूर्व आचार्य डा़ आत्माराम गौतम ने बताया कि श्रावण मास के पूर्णिमा दिवस पर मनाया जाने वाला यह पर्व रक्षा की प्रतिबद्धता, आत्मीयता और प्रेम का प्रतीक है। सबसे पहले एक पत्नी ने अपने पति की कलाई पर रक्षा का धागा बांधकर उसकी रक्षा की थी। यह रक्षा सूत्र कोई भी किसी को बांध सकता है। पत्नी-पति को, माता-पिता बेेटे और बेटी को, बहिन- भाई को, गुरू-शिष्य को और बहिन-बहिन को। यह बंधन रक्षा बांधने वाले और बंधवाने वाले दोनों को एक दूसरे की रक्षा के लिए प्रेरित करता है। श्री गौतम ने बताया कि रक्षा बंधन पर्व की शुरूआत कब से हुई इसके बारे में कोई ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं है लेकिन यह शदियों पुराना त्यौहार है। भारतीय समाज में यह पर्व इतनी व्यापकता और गहराई से समाया है। इसका सामाजिक महत्ता के साथ ही पौराणिक कथाओं, महाभारत इसके अतिरिक्त ऐतिहासिक एवं साहित्यिक महत्ता भी उल्लेखनीय है। सबसे पहले एक पत्नी ने अपने पति की कलाई पर रक्षा का धागा बांधकर उसकी रक्षा की थी। आचार्य ने बताया कि भविष्य पुराण में यह स्पष्ट है कि रक्षा का सूत्र बांधने की प्रथा महाराजा इंद्र की पत्नी इंद्राणी ने की थी। जब देव और दानवों के बीच युद्ध चल रहा था तब इंद्राणी ने देवगुरू वृहस्पति द्वारा मंत्रो की शक्ति से पवित्र कर दिया गया रक्षा सूत्र, चावल और सरसों के दानों को पति इंद्र के दाहिने हाथ में बांधकर उनकी रक्षा और विजय कामना की थी जिससे उसने असुरों पर विजय प्राप्त की थी। यह संयोग था कि वह श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन था और उसी दिन से यह रक्षा का धागा बांधने की प्रथा चली आ रही है।



उन्होंने बताया कि स्कन्द पुराण, पद्मपुराण और श्रीमद्भभागवत में वामनावतार नामक कथा में रक्षा बंधन का प्रसंग मिलता है। भगवान विष्णु द्वारा राजा बलि के अभिमान को चकनाचूर कर देने के करण यह त्योहार “बले” नाम से भी जाना जाता है। लगभग छह हजार साल पहले सिंधु घाटी सभ्यता के दौरान रक्षा बंधन के कुछ प्रमाण मिलते हैं। इसके बाद अलग अलग सभ्यता और संस्कृतियों ने रक्षा बंधन को अपनी सुविधा और सहूलियत से अपनाया। बाद में सभ्यता और समाज के विकास के साथ साथ यह पवित्र त्यौहार भाई-बहन का त्यौहार बन गया। इस दिन बहिने- भाइयों की कलाई पर रक्षा का सूत्र बांध कर जहां एक ओर उनकी लंबी उम्र की कामना करती हैं वहीं अपनी रक्षा करने का वचन भी लेती हैं। आधुनिक समाज में यह त्यौहार भाई-बहनों के त्यौहार के रूप में मनाया जाने लगा। इतिहास इसका गवाह है, मुग़ल सम्राट हुमायूं और राजपूत रानी कर्णावती की कहानी शुद्ध भाई-बहन के प्यार का प्रतीक है। राखी सिर्फ धागा नहीं है बल्कि भाई और बहन के बीच भावनात्मक जुड़ाव है। मध्यकालीन युग में राजपूत एवं मुस्लिमों के बीच संघर्ष चल रहा था। रानी कर्णावती चित्तौड़ के राजा की विधवा थीं। उस दौरान गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह से अपनी और अपनी प्रजा की सुरक्षा का कोई रास्ता न निकलता देख रानी ने हुमायूँ को राखी भेजी थी। हुमायूं इस हिंदू परंपरा को अच्छे से जानता था इसलिए उसके दिल की गहराइयों में रानी कर्णावती का प्यार उतर गया और उसने तुरंत अपने सैनिकों को युद्ध बंद करने का आदेश दिया और हूमायूं ने रानी कर्णावती को अपनी बहिन का दर्जा दिया और उम्रभर रक्षा का वचन दिया और पालन किया।

रक्षाबंधन का दूसरा उदाहरण एलेग्जेंडर और राजा पुरु का माना जाता है। हमेशा विजयी रहने वाला एलेग्जेंडर भारतीय राजा पुरु के आगे टिक न सका। एलेग्जेंडर की पत्नी ने रक्षा बंधन के बारे में सुना था। उसने राजा पुरु को राखी भेजी तब उन्हाेंने युद्ध समाप्ति की घोषणा कर दी। इसके बाद राजा पुरु ने एलेग्जेंडर की पत्नी को बहिन का दर्जा दिया और उसकी राखी की लाज रखी। इस ऐतिहासिक घटना में भाई-बहन के प्यार को मजबूती प्रदान की । रक्षा बंधन से जुडा एक और दिलचस्प पौराणिक प्रमाण भगवान श्रीकृष्ण का है। श्रीकृष्ण ने शिशुपाल की जब वध किया तो उनकी एक उंगली से खून बहने लगा। उस समय द्रोपदी ने अपनी साडी का एक कोना फाड़कर उनकी कलाई से लेकर उंगली में बांध दिया। जिससे खून बहना बन्द हो गया था। तब श्रीकृष्ण ने द्रोपदी की रक्षा का वचन दिया। कौरवों की भरी सभा में दुशासन द्वारा द्रोपदी का चीर हरण होने से लाज बचाकर अपने वचन का मान रखा और उन्हें बहिन कहा। शहर के वरिष्ठ रंगमंच कर्मी और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के लेखा विभाग में कार्यरत सुधीर सिन्हा ने बताया कि 50 और अस्सी के दशक तक रक्षा बंधन हिंदी फिल्मों का लोकप्रिय विषय रहा। ‘रक्षाबंधन’ से जुडी कई फिल्में बनाई गयीं। राखी, रक्षाबंधन, राखी और हथकडी और राखी और रायफल फिल्मों को निर्माण किया गया। इन फिल्मों के गीत आज भी मन में भाई और बहिन के प्यार को संजीदा बनाते हैं। “ बहना ने भाई की कलाई से प्यार बांधा है, प्यार के दो तार से संसार बांधा है। ” “भइया मेरे राखी बंधन को निभाना, भैया मेरे छोटी बहिन को न भुलाना। ” सुमन कल्याणपरी और लता मंगेशकर द्वारा गाया गया रक्षा बंधन गीत भले ही बहत पुराना न हो पर भाई की कलाई पर राखी बांधने का सिलिसला सदियों पुराना है।

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