अनुकरणीय : मधुबनी में सामूहिक संस्कार कर कायम की नई मिशाल

  • - पारंपरिक और धार्मिक रीति रिवाज से इतर एक साथ कई लोगों ने दी मुखाग्नि
  • - मुखाग्नि देने वालों में विभिन्न सम्प्रदाय के पुरूष और महिलाएं थी शामिल

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मधुबनी (राम शरण साह) रामपट्टी लोहिया कर्पूरी इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी परिसर में समाजसेवी पंचदेव का सामुहिक रूप से अंतिम संस्कार कर लोगों ने नई मिशाल कायम की है। जात- पात और समुदाय से लेकर क्रियाकर्म में पुरुषों की एकाअधिकार सब मिथ्या साबित हो गया। रविवार दोपहर जब समाजसेवी पंचदेव के पार्थिव शरीर को मुखाग्नि दी जा रही थी वह दृश्य बिल्कुल अद्भुत था। हिन्दु, मुसलमान, पुरुष और महिलाएं सब साथ मिलकर न केवल अर्थी को कंधा दिया। बल्कि एक साथ मिलकर मुखाग्नि भी दी। वैसे मधुबनी में कुछ वर्ष पूर्व हीरा देवी यादव के निधन पर सभी बच्चों ने एक साथ मुखाग्नि दी थी लेकिन यह घटना अपने आप में अलग है। अधिवक्ता दीनानाथ यादव बताते हैं कि जब जीवित होने पर सबका अधिकार सामान होता है तो मरने के बाद किसी का एकाधिकार क्यों। पंचदेव के मुखाग्नि में शामिल, रामेश्वर निशांत, उर्मिला देवी, भारत भूषण मंडल, देवनाथ देवन और मो. अजीज बताते हैं कि पंचदेव मानवता के पुजारी थे। वह जाति, धर्म और लिंग के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं करते थे। उनपर सबका समान अधिकार था।

---सुप्रीम कोर्ट से पीआर बॉन्ड पर करायी थी सात मजदूरों की रिहाई 
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पंचदेव के निधन से उधवा मुसहरी में बिरानगी छाया है। 1985 में मधेपुर प्रखंड के सुंदर बिराजित गांव स्थित उधवा मुसहरी के सात मजदूर बनारस में एक ईंट भट्ठा में काम कर रहे थे। उसी क्रम में वहां दो गुटों की भिड़ंत में एक व्यक्ति की मौत हो गई। हत्या के आरोप में सभी सातों जगदीश सदाय, मुन्ना सदाय, योगेन्द्र सदाय, रामबहादुर सदाय, रामा सदाय, रामगुलाम सदाय एवं गंगा सदाय को वहां जेल में बंद कर दिया गया। पंचदेव के साथ रहे प्रियदर्शी ने बताया कि जब इसकी जानकारी पंचदेव को हुई तो वह इलाहाबाद हाईकोर्ट से सभी लोगों का जमानत कराया। लेकिन स्थानीय जमानतदार नहीं होने के कारण सातों की रिहाई नहीं हो सकी। तब पंचदेव सुप्रीम कोर्ट गये। वहां याचिका दाखिल कर कहा कि स्थानीय जमानतदार नहीं हो रहा है तो इसमें गरीबों की क्या कसूर है। उन्होंने कहा कि हम भारतीय हैं । कोर्ट चाहे तो इनकी नागरिकता गिरबी रख लें लेकिन मजदूरों को आजाद कर दें। बाद में कोर्ट ने निजी मुचलका पर सभी को जेल से रिहा कर दिया। मुन्ना, रामबहादुर और योगेन्द्र सदाय आज भी जिंदा हैं। उन्होंने पंचदेव को मुखाग्नि भी दी।
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